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हिंदी दिवस विशेष : हिंदी की ऐसी दुर्गति, 19 सालों में 150 किताबें छाप सकी अकादमी, उसमें भी 'समग्र छत्तीसगढ़' छोड़ बाकी डंप

हिंदी की आवश्यकता लोगाें को प्रतिदिन होती है, लेकिन इसकी उपयोगिता को समझने का प्रयास कोई नहीं करता। हिंदी दिवस पर चर्चा का दायरा जरूर एक दिन के लिए बढ़ता हुआ दिखाई देता है, पर दिवस बीतने के बाद हिंदी की चर्चा बंद बक्से के भीतर होती है।

हिंदी दिवस विशेष : हिंदी की ऐसी दुर्गति, 19 सालों में 150 किताबें छाप सकी अकादमी, उसमें भी समग्र छत्तीसगढ़ छोड़ बाकी डंप
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रायपुर. हिंदी की आवश्यकता लोगाें को प्रतिदिन होती है, लेकिन इसकी उपयोगिता को समझने का प्रयास कोई नहीं करता। हिंदी दिवस पर चर्चा का दायरा जरूर एक दिन के लिए बढ़ता हुआ दिखाई देता है, पर दिवस बीतने के बाद हिंदी की चर्चा बंद बक्से के भीतर होती है।

हिंदी को बढ़ावा देने और क्षेत्रीय भाषा में हिंदी के विकास के लिए हिंदी ग्रंथ अकादमी की कल्पना कर 2006 में इसकी स्थापना की गई, जो उच्च शिक्षा विभाग और विश्वविद्यालयों के लिए संबधित है। हिंदी ग्रंथ अकादमी को 19 वर्ष बीत चुके हैं, पर स्नातक स्तर पर पढ़ाई जाने वाली आधार पाठ्यपुस्तकों को आज तक बदला नहीं गया है। यही कारण है कि पुस्तक प्रकाशन की संख्या कम है। अकादमी अपने उद्देश्य की राह से भटक चुकी है। किताबों की मार्केटिंग नहीं होने से अकादमी में लाखों की किताबें डंप पड़ी हैं। आलमारियों व गोदामों में रखीं पुस्तकें धूल फांक रही हैं। साफ-सफाई के अभाव में कीमती किताबें खराब होने की भी आंशका है। जानकारों का कहना है, मौलिक किताबों का प्रकाशन कर चुकी हिंदी ग्रंथ अकादमी को अब बेहतर लेखक और साहित्यकार नहीं मिल रहे हैं। अकादमी का संचालन शुरुआत से अस्थाई है।

19 वर्षों में 150 किताबों का प्रकाशन

उच्च शिक्षा विभाग 2005 से स्नातक स्तर पर पढ़ाई जाने वाली आधार पाठ्यपुस्तकों को बदलने की बात कर रहा है, लेकिन अभी-तक यह साकार नहीं हो पाया है। जानकारों के अनुसार मध्यप्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी के आधार पाठ्यक्रम को ही आज तक छत्तीसगढ़ के समस्त महाविद्यालयों में पढ़ाया जा रहा है। पूर्व संचालक शशांक शर्मा का कहना है, अपने कार्यकाल में पाठ्यपुस्तकों को बदलने के लिए कमेटी तैयार कर अवलोकन के बाद सचिव को प्रतिवेदन सौंपा था, लेकिन कार्य आगे नहीं बढ़ सका। मेरी जानकारी के अनुसार अकादमी में समग्र छत्तीसगढ़ ऐसी किताब थी, जिसकी हमने 25 हजार प्रतियां निकाली थीं।

किताबों की मार्केटिंग का अभाव

किताब प्रकाशन के बाद लोगों तक उसे पहुंचाने का काम मार्केटिंग से ही संभव है। अकादमी में किताबें डंप होने के पीछे का कारण मार्केटिंग नहीं होना है। किताबें छपाई के इंतजार में महीनों से पड़ी हैं। वर्तमान में मार्केटिंग नहीं होने से किताब बाजार तक नहीं पहुंचती और अकादमी में ही सिमटकर रह जाती है। विभाग को नीति बनाकर उस पर काम करना चाहिए। विभाग की पुस्तकें जब लोगों को कम दाम में मिलेंगी, तभी अकादमी काे लाभ मिल पाएगा।

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