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RTI के तहत जानकारी नहीं देने का खामियाजा, CMHO के लिए अरेस्ट वारंट जारी

मध्यप्रदेश सूचना आयोग ने एक मामले में हेल्थ कमिश्नर और सीएमएचओ पर जिस तरह से टिप्पणी और कार्यवाही की है, वैसे उदाहरण कम देखने को मिलते हैं। सीएमएचओ के लिए मात्र अरेस्ट वारंट जारी नहीं किया गया, बल्कि वारंट के परिपालन के लिए डीआईजी को भी लिखा गया है। आयोग ने हेल्थ कमिश्नर को भी शो काज नोटिस थमा दिया है। पढ़िए पूरी खबर-

RTI के तहत जानकारी नहीं देने का खामियाजा, CMHO के लिए अरेस्ट वारंट जारी
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भोपाल। सूचना आयोग के आदेशों की बार-बार अवहेलना से नाराज होकर मप्र राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने बुरहानपुर के सीएमएचओ डॉ. विक्रम सिंह को आयोग के समक्ष हाजिर करने के लिए अरेस्ट वारंट जारी किया है। इसके साथ ही इस मामले में आकाश त्रिपाठी कमिश्नर स्वास्थ्य संचालनालय मप्र को आयोग के आदेश की अनदेखी करने पर कारण बताओ नोटिस के साथ व्यक्तिगत सुनवाई के लिए समन जारी किया है।

आयोग से प्राप्त जानकारी के अनुसार प्रकरण में पहले सुनवाई के समय आदेश की लगातार अनदेखी की गई और बाद में आयोग ने जब दोषी अधिकारी के ऊपर 25000 के जुर्माने की कार्रवाई कर दी तो जुर्माना वसूलने के आयोग के आदेश पर जिम्मेदार अधिकारी आँख मुंदे पड़े रहे। मामले में अब आयोग ने सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 के तहत प्रकरण में जांच दर्ज कर समन और बेलेबल अरेस्ट वारंट जारी करने के आदेश दिए है। राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने गिरफ्तारी वारंट जारी करते हुए डीआईजी इंदौर डिवीजन को निर्देशित किया है कि आयोग के वारंट की तामील करा कर दोषी अधिकारी डॉ विक्रम सिंह को गिरफ्तार कर आयोग के समक्ष दिनाक 11 अक्टूबर 2021 को दोपहर 12 बजे हाजिर करें। आयोग ने इस वारंट में कहा है कि अगर डॉ. विक्रम सिंह 5000 की जमानत देकर अपने आप को आयोग के समक्ष 11 अक्टूबर की पेशी में हाजिर होने कर लिए तैयार हैं, तो उनसे जमानत की राशि 5000 लेकर उन्हे आयोग के समक्ष हाजिर होने के लिए रिहा कर दिया जाए।

30 दिन मे मिलनी थी जानकारी लगा दिए 3 साल

एक प्रकरण में अपीलकर्ता दिनेश सदाशिव सोनवाने ने 10 अगस्त 2017 को आवेदन सीएमएचओ बुरहानपुर डॉक्टर विक्रम सिंह के समक्ष लगाया था। आवेदन में बुरहानपुर जिले के स्वास्थ्य विभाग में वाहन चालकों की नियुक्ति और पदस्थापना संबंधित जानकारी मांगी गई थी। लेकिन डॉ विक्रम सिंह ने कोई भी जवाब 30 दिन में नहीं दिया। इसके बाद आवेदक ने प्रथम अपील दायर की तो प्रथम अपीलीय अधिकारी संयुक्त संचालक स्वास्थ्य इंदौर में इसमें जानकारी देने के आदेश दिनाक 7 अक्टूबर 2017 को जारी कर दिए थे। लेकिन जानकारी नहीं दी गई, जिसके बाद मामला राज्य सूचना आयोग के समक्ष पहुंचा।

