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पुराने जमाने की राजनीति : ये विधायक बने तब हरियाणा में केवल पांच विधायकों के पास थी कार

चुनाव में खर्च हुए थे अठाइस हजार रुपये जो लोगों से उधार लिए थे। तब विधायक बस में ही चंडीगढ़ आते - जाते थे।

पुराने जमाने की राजनीति : ये विधायक बने तब हरियाणा में केवल पांच  विधायकों के पास थी कार
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पूर्व विधायक उमेद सिंह और धर्मेंद्र कंवारी।

सन 1972 के हरियाणा विधानसभा चुनाव में उमेद सिंह महम हलके से 27 साल की उम्र में निर्दलीय विधायक चुने गए थे । ये सबसे कम उम्र के विधायकों में से एक थे। इन्होंने कांग्रेस के प्रत्याशी राज सिंह दलाल को हराया था। ये पंजाब यूनिवर्सिटी से इतिहास विषय में गोल्ड मेडलिस्ट हैं। जिस समय इन्होंने चुनाव लड़ा ये पीएचडी कर रहे थे। उस समय केवल हरियाणा में पांच या छह विधायकों के ही पास कार होती थी बाकी सभी बस में बैठकर ही विधानसभा में जाते थे। उस समय की राजनीति और आज की राजनीति में भारी अंतर है। उस समय नेताओं का मकसद पैसे कमाना नहीं होता था और ना ही लंबे समय तक कुर्सी से चिपके रहने की सोच होती थी। पूर्व विधायक उमेद सिंह सिवाच ने धर्मेंद्र कंवारी से बातचीत में पुराने समय की राजनीति पर बातें की।

सवाल : आपके मन में चुनाव लड़ने की इच्छा कहां से आई ?

उमेद सिंह : मेरी राजनीति में आने की इच्छा थी तो चुनाव लड़ लिया। उस समय महम की चौबीसी की पंचायत होती थी। मैं उस समय नौजवान था और अच्छा पढ़ा लिखा भी था। लोगों ने मुझे चौबीसी का उम्मीदवार बना दिया और मैने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव जीत लिया। उसके बाद मैने कभी चुनाव नहीं लड़ा। उस समय राजनीति बहुत सादी थी। जब मैं विधायक था तो उस समय लोग बसों में चलते थे। विधानसभा में तब 81 सीट थी। उनमें से कार केवल पांच या छह विधायकों के पास ही थी। भूपेंद्र सिंह हुड‍्डा के पिता चौ‍ रणबीर सिंह कार में जाते थे। चौधरी चांद राम बस में जाते थे। मैं भी बस में जाता था। हम चंडीगढ बस स्टैंड उतरकर आ‍ॅटो में विधानसभा में जाते थे। फरीदाबाद के एक निर्दलीय विधायक बस की छत पर साइकिल रखकर ले जाते थे और पूरे शहर में साइकिल पर चलते थे। तब बसों में विधायकों के लिए सीट रिजर्व होती थी। अब कोई विधायक बस में नहीं जाता। अब तो पंचायत के मेंबर भी बड़ी गाड़ियों में चलते हैं।

सवाल : राजनीति में धन का प्रभाव कब से शुरू हुआ ?

उमेद सिंह : उस समय रुपयों का इतना प्रभाव नहीं था। 1977 में भी धन का प्रभाव नहीं था। लोग बिना रुपयों के विधायक बने। जिस दिन मैने चुनाव लड़ना शुरू किया मेरे पास रुपये नहीं थे। मैने लगभग 28 हजार रुपयों में चुनाव लड़ा था, वो रुपये भी लोगों ने दिए थे। मैने ताे किसी से एक हजार रुपये उधार लेकर चुनाव लड़ना शुरू किया था। मैं बस में बैठकर पर्चा भरने गया था। मेरे पास उस समय बुलेट बाइक थी। तब गोहाना हमारी तहसील होती थी। तब लोग देख रहे थे कि ये लड़का फार्म भर रहा है, जीतेगा या नहीं। तब महम में चार उम्मीदवार थे। राज सिंह दलाल, मैं, चतर सिंह और एक ताले राम।

सवाल : राजनीति में यह कब शुरू हुआ कि ये आपका कार्यकर्ता है, उसका लड़का नौकरी लगवा दिया या ट्रांसफर करवा दिया ?

उमेद सिंह : ऐसा थोड़ा- थोड़ा 1972 में भी शुरू हो गया था। तब सिफारिश शुरू हो गई थी। पब्लिक सर्विस कमीशन में भी और एसएस बोर्ड में भी। बंसीलाल के समय में यह शुरू हो गया था। मेरे पास भी लोग आते थे और कुछ युवाओं को लगवाया भी सरकार से कहकर।

सवाल : तब चौधरी बंसीलाल किस तरह के मुख्यमंत्री थे ?

