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ओम प्रभात अग्रवाल का लेख : हिंग्लिश का बढ़ता मोहपाश

हिंदी के सूर्य पर मध्याह्न की प्रखरता का स्पर्श किए बिना ही अवसान की छाया मंडराने लगी है। सच्चाई तो यह है कि अंग्रेजी शब्दों के घालमेल से एक नई भाषा जन्म ले रही है हिंग्लिश। संभवतः यही भविष्य की भाषा है। यदि यह हुआ तो हिंदी की स्थिति भारत में वही हो जाएगी जो संस्कृति की है। चंद लोग होंगे जो इसके साहित्य का रसास्वादन करेंगे। संभवतः विद्वान कहलाएंगे। वर्तमान में हिंदी का सूर्य निश्चय ही अपने संध्याकाल में प्रवेश करता दिख रहा है।

हिंदी दिवस 2020 : हिंदी को जिंदा रखने के लिए अभी और करने होंगे प्रयास
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हिंदी दिवस 2020

ओम प्रभात अग्रवाल

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात हिंदी न केवल शीघ्रता से प्रगति करने लगी, बल्कि उसकी प्रगति भी बहुआयामी रही। हिंदी पत्र पत्रिकाओं की पाठक संख्या अकल्पनीय गति से आगे बढ़ने लगी और वह विज्ञापनों में अच्छी तरह प्रतिष्ठित हुई। विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में उसे सक्षम बनाने के महती प्रयत्न होने लगे। और तो और, दक्षिण में उसे बोलने और समझने वालों की संख्या में भी अविश्वसनीय रूप से वृद्धि होने लगी।

धीरे-धीरे हिंदी अपने चरम वैभव की ओर बढ़ रही थी, यद्यपि शिक्षा के क्षेत्र में कम से कम छठी, आठवीं तक अनिवार्य रूप से हिंदी क्षेत्र में हिंदी माध्यम नहीं हो पाया था और कार्यालयों की भाषा भी अंग्रेजी बनी रही, परंतु फिर भी प्रगति बहुआयामी रही। आइए इस संबंध में बिल्कुल ताजा स्थिति क्या है, उस पर एक विहंगम दृष्टि डालें। आंकड़े गवाह हैं कि वर्ष 2001 से 2011 के मध्य तमिलनाडु में हिंदी जानने वालों की संख्या 50 प्रतिशत बढ़ी और सम्पूर्ण दक्षिण में 13 प्रतिशत। भारत के 70 प्रतिशत समाचारपत्र हिंदी में हैं और पाठक संख्या की दृष्टि से वे चरम पर हैं। 2017 के सर्वेक्षण के अनुसार पाठक संख्या 18 करोड़ को पार कर चुकी थी,कोरोना काल में गिरावट हुई। जैसा कि अंग्रेजी आदि सभी भाषाओं के समाचारपत्रों के साथ हुआ।

यही नहीं, इंटरनेट पर उसकी वृद्धि दर 94 प्रतिशत है। विकिपीडिया पर एक लाख हिंदी लेख हैं और अब आईआईटी कानपुर एवं हैदराबाद मिलकर हिंदी विकिपीडिया तैयार कर रहे हैं। भारतकोष जैसा आनलाइन ज्ञान का सागर तो उपलब्ध है ही और कविता कोष जैसा सहित्य का भंडार भी। विज्ञापनों में तो हिंदी ही सर्वोपरि है, बल्कि आजकल तो दूरदर्शन के प्रत्येक चैनेल पर टाइम्स आफ इंडिया नामक श्रेष्ठ अंग्रेजी पत्र का विज्ञापन भी हिंदी में ही किया जा रहा है जो हिंदी की क्षमता दर्शाता है। सामान्यतः एक दो अपवादों को छोड़कर हिंदी में विज्ञान शिक्षण कहीं नहीं हुआ। तब भी केन्द्रीय हिंदी शब्दावली आयोग ने साढ़े सात लाख तकनीकी शब्दों का हिंदी रूप तैयार किया और इलेक्ट्राॅनिकी से संबंधित एक लाख नए शब्दों का विरचन जारी है। सीएसआईआर सरीखे संगठन तथा अन्य, भारतीय वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान पत्रिका, विज्ञान परिषद अनुसंधान पत्रिका आदि अंतरराष्ट्रीय स्तर के शोध जर्नल भी प्रकाशित कर रहे हैं।

मध्य प्रदेश के अटल बिहारी हिंदी विश्वविद्यालय तथा राजीव गांधी तकनीकी विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग, चिकित्सा आदि के शिक्षण का माध्यम हिंदी है। देश की महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक एवं अन्य कोटि की सेवाओं की प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए हिंदी माध्यम का विकल्प है। हिंदी पढ़कर भी अनेक कोटि के अच्छे धनोपार्जन वाले अवसर अब उपलब्ध हैं। उन पर लिखना स्वयं में एक स्वतंत्र लेख बन सकता है। यह सब देखकर हिंदी प्रेमियों को लग रहा था कि हिंदी का सूर्य मध्याह्न की प्रखरता की ओर बढ़ रहा है। जैसे ही वह शिक्षण माध्यम बनेगी, यह सपना पूरा होने लगेगा, पर ऐसा हुआ नहीं। हिंदी का सूर्य मध्याह्न को छुए बिना ही संध्या की ओर बढ़ने लगा है । कैसे, आइये देखें।