लगातार होता रहा था उल्लंघन

राज्य सूचना आयोग ने डॉ. विक्रम सिंह को आयोग के समक्ष अपना जवाब पेश करने के लिए लगातार समन जारी किए। पहला समन 18 अक्टूबर 2019 को हुआ। दूसरा 29 नवंबर 2019 को हुआ। इसके सातवां समन 10 फरवरी 2021 को जारी किया गया । पर इन सभी समनो के बावजूद डॉ. विक्रम सिंह आयोग के समक्ष हाजिर नहीं हुए। आयोग ने इन समनो मे डॉ विक्रम सिंह की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए स्वास्थ्य संचालनालय के कमिश्नर को भी निर्देशित किया था। लेकिन स्वास्थ्य विभाग ने इस पर भी ध्यान नहीं दिया। आयोग ने 16 दिसंबर 2020 को इस प्रकरण में 25000 का जुमार्ना डॉ. सिंह के ऊपर लगाया और साथ ही कमिश्नर स्वास्थ संचनालय को 1 महीने में पेनल्टी की राशि जमा ना होने पर डॉ. सिंह की वेतन से काटकर आयोग में जमा करने के लिए निर्देशित किया गया था। मामले में आयोग ने 16 दिसंबर 2020 के बाद दोबारा कमिश्नर स्वास्थ संचनालय मप्र को दिनांक 7 अप्रेल 2021, 7 जून 2021 और 27 अगस्त 2021 को जुर्माने की राशि अधिकारी की सैलरी से काट कर आयोग में जमा करने के लिए आदेशित किया। लेकिन 2 साल से लगातार इन सब कार्रवाईयों के बावजूद आयोग दोषी सीएमएचओ को अपने समक्ष हाजिर करवाने और उसके बाद जुर्माने की राशि वसूलने में विफल साबित रहा।

आयुक्त राहुल सिंह ने की तल्ख टिप्पणी

राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने अपने आदेश में कहा कि सीएमएचओ द्वारा जानबूझकर कर आयोग के आदेश की अवहेलना की गई। सिंह ने यह भी कहा कि आयोग के आदेश के बावजूद कमिश्नर द्वारा इसमें कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं करने से कमिश्नर की नियत कार्रवाई नहीं करने की साफ झलकती है और यह मध्य प्रदेश आरटीआई फीस अपील नियम 8 (6) (3), 2005 का उल्लंघन है। राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने सीएमएचओ को कमिश्नर हेल्थ पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि दोनों अधिकारियों का व्यवहार संसद द्वारा स्थापित पारदर्शी और जवाबदेह सुशासन सुनिश्चित करने वाले कानून का मखौल उड़ाने वाला है। सिंह ने साथ में आदेश में यह भी लिखा इन अधिकारियों को आम जनता के मूल अधिकार और कायदे कानून की भी परवाह नहीं है। राज्य सूचना आयुक्त ने अपने आदेश में कहा कि आयोग इस तरह के आरटीआई एक्ट के लगातार खुलेआम उल्लंघन को मूकदर्शक बनकर नहीं देख सकता है। अगर इस तरह के उल्लंघन को मान्य कर दिया जाए तो आरटीआई कानून मजाक बनकर रह जाएगा।

यह है नियम

राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह के मुताबिक आरटीआई एक्ट की धारा 7 (1) के तहत अगर 30 दिन के अंदर जानकारी नहीं मिलती है तो धारा 20 के तहत 250 प्रतिदिन के हिसाब से अधिकतम 25000 तक का जुर्माना लगाया जाता है। दोषी अधिकारी को 1 महीने का समय जुर्माने की राशि आयोग में जमा करने के लिए दिया जाता है। इसके बाद मध्यप्रदेश फीस अपील नियम 2005 में नियम 8 (6) (3) के तहत आयोग दोषी अधिकारी के कंट्रोलिंग अधिकारी को जुर्माने की राशि को वसूलने और साथ में दोषी अधिकारी के विरुद्ध अनुशासनिक कार्रवाई के लिए रिपोर्ट करता है। नियम के अनुसार आयोग का आदेश संबंधित कंट्रोलिंग अधिकारी पर बंधनकारी होता है। सिंह ने बताया कि नियम के मुताबिक आयोग जुर्माने की राशि को वसूलने के लिए सिविल कोर्ट की शक्तियों का उपयोग करता है।

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