उमेद सिंह : चौधरी बंसीलाल में कुछ खासियत भी थी। वे बहुत प्रैक्टिकल थे। उनकी प्रशासनिक पकड़ भी थी, उनका विजन भी अच्छा था। वे सादे आदमी थे, कोई दिखावा नहीं करते थे। उस समय चौधरी देवीलाल से मेरी बनी नहीं। देवीलाल ने राज्यसभा का चुनाव लड़ा था। मैने रणबीर सिंह की राय दी थी, देवीलाल की नहीं दी। जिस पर तु-तु मैं-मैं हो गई। मैने अपना वोट रणबीर सिंह को दिया था। तब विधानसभा में निर्दलीयों के समर्थन की जरूरत ही नहीं पड़ी क्याेंकि कांग्रेस का बहुमत था। तब 48 विधायक कांग्रेस के थे। दो विधायक भाजपा के थे और 12 विधायक तब कांग्रेस ओ हाेती थी, उसके थे। जिसका चौधरी रीजग राम मेंबर था, चौधरी हरिदवारी लाल भी उसी का मेंबर था। बाकि निर्दलीय थे।

सवाल : राजनीति में नोट कमाने की प्रथा कब शुरू हुई ?

उमेद सिंह : राजनीति में नोट कमाना 1982 के बाद शुरू हुआ। 1977 और 72 में तनख्वाह से ही संतुष्टि थी। बाद में लोग दोनों हाथों से कमाने लगे। जब मैने राजसिंह को हराया तब उनसे मेरी दूरी ही रही। बाद में हमारी राम-राम हुई।

सवाल : विधायक रहते आपकी कोई एचीवमेंट

उमेद सिंह : हमने कोई पैसे नहीं कमाए यही हमारी एचीवमेंट है। अपने बच्चों को भी बता दिया था कि हमारा उद‍्देश्य पैसे कमाना नहीं है। मेरे सारे बच्चे और भाई अच्छे पढ़े हुए हैं। मरे पिता जी की मौत के बाद मैं ही सबसे बड़ा था। मैने परिवार में सबको पढ़ाया। परिवार में कोई भी पाेस्ट ग्रैजुएट से कम नहीं है।

सवाल : महम कांड में क्या हुआ था

उमेद सिंह : महम कांड में कुछ तो ओमप्रकाश चौटाला की गलती थी। चौटाला चुनाव लड़ रहे थे। कुछ योजना लोगों ने भी बनाई थी लड़ाई करने की। चौटाला ने चुनाव को ढीला छोड़कर जो आठ बुथों पर चुनाव था, उन्होंने योजना बना ली थी लड़ाई करने की, पर सरकार वाले तैयार नहीं थे। इसमें आनंद सिंह दांगी का सारा कसूर था। ये इनका पहले से ही प्लान था कि लड़ाई करनी है। ऊपर वालों ने भी कह रखा था कि लड़ाई नहीं हुई और कोई आदमी नहीं मरा तो चौटाला चुनाव जीत जाएगा। मेरा मत है कि इन्होंने प्लान करके हिंसा की।

सवाल : ऐसी क्या वजह थी कि चाैधरी देवालाल की आपसे बनी नहीं?

उमेद सिंह : देवीलाल जी मेरा समर्थन चाहते थे लेकिन मैं उनके साथ नहीं जाना चाहता था। उन्होंने मुझे एक बार धमकाया भी था लेकिन मैंने उन्हें खरा खरा जवाब दे दिया था। इसके बावजूद मैं ये मानता हूं कि चौधरी देवीलाल एक अच्छे राजनेता थे। बाद में तो जब उन्होंने महम से चुनाव लड़ा तो उनकी मदद भी की थी।

सवाल : क्या आप किसान आंदोलन से भी जुड़े हुए हैं ?

