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वर्ल्ड टीबी-डे स्पेशल: बनें सजग-रहें सुरक्षित

हमारे देश में करीब 5 से 15 प्रतिशत लोग टीबी से ग्रस्त हैं।

वर्ल्ड टीबी-डे स्पेशल: बनें सजग-रहें सुरक्षित
नई दिल्ली. हमारे देश में करीब 5 से 15 प्रतिशत लोग टीबी से ग्रस्त हैं। इस बीमारी का प्रॉपर ट्रीटमेंट कराना जरूरी है। ऐसा न करने पर दोबारा टीबी हो सकती है। टीबी होने की कई वजहें हैं। जानते हैं, टीबी होने के कारण, लक्षण, उपचार और सावधानियों के बारे में। वर्ल्ड टीबी-डे 24 मार्च को बनाया जाता है।
टीबी एक इंफेक्टिव डिजीज है। यह ट्यूबरकुली बैसिलस नामक बैक्टीरिया के कारण होती है। इसके होने का एक कारण बैलेंस्ड और न्यूट्रीशस डाइट न लेना है। यही कारण है कि यह बीमारी ऐसे लोगों को अपनी चपेट में ज्यादा लेती है, जो भरपूर फिजिकल लेबर करते हैं, लेकिन लेबर के मुताबिक न्यूट्रीशस डाइट नहीं लेते हैं। इस वजह से उनका शरीर कमजोर हो जाता है और वे इंफेक्शन का शिकार हो जाते हैं। यह बीमारी बहुत तेजी से एक से दूसरे में फैलती है। इसलिए अगर टीबी पेशेंट साफ-सफाई का ध्यान नहीं रखता है, जगह-जगह थूकता है, मुंह पर बिना रुमाल या हाथ रखे खांसता है, तो इसके बैक्टीरिया हवा में फैल जाते हैं। फिर सांस के साथ ये बैक्टीरिया अपने संपर्क में आने वाले व्यक्ति के फेफड़ों में पहुंचकर उसे भी इंफेक्टेड कर देते हैं।
ट्यूबरकुली बैसिलस बैक्टीरिया से इंफेक्टेड होने के बाद आमतौर पर कई महीनों तक पेशेंट में कोई लक्षण दिखाई नहीं देता है। लेकिन बाद में थकान, भूख न लगने, शाम के समय हल्का-हल्का बुखार रहने, बलगम वाली खांसी या थूक में खून का आना, खांसी का दो सप्ताह से ज्यादा समय तक बने रहना, सीने में दर्द, सांस लेने में दिक्कत जैसे लक्षण प्रकट होने लगते हैं।
पेशेंट में टीबी के लक्षण दिखाई देने पर उसके चेस्ट का एक्स-रे और थूक की जांच की जाती है। एक्स-रे में लंग्स में धब्बे दिखाई देने, थूक की जांच में ट्यूबरकुली बैसिलस या एएफबी मिलने और ट्यूबरकुलीन टेस्ट के पॉजिटिव आने पर टीबी की पुष्टि हो जाती है। इनके अलावा, ब्लड और यूरीन टेस्ट के जरिए भी टीबी का पता लगाया जाता है।
जिन लोगों को टीबी के बैक्टीरिया का इंफेक्शन बचपन में हो जाता है, उनमें यह बीमारी आगे चलकर घातक रूप ले लेती है। ऐसे स्थिति में ये बैक्टीरिया दूसरे अंगों को प्रभावित कर देते हैं। ये बैक्टीरिया ब्लड के जरिए ब्रेन में जाकर ट्यूबरकुला मेनिनजाइटिस, ब्रेन टीबी जैसी बीमारियां उत्पन्न करते हैं। अगर ये बैक्टीरिया बोन में चले जाते हैं तो पेशेंट को बोन टीबी हो जाती है। इसके अलावा, किडनी की टीबी, एबडॉमिनल यानी पेट की टीबी भी इस बैक्टीरिया के कारण हो सकती है। दूसरे प्रकार की टीबी के मुकाबले पल्मोनरी यानी लंग्स की टीबी ज्यादा लोगों को अपनी चपेट में लेती है। यह टीबी लंग्स के ऊपरी हिस्से को प्रभावित करती है। समय पर इस बीमारी का इलाज न कराने पर यह काफी घातक साबित हो सकती है और इसके ठीक होने में लंबा समय लगता है। इस बीमारी में लापरवाही बरतने पर पेशेंट की जान भी जा सकती है।
पहले के मुकाबले अब इसके ट्रीटमेंट में कम समय लगता है। इसके ट्रीटमेंट के लिए सामान्य तौर पर पेशेंट को एंटी टीबी यानी तपेदिक रोधी मेडिसिन और इंजेक्शन दिया जाता है। शुरुआत के दो-तीन महीने तीन से चार दवाइयों का मिर्शण पेशेंट को दिया जाता है। उसके बाद छह से अठारह महीने तक दो से तीन दवाइयों का मिर्शण पेशेंट को दिया जाता है। एक दिन में दवा की कितनी खुराक पेशेंट को लेनी है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि टीबी से कौना सा ऑर्गन इंफेक्टेड है। आमतौर पर सुबह खाली पेट ही ये दवाइयां लेनी होती हैं।
नीचे की स्लाइड्स में पढ़िए, बचाव के उपाय -
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