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शिक्षा विभाग को 15 साल बाद याद आए एजुसेट

स्कूल मुखियाओं से यह जानकारी मांगी है कि स्कूलों (Schools) में लगाए गए एजुसेट वर्किंग में है या नहीं। जो उनके साथ भेजे गए सामान की स्थिति क्या है।

शिक्षा विभाग को 15 साल बाद याद आए एजुसेट
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भिवानी। जर्जर हालत में एजुसेट की छतरी।

हरिभूमि न्यूज : भिवानी

शिक्षा विभाग (Education Department) को 15 साल बाद स्कूलों में भेजे गए एजुसेटों की याद आ गई। ऑन लाइन क्लासें (Online classes) लगाने के लिए भेजे गए एजुसेटों के बारे में जानकारी मांगी है कि किस स्कूल का एजुसेट वर्किंग में या नहीं,इस बारे में अतिशीघ्र जानकारी भेजे जाने के निर्देश दिए है। पर हालत उसके उलट है।

डेढ दशक पहले भेजे गए अधिकांश एजुसेटों की छतरी ही गायब है। जिसके जरिए पंचकूला से सिस्टम कैनेक्ट होता था। बैटरी कबाड़ बन चुकी है। एडोप्टर व कंप्यूट बंद पड़े कमरों में धूल फांक रहे है। 95 फीसदी सिस्टम पूरी तरह से नकारा हो चुके है। अभी यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि विभाग इनको दोबारा से चालू करवाएगा किया फिर अन्य कोई योजना है। आदेश आते ही स्कूल मुखियाओं ने जिस हालत में एजुसेट है। उनकी वही स्थिति दर्शाकर रिपोर्ट मुख्यालय भेज दी।

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार शिक्षा विभाग ने प्रत्येक स्कूल मुखिया को पत्र भेजकर स्कूलों में भेजे गए एजुसेट की स्थिति के बारे में जानकारी मांगी है। बताया जाता है विभाग ने मुखियाओं से यह जानकारी मांगी है कि स्कूलों में लगाए गए एजुसेट वर्किंग में है या नहीं। जो उनके साथ भेजे गए सामान की स्थिति क्या है। एजुसेट के लगाई गई छतरियां टूट चुकी है या फिर लगी हुई है। प्रोजैक्टर की स्थिति क्या है। इस बारे में विभाग ने अतिशीघ्र जानकारी भेजे जाने के निर्देश दिए है।

क्या है एजुसेटों की स्थिति

सूत्र बताते है कि शिक्षा विभाग ने वर्ष 2004-05 में सभी सेकेंडरी व सीनियर सेंकेडरी स्कूलों में एजुसेट सिस्टम भेजे थे। ताकि बच्चों को ऑनलाइन शिक्षा दी जा सके। उस वक्त पंचकूला से सारा सिस्टम ऑपरेट होता था और उत्कर्ष सोसायटी इस योजना को चलाए हुई थी। उस वक्त सभी स्कूलों में एजुसेट की बेहतरीन स्थिति थी। बच्चों को रोजाना पढाया जाता था,लेकिन धीरे-धीरे विभाग का इस योजना के प्रति उपेक्षित रवैया शुरू हो गया। पहले ऑन लाइन क्लासें लगनी बंद हुई और फिर इनमें से कुछ सिस्टम खराब हुए तो दोबारा उनकी मरम्मत या दुरुस्त नहीं करवाया गया। जिसके चलते वर्ष 2010 तक आधे से ज्यादा एजुसेट जवाब दे गए थे। इस बारे में विभाग के पास सूचना भेजी गई। सूत्र बताते है कि ऑनलाइन क्लासें न लगने की वजह से स्कूल मुखियाओं ने भी कई जगहों पर छतरी तो उतरवाकर सिस्टम कमरे में बंद करवा दिया तो कुछ स्कूलों में बीते दिनों तक छत पर टंगी नजर आ रही थी। अब हालत ये बने है कि इन छतरियों के न तो तार है और स्टेंड। जर्जर हालत में छतों पर लगी हुई है। यही स्थिति अन्य सामान की है। योजना के तहत भेजे गए 95 फिसदी सिस्टम ही खराब हो चुके है।

बैटरी डैड, वायर का अता-पता नहीं

स्कूलों में एजुसेट से पढाई कराए जाने की योजना को करीब 15 साल का अरसा बीत गया। सिस्टम को चलाने के लिए प्रत्येक सिस्टम के साथ बैटरी भेजी गई थी। ताकि ऑन लाइन पढाई कराते वक्त बिजली का कट लग जाए तो बैटरियों से निर्बाध रुप से बच्चों की ऑनलाइन पढाई चलती रहे। डेढ दशक बीतने पर बैटरियों की मियाद पूरी हो चुकी है। अधिकांश बैटरी खत्म हो चुकी है।कुछ टूटी तो कुछ फूल कर फट चुकी है। ऐेसे में वे किस तरह से सिस्टम को चला पाएंगी। हालांकि अब स्कूलों में बिजली व सोलर पैनलों की व्यवस्था है। जिसके तहत सिस्टम को चलाया जा सकता है,लेकिन बैटरियां पूरी तरह से नकारा हो चुकी है। अब इनको इस्तेमाल में नहीं लिया ज सकता।

कैसे होती थी पढाई

शुरू में जिस वक्त योजना शुरू हुई। उस वक्त नौवीं से लेकर बारहवीं तक की कक्षाओं के बच्चों को एजुसेट के माध्यम से पढ़ाया जाता था। अगर बीच में किसी बच्चे को कोई प्वाइंट समझ नहीं आता तो वह तत्काल माइक से सेट के माध्यम से ही डाउट दूर करवा लेता था। सप्ताह में इन चारों कक्षाओं क अलग-अलग समय पर अलग-अलग विषय की कक्षाएं लगाई जाती थी। शुरुआत में बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाई खूब रास आई। बच्चे बड़े आराम से बैठकर पढ़ाई करते अगले दिन डाउट भी प्रोग्राम शुरू होते ही पूछे जाते। विभाग की सुस्ती ने धीरे-धीरे एजुसेट के माध्यम से ऑनलाइन दी जाने वाली शिक्षा को बंद कर दिया। जिसके चलते आज भी एजुसेट का सिस्टम स्कूलों में है,लेकिन अधिकांश वर्किंग में नहीं है। अब केवल बच्चों के लिए कबाड़ बने हुए है।

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