उमेद सिंह : मेरे पास खेत भी हैं जो हिस्से पर दे देता हूं। मैं किसान आंदोलन से मानसिक तौर पर जुड़ा हुआ हूं। आंदोलन में भी जाता रहता हूं। किसानों के लिए गांव में भी चंदा दिया है। वकीलों के बार में भी चंदा दिया है। मेरा मानना है कि भाजपा का प्लान किसानों को का‍रपोरेट हाउसों को सौंपने का है। इसमें किसान मारे जाएंगे। ये कृषि कानून बहुत खतरनाक हैं। का‍रपोरेट हाउस सामान को स्टोर कर लेंगे और बाद में महंगे भाव पर बेचेंगे। इससे गरीब उपभोक्ताओं का भी नुकसान होगा और किसानों का भी। मैं आपको एक बार की बात बताऊं, हमारे पास 1970 में बहुत सारा गड़ था। हमने बढ़िया गुड़ दस रुपये प्रति मण बेचा। बाद में वो गुड़ काला हो गया तो हमने उसे 25 रुपये प्रति मण बेचा। फिर नीचे का मिट‍्टी में लगा हुआ गुड़ और ज्यादा रेट पर बेचा। यही हाेता है जब फसल किसान के पास होती है तो कौड़ियों के भाव बिकती है। जब वो गोदामों में चली जाती है तो वहां की मिट‍्टी भी महंगे भाव पर बिकती है। बाबू जगजीवन राम की दो स्कीम थी पब्लिक इंस्टीब्यूट सिस्टम और दूसरी एमएसपी पर। ये किसानों और उपभोक्ताओं के लिए लाइफलाइन हैं। परंतु भाजपा सरकार वर्ल्ड बैंक के दबाव में यह एक्ट लागू कर रही है। बडे़ घरानों से रुपये लेकर चुनाव लड़ा जाता है, ये एक्ट उनके लिए लागू किए हैंं। आज केवल हरियाणा और पंजाब के किसान ही नहीं यूपी और राजस्थान के किसान भी आंदोलन कर रहे हैं।

सवाल : एसवाईएल का मुद‍्दा तो आपके समय में भी उठता था ?

उमेद सिंह : मैं किसान रहा हूं। नहर में से नाले में जो पानी आता है, वो भी सभी किसानों के खेतों तक नहीं पहुंचने दिया जाता। लोग टेल पर पानी नहीं पहुंचने देते। एसवाईएल के मुद‍्दे पर उपवास रखना भाजपा का फंड है। अब मोदी चाहे तो पंजाब में कैप्टन की सरकार को डिसमिस कर सकते हैं और एसवाईएल खुदवाकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लागू कर दें, कौन रोकता है। भाजपा तो करती है ऐसा कुछ है जिससे आपस में फूट हो। परंतु किसान आगे निकल गए हैं। पंजाब के किसान बोल रहे हैं हमें पानी नहीं चाहिए, हरियाणा को दे दो। हरियाणा के किसान बोल रहे हैं हमें पानी नहीं चाहिए, किसानों की एकता बनी रहे। इस आंदोलन के बहाने एसवाईएल का मुद‍्दा चला गया है। अब लोगों ने भी मन बना लिया है पानी तो मिलना नहीं, ये तो एक राजनीतिक स्टंट है।

सवाल : राजधानी चंडीगढ़ जाने में लोगों को बहुत तकलीफ होती है ?

उमेद सिंह : राजधानी प्रदेश के बीच में होनी चाहिए। पंजाब और हरियाणा दोनों के लिए चंडीगढ़ महंगी पड़ती है। करनाल, जींद या रोहतक को राजधानी बनाना चाहिए ताकि लोग जल्दी जा सकें। चंडीगढ़ में बहुत से नेताओं ने बड़ी बड़ी कोठियां बना ली हैं। अब काेई चाहता ही नहीं चंडीगढ़ को छोड़ना। आम लोग ही चाहते हैं चंडीगढ़ राजधानी ना हो।

सवाल : इस आंदोलन में क्या बड़े बदलाव देखने को मिले ?

उमेद सिंह : मैं मानता हूं कि आंदोलन को 90 प्रतिशत तक सफलता मिल चुकी है। आज पूरे देश के किसान एक हो गए हैं। मानसिक तौर पर भी और भावात्मक तौर पर भी। इस आंदोलन में 36 बिरादरी की सहानुभूति है, विरोध कोई नहीं कर रहा। इस आंदोलन ने जात को तोड़ दिया, धर्म को तोड़ दिया, मुसलमानों ने किसानों के लिए लंगर लगा रखे हैं। पहले सरदारों को उग्रवादी कहते थे, अब उनको कोई उग्रवादी नहीं मानता। किसान आंदोलन के ऊपर पूरी दुनिया की नजर है। पाकिस्तान के एक व्यक्ति ने मुझसे पूछा कि आंदोलन कैसा चल रहा है। उसने कहा कि भारत में किसानाें का आंदोलन सफल हो गया तो पाकिस्तान का किसान भी अपने हक के लिए खड़ा हो जाएगा। इस आंदोलन से इतनी आशाएं हैं। अब सरकार डर रही है। किसान मान कर बैठे हैं कि मर जाएंगे पर वापिस नहीं जाएंगे।

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