प्रारंभ से ही हिंदी माध्यम के विद्यालय जो स्वतंत्रता पूर्व एवं स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरंत पश्चात के काल में अच्छी तरह फल फूल रहे थे, धड़ाधड़ बंद होने लगे। अंग्रेजी ही सिरे चढ़ने लगी। जनता को लगा कि अवसरों की भाषा तो अंग्रेजी ही है। सामान्य अथवा तकनीकी प्रशिक्षण, प्रशासनिक सेवाएं, कार्यालय, बैंक हर जगह अंग्रेजी का बोलबाला देखकर ही यह स्थिति उत्पन्न हुई थी। कालांतर में यह स्थिति किंचित बदली, पंरतु धारणा पुष्टतर होती गई। परिणाम यह रहा कि गली-गली कुकुरमुत्तों की भांति अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय खुलते चले गए। नौकरशाही के अंग्रेजी समर्थन ने इसे और हवा दी और हिंदी को गंवारों और अनपढ़ों की भाषा करार दे दिया गया। साहित्य अकादमी के तत्कालीन अध्यक्ष, चंद्रशेखर कंबारा राव ने कहा कि अंग्रेजी पर अत्यधिक निर्भरता से देशी भाषाओं के लेखकों की रचनात्मकता मरती जा रही है। अंग्रेजी माध्यम के बढ़ते प्रताप से धीरे-धीरे पहले तो जनता की स्मृति से हिंदी गिनतियां गायब हुईं और फिर पक्षियों, पशुओं आदि के नाम तथा सामान्य से शब्द जैसे जौहरी की दुकान, यातायात, समय आदि शनै-शनै गायब होते गए। इस प्रवृत्ति का भयंकरतम परिणाम देखने को मिला जब उत्तर प्रदेश में इस वर्ष की दसवीं और बारहवीं की बोर्ड की परीक्षाओं में आठ लाख विद्यार्थी हिंदी में अनुत्तीर्ण घोषित कर दिए गए। यह अकल्पनीय आघात था, परंतु यह होना था और हुआ।

नई शिक्षा नीति में भी देश की प्रगति की पटकथा होते हुए भी ऐसा कुछ नहीं मिल पाया जो भाषा संबंधी स्थिति में सुधार कर सके। यह मान लेने के उपरांत भी कि बच्चे अपनी मातृभाषा में सार्थक अवधारणाओं को अधिक शीघ्रता से सीखते हैं, माध्यम के रूप में उसे एेच्छिक स्थान ही दिया गया। ग्रेड पांच तक बल्कि आठ तक माध्यम के रूप में मातृभाषा की अनुशंसा करके भी सब कुछ यदि संभव हो पर छोड़ दिया गया है। अर्थात्ा अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों के लिए एक मार्ग खुला छोड़ दिया गया। इसका परिणाम भी शीघ्र ही सामने आ गया। नीति के जारी होने के तुरंत बाद ही हरियाणा सरकार दो सौ बस्ता विहीन माॅडल विद्यालयों की योजना का खुलासा करते हुए माध्यम के रूप में अंग्रेजी की ही घोषणा कर बैठी। हरियाणा के ही एक हजार संस्कृति माॅडल विद्यालयों में भी माध्यम अंग्रेजी ही बनी। दिल्ली सरकार ने भी अंग्रेजी माध्यम के सौ नए विद्यालयों की घोषणा की और उत्तर प्रदेश में प्राथमिक स्तर से ही अंग्रेजी पर जोर दिए जाने का निश्चय प्रकट किया गया। आंध्र ने भी अंग्रेजी माध्यम के ही स्वीकरण की घोषणा की।

स्पष्ट है कि हिंदी के सूर्य पर मध्याह्न की प्रखरता का स्पर्श किए बिना ही संध्याकाल के अवसान की छाया मंडराने लगी है। सच्चाई तो यह है कि अंग्रेजी शब्दों के घालमेल से भाषा की एक लष्टम पष्टम रेल खड़ी हो रही है या कहें एक नई भाषा जन्म ले रही है हिंग्लिश। बोलचाल, मीडिया, विज्ञापन, सभी स्थानों पर यह शीघ्रता से स्थान बनाती जा रही है। यह दूसरी बात है कि यह न तो हमारे संस्कारों के संगत है और न ही उसमें हमारी संस्कृति के अभिव्यक्ति की क्षमता है। दूरदर्शनी भाषा तो वह हो ही गई है, समाचारपत्र भी उसके मोहपाश में बुरी तरह जकड़ते जा रहे हैं।

संभवतः यही भविष्य की भाषा है। यदि यह हुआ तो हिंदी की स्थिति भारत में वही हो जाएगी जो संस्कृति की है। चंद लोग होंगे जो इसके साहित्य का रसास्वादन करेंगे, भाषणों में इसके अंशों को उद्धृत करेंगे और संभवतः विद्वान कहलाएंगे। वर्तमान में हिंदी का सूर्य निश्चय ही अपने संध्याकाल में प्रवेश करता दिख रहा है।

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