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सुशील राजेश का लेख: ममता से मोहभंग का चुनाव

लोकसभा चुनाव में 18 सीटें जीतने और 40 फीसद से ज्यादा वोट पाने के बाद भाजपा को लगता है कि वह राज्य में भी सत्ता हासिल कर सकती है, लिहाजा उसका काडर बेहद आक्रामक है। दूसरी तरफ तृणमूल कांग्रेस में भगदड़ मची है। 2019 के चुनाव से पहले सौमित्र खान, अर्जुन सिंह, सब्यसाची दत्ता, राजीव बनर्जी ने तृणमूल छोड़ी थी और भाजपा में शामिल हुए थे। अब सीधा मुकाबला ममता और भाजपा के बीच है। क्या मौजूदा हालात के तहत ममता को पराजित किया जा सकता है? वह 2011 से ही सरकार में हैं, लिहाजा सत्ता विरोधी लहर तो होनी चाहिए, लेकिन ममता संघर्षशील नेता हैं। उन्हें किसी भी सूरत में नकारा नहीं जा सकता।

ममता सरकार को एक और झटका, अब टीएमसी विधायक शीलभद्र दत्त ने छोड़ी पार्टी
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सीएम ममता बनर्जी

सुशील राजेश

कुछ साल पहले मैं उत्तर 24,परगना और सुंदरवन गया था। बेहद पिछड़े और ऊबड़-खाबड़ इलाके हैं। लंबी-सी, सीमेंटवाली,पक्की सड़क जरूर बनी थी, क्योंकि तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का दौरा था। ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बन चुकी थीं। उन इलाकों में दीवारों पर तृणमूल कांग्रेस का नाम और चुनाव चिह्न छापे गए थे। गली-गली में पार्टी का काडर और विस्तार स्पष्ट दिखता था। हालांकि कुछ जगहों पर तब भी वाममोर्चा का लाल झंडा लहरा रहा था। उसके स्थानीय कार्यकर्ता आक्रामक लगते थे। ऐसे कार्यकर्ताओं का काम चुनावी बूथ लूटना,फर्जी मतदान करना और पार्टी उम्मीदवार की जीत तय करना था। इस पूरे क्षेत्र में हिंसक हमले और हत्याएं सामान्य जीवन के ही हिस्से हैं। तब यहां भाजपा का नामोनिशान नहीं था। यही स्थिति मिदनापुर की थी। हालांकि सिलीगुड़ी में कुछ भाजपाई चेहरे और बैनर दिखते थे। तब से आज तक चुनाव और राजनीति का परिदृश्य काफी बदल चुका है।

लोकसभा चुनाव में 18 सीटें जीतने और 40 फीसद से ज्यादा वोट पाने के बाद भाजपा को लगता है कि वह राज्य में भी सत्ता हासिल कर सकती है, लिहाजा उसका काडर बेहद आक्रामक है। भाजपा को लोकसभा चुनाव में 121 सीटों पर बढ़त मिली थी। दूसरी तरफ तृणमूल कांग्रेस में भगदड़ मची है। 2019 के चुनाव से पहले सौमित्र खान, अर्जुन सिंह, सब्यसाची दत्ता, राजीव बनर्जी ने तृणमूल छोड़ी थी और भाजपा में शामिल हुए थे। ये नेता या तो सांसद हैं अथवा सांसद रह चुके हैं। भाजपा ने तृणमूल को ही नहीं, वामदलों के उस काडर को भी अपने पाले में किया है, जो चुनावों के मद्देनजर हिंसक व्यवहार करने में माहिर हैं। शनिवार को मिदनापुर में गृह मंत्री अमित शाह की जनसभा के मौके पर तृणमूल के 7 विधायक, एक सांसद,पूर्व मंत्री, 15 पार्षद, 45 चेयरमैन और दो जिला पंचायत अध्यक्ष आदि भाजपा में शामिल हुए हैं। अभी तो यह सिलसिला शुरू हुआ है।

ममता बनर्जी की कैबिनेट में रहे सुवेन्दु अधिकारी तृणमूल और खुद ममता के लिए सबसे करारा झटका हैं,क्योंकि वह पार्टी के लिए नींव का पत्थर रहे हैं। भाजपा में शामिल करते हुए अमित शाह ने उन्हें पार्टी का ध्वज सौंपा और गले से लगाया। सुवेन्दु ने ही मिदनापुर और नंदीग्राम आंदोलन के दौरान ममता को आधार और परिचय दिलाया। उस दौर में वहां भूमि अधिग्रहण कानून के खिलाफ बड़ा किसान आंदोलन छेड़ा गया था, जिसमें 14 किसानों की मौत भी हुई थी। उसके बाद सुवेन्दु को पार्टी में नंबर 2 माना जाता रहा था। इन इलाकों के अलावा, बांकुरा, झारग्राम, मालदा, मुर्शिदाबाद आदि इलाकों में कुल 45-50 सीटों पर अधिकारी परिवार का वर्चस्व माना जाता है। सुवेन्दु तब से ममता के साथ हैं, जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे और वह कोलकाता में ममता के घर आए थे। तब 1999 में उन्होंने लोकसभा चुनाव में एनडीए का समर्थन किया था। उन्होंने जनसभा को भी संबोधित किया और स्पष्ट किया कि उन्होंने ममता और तृणमूल का साथ क्यों छोड़ना पड़ा। यह राजनीतिक पालाबदल बंगाल के चुनाव में एक निर्णायक आयाम साबित हो सकता है। कमोबेश एक पुख्ता जनाधार भाजपा को जरूर हासिल हुआ है।

