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World Environment Day : एक एकड़ में फैला 400 साल पुराना वट वृक्ष, संरक्षण के लिए लड़ाई में बीत गए 16 साल

जिले की ओडिशा सीमा से लगे बाम्हनसरा में मौजूद 400 साल पुराने वट वृक्ष को बचाने की मुहिम 16 बरस बाद अब सफल होते दिख रही है। इस विशाल पेड़ को सरंक्षित करने 2005 से ग्रामीणों ने प्रयास जारी रखा और इसका नतीजा बस आने ही वाला है। फाइलों में बरसों उलझने के बाद अभी हाल ही में अच्छी खबर मिली कि जिला प्रशासन ने 400 साल पुराने इस पेड़ के संरक्षण के लिए पर्यटन संरक्षण मंडल को पत्र लिखा है।

World Environment Day : एक एकड़ में फैला 400 साल पुराना वट वृक्ष, संरक्षण के लिए लड़ाई में बीत गए 16 साल
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रत्नेश सोनी. महासमुंद. जिले की ओडिशा सीमा से लगे बाम्हनसरा में मौजूद 400 साल पुराने वट वृक्ष को बचाने की मुहिम 16 बरस बाद अब सफल होते दिख रही है। इस विशाल पेड़ को सरंक्षित करने 2005 से ग्रामीणों ने प्रयास जारी रखा और इसका नतीजा बस आने ही वाला है। फाइलों में बरसों उलझने के बाद अभी हाल ही में अच्छी खबर मिली कि जिला प्रशासन ने 400 साल पुराने इस पेड़ के संरक्षण के लिए पर्यटन संरक्षण मंडल को पत्र लिखा है।

हालांकि, स्थानीय स्तर पर भी वन विभाग द्वारा कई बार इसके लिए मौके पर जाकर प्रोजेक्ट और प्राक्लन तो तैयार किया गया लेकिन, फाइलें आगे नही बढ़ पा रही थी, जिसके कारण इसके सरंक्षण के प्रयास आज तक अधूरे ही रह गए। जिले के पर्यावरण संरक्षण में कार्यकर रही संस्था ग्रीन केयर सोसायटी द्वारा लगातार इसे संरक्षित करने का प्रयास किया गया। सोसायटी के विश्वनाथ पाणीग्रही, विजय शर्मा एवं अमुजुरी विश्वनाथ ने जिला प्रशासन को धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा है कि यह वृक्ष जिला ही नहीं, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ के लिए गौरव है। एक एकड़ में फैला यह वृक्ष अब संरक्षण की बाट जोह रहा है।

महिला ने दान दी जमीन

उल्लेखनीय है कि यह पेड़ निजी जमीन पर पिछले 400 सालों से अडिग है। संरक्षण की पहल शुरू हुई तो शासन द्वारा निजी जमीन पर रकम खर्च करने की अड़चन सामने आई। तब यहां के स्थानीय निवासियों और पर्यावरण विदों के साथ बाम्हनसरा बरगद वृक्ष संरक्षण समिति बनाई गई। श्रीमती मिरगिन बाई पति देवसिंग द्वारा स्टाम्प में संरक्षण एवं रोड के लिए वन विभाग को भूमिदान दिया। जिसके बाद भी संरक्षण की पहल को अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका।

यह है वट वृक्ष का इतिहास

वट वृक्ष के उत्तर पूर्व में टेराकोटा के अवशेष प्राप्त होते हैं, जो प्राचीन बसाहट के संकेत हैं। इस वट वृक्ष पर बस्तरहिन माता स्थापित हैं। बस्तरहिन माता की स्थापना के सम्बंध में ग्राम बैगा की जानकारी अनुसार पूजा करते उनकी सातवीं पीढ़ी है, परम्परा अनुसार यहां के पूर्व शासक सुअरमार जमीदार के वंशज दशहरे पूर्व आकर प्रथम पूजा करते हैं, पश्चात सुअरमार राज की शेष देवी देवताओं की पूजा प्रारम्भ होती थी।

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