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World Environment Day : गांव वालों का ठाकुर-देवता बना 1400 बरस पुराना महाकाय साल का पेड़

देहरादून के वैज्ञानिकों ने की है उम्र की पुष्टि, वन विभाग ने संरक्षित घोषित किया

World Environment Day : गांव वालों का ठाकुर-देवता बना 1400 बरस पुराना महाकाय साल का पेड़
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नागेंद्र श्रीवास. कोरबा. जिले के सुदूर वनांचल क्षेत्र पर्यटन क्षेत्र सतरेंगा में एक ऐसा पेड़ है जो दुनिया के सबसे पुराने वृक्षों की सूची में शामिल है । इसकी आयु 1400 वर्ष है। यहां के लोग इस पेड़ को देव तुल्य मानते हैं और हर खुशी के मौके पर पेड़ की पहले पूजा अर्चना कर शुभ कार्य शुरू करते हैं। वन विभाग ने इस वृक्ष को संरक्षित घोषित किया है। कोरबा जिला मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर दूर कोरबा मंडल के बालको वन परीक्षेत्र में आने वाले सतरेंगा में साल के एक विशाल पेड़ को संरक्षित किया गया है।

पादप वैज्ञानिकों ने वैज्ञानिक परीक्षण के बाद इस पेड़ की उम्र की पुष्टि की है जो भारत के ही नहीं बल्कि दुनिया के सबसे पुराने साल के जीवित पेड़ों में से एक है। इस साल पेड़ की खोज वर्ष 2006 में हुई थी। इस दौरान तत्कालीन डीएफओ अरुण पांडे ने इसका परीक्षण कराया था जिसमें इस पेड़ की उम्र लगभग 1400 साल से अधिक पाई गई थी। देहरादून स्थित वन की प्रयोगशाला के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए परीक्षण में इसकी उम्र की पुष्टि की गई। इस महावृक्ष की ऊंचाई लगभग 28 मीटर से अधिक है। जमीनी सतह पर गोलाई 28 फीट 2 इंच है। इस महावृक्ष की ग्रामीणों के साथ-साथ वन अमला देखरेख करता है,ताकि इसे कोई क्षति ना पहुंचाए। दूरदराज से पहुंचने वाले लोग भी इस महा वृक्ष को देखने के लिए बड़ी संख्या में पहुंचते हैं और पूजा-अर्चना भी करते हैं।

कोरबा के लिए गौरव की बात

जिले के लिए यह गौरव की बात है। इसकी जड़ें जमीन में लगभग 22 मीटर अंदर तक हैं जो साबित करता है कि साल वृक्ष का यदि संरक्षण किया जाए तो इस प्रजाति के वृक्ष महावृक्ष की तरह हो सकते हैं। वृक्ष अपने आप में अजूबा है। सामान्यत: 120 सेमी से अधिक गर्त होने पर साल को सलेक्शन क्लास में मानते हुए विदोहित किया जाता है परंतु 22 मीटर गर्त का वृक्ष हमारे बीच सिर्फ धार्मिक आस्था की वजह से बच पाया है। अगर हम ऐसे ही वृक्षों का संरक्षण करते रहे तो प्रकृति को बेहतर जीवन दे पाएंगे।

प्रियंका पाण्डेय, वनमंडलाधिकारी, कोरबा

ग्रामीण देवता मानते हैं

साल के इस महावृक्ष के जीवित होने का श्रेय सतरंगा के ग्रामीणों को दिया जाता है। ग्रामीण इसे ठाकुर देवता के रूप में मानते हैं। ग्राम पंचायत सतरेंगा के ग्रामीणों का कहना है कि इस गांव में काफी पहले से ही हरे भरे पेड़ों को काटने के लिए प्रतिबंध लगाया गया है। जरूरत पड़ने पर सूखे पेड़ों को ही काटा जाता है। वृक्ष हमें जीवन देते रहते हैं। इससे अच्छी बारिश होती है और गांव खुशहाल होता है वनोपज ही हम लोगों की जीविका का साधन है इसलिए ग्रामीण इस महासाल वृक्ष को भगवान स्वरूप मानते हैं और कोई भी अच्छा काम करने से पहले इस साल वृक्ष की पूजा अर्चना की जाती है। जिसके बाद ही कुछ जिसके बाद शुभ कार्य किया जाता है।

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