बगावत और हिंसा बंगाल की राजनीति के 'सहोदर' रहे हैं। वहां धर्म और जाति की सियासत इतनी गहरी नहीं है, जितना व्यापक चलन हिंसा का है। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा और प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय सरीखे नेताओं का दावा है कि पार्टी के 135 कार्यकर्ताओं की हत्या की जा चुकी हैं, जबकि अमित शाह ने 300 कार्यकर्ताओं की हत्या का सार्वजनिक उल्लेख किया है। यदि नेशनल क्राइम रिकाॅर्ड ब्यूरो के आंकड़े देखे जाएं, तो तृणमूल के कार्यकर्ताओं की भी हत्याएं की गई हैं। हर साल औसतन 10-12 कार्यकर्ता मारे जाते हैं। विडंबना है कि इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री मोदी को भी बोलना पड़ा है। बिहार में चुनावी जीत के बाद भाजपा मुख्यालय में उत्सव मनाने के दौरान प्रधानमंत्री ने बिना नाम लिये कहा था कि जो हमसे लोकतंत्र के आधार पर नहीं लड़ सकते, वे भूल जाएं कि राजनीतिक हत्याओं से मत प्राप्त किया जा सकता है। भाजपा कार्यकर्ताओं को मौत के घाट उतार कर मंसूबे पूरे नहीं होंगे। हमें चेतावनी न दें।'

बंगाल में वामदलों के 34 साल के शासन के दौरान 1 लाख से अधिक हत्याएं की गईं। 2018 के पंचायत चुनावों में ही 50 हत्याएं की गईं। चुनाव में नामांकन भरना मुश्किल होता था। वाममोर्चा की विरासत ममता ने ग्रहण की है। बंगाल में हिंसक चुनाव हमेशा रहे हैं। क्या रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, अरविन्द घोष,रवीन्द्र नाथ टैगोर और विद्यासागर सरीखी विभूतियों की ज़मीन पर चुनाव हिंसा के बिना नहीं हो सकते? यह संवेदनशील सवाल है। ममता का आरोप है कि भाजपा दंगाइयों की पार्टी है। बहरहाल बंगाल में विधानसभा चुनाव अप्रैल-मई, 2021 में होने हैं। सदन में कुल सीट 294 हैं,जिनमें से 211 तृणमूल के पास हैं और 2016 के चुनाव में भाजपा को मात्र 3 सीटें ही नसीब हुई थीं। कांग्रेस नगण्य राजनीतिक ताकत है और वाममोर्चा की भी पतली हालत है। अब सीधा मुकाबला ममता और भाजपा के बीच है। क्या मौजूदा हालात और समीकरणों के तहत ममता को पराजित किया जा सकता है? वह 2011 से ही सरकार में हैं, लिहाजा सत्ता विरोधी लहर तो होनी चाहिए, लेकिन ममता संघर्षशील नेता हैं। उन्हें किसी भी सूरत में नकारा नहीं जा सकता।

चौंकाने वाला तथ्य यह है कि चुनाव सांप्रदायिक आधार पर होंगे। यानी हिंदू बनाम मुसलमान! बंगाल में 27 फीसद मुस्लिम आबादी है, जिसका प्रभाव 16 जिलों में है। नदिया, हावड़ा, कूचबिहार,मालदा, उत्तर और दक्षिण 24 परगना, बीरभूम, मुर्शिदाबाद और दिनाजपुर आदि इलाकों में 25 फीसद से ज्यादा मुस्लिम आबादी है। ममता का फोकस उसी पर है। उन्होंने इमामों के लिए मानदेय की व्यवस्था की है, लेकिन ममता ने हिंदू वोट बैंक को भी लुभाने की कोशिश की है। मुख्यमंत्री ने करीब 37,000 दुर्गा समितियों को 50-50 हजार रुपये दिए हैं। हिंदू पुरोहितों को मकान और मानदेय दिए जा रहे हैं। सोशल मीडिया पर काली मां की पूजा का प्रसारण कराया जा रहा है। लिहाजा ममता को नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा। भाजपा के नेता मंदिर-मंदिर घूम रहे हैं, पूजा-पाठ भी कर रहे हैं और दुर्गा पूजा, रामनवमी और हनुमान जयंती का उल्लेख कर रहे हैं। स्वामी विवेकानंद और खुदीराम बोस सरीखे पूरे बंगाल के लिए आदरणीय और सांस्कृतिक प्रतीक हैं। बेशक भाजपा का फोकस ममता सरकार के भ्रष्टाचार और भतीजावाद पर है, अमित शाह ने 'सोनार बंगाल' बनाने की बात भी कही है,लेकिन ममता अपने 10 सालों के काम पर वोट मांग रही हैं। फिलहाल मुस्लिम नेता ओवैसी बंगाल के चुनावी परिदृश्य में नहीं हैं। यदि वह भी मैदान में आते हैं, तो तय है कि मुस्लिम वोट बंटेगा और भाजपा को फायदा हो सकता है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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