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एंटी बयोटिक दवाओं के ज्यादा इस्तेमाल से हो सकता है लाइलाज रोग

एंटिबायोटिक रेस्टिेंस को रोकने के लिए नवंबर माह में विश्व एंटिबायोटिक जागरुकता सप्ताह का आयोजन किया जाता है। दरअसल आज के दौर में बीमारी छोटी हो या बड़ी लोग उससे छुटकारा पाने के लिए लोग अक्सर दवाईयों का सेवन करना पसंद करते हैं। कई बार तो लोग बिना डॉक्टर की सलाह के खुद से ही दवा ले लेते हैं। जिससे कई बार नई बीमारी के रूप में इसके साइड इफेक्ट सामने आते हैं।

एंटी बयोटिक दवाओं के ज्यादा इस्तेमाल से हो सकता है लाइलाज रोग
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एंटिबायोटिक रेस्टिेंस को रोकने के लिए नवंबर माह में विश्व एंटिबायोटिक जागरुकता सप्ताह का आयोजन किया जाता है। दरअसल आज के दौर में बीमारी छोटी हो या बड़ी लोग उससे छुटकारा पाने के लिए लोग अक्सर दवाईयों का सेवन करना पसंद करते हैं। कई बार तो लोग बिना डॉक्टर की सलाह के खुद से ही दवा ले लेते हैं। जिससे कई बार नई बीमारी के रूप में इसके साइड इफेक्ट सामने आते हैं।
हर साल की ही तरह इस बार भी एंटिबायोटिक रेस्टिेंस को रोकने के लिए नवंबर माह में विश्व एंटिबायोटिक जागरुकता सप्ताह का आयोजन किया जा रहा है। इसी के अंतर्गत एम्स भोपाल में आईसीएमआर नई दिल्ली, एनएचएम व स्वास्थ्य विभाग मध्य प्रदेश के संयोजक में यह कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है।

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एंटिबायोटिक दवाओं का अनुचित प्रयोग बड़ी समस्याएं पैदा कर सकता है। इससे एंटिबायोटिक रेजिस्टेंस खतरा बढ़ता है। परिणाम स्वरूप उपलब्ध एंटिबायोटिक समुचित रूप से काम नहीं कर पाते हैं। इसी के अंतर्गत एम्स भोपाल में आईसीएमआर नई दिल्ली, एनएचएम व स्वास्थ्य विभाग मध्य प्रदेश के संयोजक में यह कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है
एंटिबायोटिक दवाओं का अनुचित प्रयोग बड़ी समस्याएं पैदा कर सकता है। इससे एंटिबायोटिक रेजिस्टेंस खतरा बढ़ता है। परिणाम स्वरूप उपलब्ध एंटिबायोटिक समुचित रूप से काम नहीं कर पाते हैं।
इस अवसर पर एम्स के डायरेक्टर डॉ. सरमन सिंह ने कार्यक्रम की गतिविधियों पर प्रकाश डाला। संयुक्त निदेशक एनएचएम पंकज शुक्ला ने बताया कि मध्य प्रदेश के जबलपुर, इंदौर, ग्वालियर तथा भोपाल जैसे विभिन्न स्थानों पर प्रशिक्षण आयोजित किए गए हैं। ये प्रशिक्षित चिकित्सक जिलों के लोग स्वास्थ्य केंद्रों तथा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में कार्यरत चिकित्सकों तथा स्वास्थ्य कार्यकतार्ओं को प्रशिक्षित करेंगे।

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