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विश्व स्वास्थ्य दिवस 2018ः विकलांगता दूर करने का उपाय है ''आकाश मुद्रा'', जानें इसका सही तरीका

आकाश-मुद्रा ऐसे लोगों के जीवन में ऊर्जा भरने का काम करती है। यह मुद्रा अंगूठे और मध्यमा यानी अग्नि औरआकाश-तत्व के मेल से बनती है। ध्वनि की उत्पत्ति भी आकाश में ही होती है और ध्वनि कानों के माध्यम से हमारे शरीर में पहुंचती है। लिहाजा, कान से संबंधित कई रोगों में- चाहे कम सुनाई देता हो, कान बहता हो, कानों में झनझनाहट की समस्या हो-इन सब में भी आकाश मुद्रा लाभकारी है।

विश्व स्वास्थ्य दिवस 2018ः विकलांगता दूर करने का उपाय है
मानसिक और शारीरिक रूप से विकलांग व्यक्ति भीतर से एक प्रकार का खालीपन और निरर्थकता महसूस करता है। खोखलेपन का यह बोध उसे अन्य कई रोगों से भी ग्रसित करता है। आकाश-मुद्रा ऐसे लोगों के जीवन में ऊर्जा भरने का काम करती है।
यह मुद्रा अंगूठे और मध्यमा यानी अग्नि औरआकाश-तत्व के मेल से बनती है। ध्वनि की उत्पत्ति भी आकाश में ही होती है और ध्वनि कानों के माध्यम से हमारे शरीर में पहुंचती है। लिहाजा, कान से संबंधित कई रोगों में- चाहे कम सुनाई देता हो, कान बहता हो, कानों में झनझनाहट की समस्या हो-इन सब में भी आकाश मुद्रा लाभकारी है।
जिन बुजुर्गों को अधिक उम्र के कारण सुनाई देना कम हो जाता है, इस मुद्रा से उनकी सुनने की शक्ति बढ़ जाएगी। अग्नि और आकाश तत्व के मेल से खुलेपन और विस्तार का बोध होता है और शून्यता समाप्त होती है। यह मुद्रा आज्ञा चक्र और सहस्त्रार पर कंपन पैदा करती है, जिससे दिव्य शक्तियों की अनुभूति होती है और आंतरिक शक्तियों का विकास होता है।
अगर यह मुद्रा जालंधर बंध लगाकर की जाए तो इसके चमत्कारिक लाभ होते हैं क्योंकि आकाश-तत्व का संबंध विशुद्धि चक्र से है। जालंधर-बंध का अर्थ है ठोढ़ी को सीने से लगाना। हृदय का संबंध भी आकाश तत्व से ही है, इसलिए आकाश मुद्रा हमारे हृदय को भी स्वस्थ रखती है।
इससे हड्डियां मजबूत होती हैं और कैल्शियम की कमी दूर होती है। लिहाजा, ऑस्टियोपोरोसिस में भी उपयोगी है। दाएं हाथ से पृथ्वी मुद्रा(अंगूठे और अनामिका के शीर्ष को मिलाने से बनती है) और बाएं हाथ से आकाश मुद्रा बनाने से जोड़ों के दर्द में शीघ्रता से आराम मिलता है।
यह मुद्रा लगाकर यदि भोजन किया जाए तो अन्न गले में नहीं फंसता। इस मुद्रा से शरीर पूरी तरह कफमुक्त हो जाता है। जबड़े की जकड़न के मामले में इस मुद्रा का असर तुरंत दिखता है। यह मुद्रा खालीपन के अनुभव को दूर करती है और आदमी निरर्थकता की मनोदशा से शीघ्र उबर जाता है।
कैसे करें: मध्यमा और अंगूठे के शीर्ष को मिलाएं। शेष अंगुलियों को सीधा रखें।

कितनी देरः लंबे अभ्यास की आवश्यकता होती है। रोजना न्यूनतम एक घंटा करें।

(लेखक भारतीय योग एवं प्रबंधन संस्थान से संबद्ध हैं)

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