Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

सुप्रीम कोर्ट ने दिया सुझाव, पुलिस की तरह फाॅरेस्ट को आर्म्स लैस होने की जरूरत

वन विभाग के फील्ड में काम करने वाले कर्मियों और अफसरों के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश शरद ए. बोबड़े ने शुक्रवार को एक अहम टिप्पणी की। मुख्य न्यायाधीश ने वन अफसर और वनकर्मियों के कार्य को पुलिस से ज्यादा चुनौतीपूर्ण मानते हुए जिम्मेदार लोगों को आधुनिक हथियारों से लैस करने के साथ बुलेट प्रूफ जैकेट से लैस करने का सुझाव दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने दिया सुझाव, पुलिस की तरह फाॅरेस्ट को आर्म्स लैस होने की जरूरत
X

सुप्रीम कोर्ट

वन विभाग के फील्ड में काम करने वाले कर्मियों और अफसरों के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश शरद ए. बोबड़े ने शुक्रवार को एक अहम टिप्पणी की। मुख्य न्यायाधीश ने वन अफसर और वनकर्मियों के कार्य को पुलिस से ज्यादा चुनौतीपूर्ण मानते हुए जिम्मेदार लोगों को आधुनिक हथियारों से लैस करने के साथ बुलेट प्रूफ जैकेट से लैस करने का सुझाव दिया है। कोर्ट ने यह आदेश शिकारियों तथा वन तस्करों के बढ़ते खतरे को ध्यान में रखते हुए दिया है। सुप्रीम कोर्ट के सुझाव का छत्तीसगढ़ रेंजर्स एसोसिएशन ने स्वागत करते हुए राज्य शासन से कोर्ट के सुझाव को अमल में लाने की मांग की है।

उल्लेखनीय है कि पिछले चार वर्षों के भीतर छत्तीसगढ़ के दो रेंजरों की निर्ममता पूर्वक हत्या करने के साथ राज्य के अलग-अलग वनक्षेत्रों में वनकर्मियों पर शिकारियों तथा रेत माफियाओं ने जानलेवा हमला किया है।

इस बात को ध्यान में रखते हुए छत्तीसगढ़ रेंजर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष विजेंद्र नाथ दुबे ने पूर्व में पीसीसीएफ राकेश चतुर्वेदी के साथ राज्य शासन से पत्र व्यवहार कर फील्ड में जिम्मेदार अफसरों को हथियार से लैस करने की मांग करने की जानकारी दी है।

वनकर्मियों पर शिकारी भारी

कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में असम का उदाहरण देते हुए कहा है कि असम में वनकर्मी एक समय हथियारों से लैस रहते थे, तब शिकारी और तस्कर जंगल में जाने से डरते थे। साथ ही कोर्ट ने कहा है कि शिकारी और तस्कर आधुनिक हथियारों से लैस रहते हैं।

इस स्थिति में लाठी लेकर चलने वाले वनकर्मी इनसे कैसे निपट सकते हैं। साथ ही कोर्ट ने कहा है कि वनकर्मी एक सूनसान बड़े भू-भाग वाले जंगल में अकेले गश्त के लिए निकलते हैं। साथ ही पुलिस से विषम परिस्थिति आने पर बैकअप मंगा सकते हैं।

पूर्व में हथियार रखने मिली थी अनुमति

उल्लेखनीय है कि तत्कालीन मध्यप्रदेश शासनकाल में वन अफसरों को तथा फील्ड में काम करने वाले वनकर्मियों को हथियार रखने की अनुमति मिली थी लेकिन तत्कालीन राज्य सरकार ने वन अफसरों के साथ फील्ड में तैनात वनकर्मियों को हथियार चलाने की कानूूनन अनुमति नहीं दी।

इसके बाद वन अफसरों के साथ वनकर्मियों ने अपने हथियार संबंधित थाना क्षेत्र के मालखाने में जमा करा दिया। तब से अब तक वन अफसर से लेकर फील्ड में तैनात वनकर्मी हथियार विहीन हैं।

चार वर्ष के भीतर दो रेंजरों की हत्या

फील्ड में तैनात वन अफसरों के साथ वनकर्मियों के हथियार विहीन होने की वजह से फील्ड में काम करने वाले रेंजर तथा वनकर्मियों के प्रति शिकारियों तथा वन तस्करों के मन से डर समाप्त हो गया है। इस वजह से राज्य के अलग-अलग वनक्षेत्रों में रेत माफिया के साथ शिकारियों ने वन अमले पर प्राणघातक हमले किए हैं। तीन वर्ष पूर्व रायगढ़ जिला के लैलुंगा वन परिक्षेत्र के रेंजर दौलत राम लदेर की 20 फरवरी 2017 को रेत माफिया ने टांगिया मारकर हत्या कर दी थी।

इसी तरह तीन माह पूर्व बीजापुर इंद्रावती टाइगर रिजर्व के रेंजर रथ राम पटेल की नक्सलियों ने अगवा कर गला रेतकर हत्या कर दी थी। दो वर्ष पूर्व 29 मार्च 2019 को बारनवापारा में शिकारियों ने योगेश्वर प्रसाद सोनवानी पर तीर मारकर गंभीर रूप से घायल कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट के सुझाव का स्वागत

राज्य में लकड़ी तस्करों के साथ शिकारी सक्रिय हैं ऐसे में वन्यजीवों के साथ जंगलों की सुरक्षा के लिए फील्ड में तैनात जिम्मेदार वन अफसरों को हथियार से लैस करने की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट के सुझाव का हम स्वागत करते हैं।


Next Story