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टीवी के ये 5 कलाकार हैं फोबिया के मरीज

फोबिया यानि डर, हर इंसान को किसी न किसी बात से डर लगता है। हमारे टीवी सितारे भी अपने खास तरह के डर, फोबिया से परेशान रहते हैं। वे इससे उबरने की कोशिश भी करते हैं। बता रहे हैं, कुछ जाने-माने टीवी सितारे अपने डर, फोबिया के बारे में।

टीवी के ये 5 कलाकार हैं फोबिया के मरीज

फोबिया यानि डर, हर इंसान को किसी न किसी बात से डर लगता है। हमारे टीवी सितारे भी अपने खास तरह के डर, फोबिया से परेशान रहते हैं। वे इससे उबरने की कोशिश भी करते हैं। बता रहे हैं, कुछ जाने-माने टीवी सितारे अपने डर, फोबिया के बारे में।

बिजल जोशी

कई लोगों को हाइट्स (ऊंचाई) से डर लगता है। मैं भी ऊंचाई से नीचे नहीं झांक सकती हूं। मुझे भी हाइट्स से बहुत डर लगता है। दूसरा मुझे छिपकली से बहुत डर लगता है, जिसे आप फोबिया कह सकते हैं। मुझे याद है, जब मैं छोटी थी, तब हमारे बाथरूम में एक छिपकली आ गई थी, उसके डर से मैं पूरे दिन नहा ही नहीं पाई थी। खैर, ऊंचाई के अपने डर को निकालने के लिए मैं स्काई ड्राइविंग के लिए सोच रही हूं, जिससे मेरा यह डर एकदम से दूर हो जाए। जहां तक छिपकली के डर को दूर करने की बात है, तो शायद यह कभी नहीं हो पाएगा। अगर आज भी मेरे बाथरूम में छिपकली आ जाए तो मैं दो दिन नहीं नहाऊंगी, जब तक कि तसल्ली न हो जाए कि छिपकली चली गई है।

कृष्णा भारद्वाज

मुझे कहने में बहुत शर्मिंदगी महसूस हो रही है कि मुझे कॉकरोच से बहुत डर लगता है। यह डर मेरी मॉम की वजह से मेरे मन में घर कर गया है। बचपन से अपनी मां को मैंने कॉकरोच को देखकर चिल्लाते देखा है, उन्हें देखकर मैं और मेरा छोटा भाई भी जोर से चिल्लाते थे। मेरे डैड हमेशा इस बात को लेकर हम दोनों भाइयों पर खूब हंसते हैं। वो कहते हैं, एक बार उसे करीब से देखो, वह सिर्फ एक तरह का जंतू है और कुछ नहीं। मेरे डर को निकालने के लिए एक बार उन्होंने मेरे कंधे पर एक कॉकरोच रख दिया। उस दिन तो मानो मेरी जान निकल गई थी। मैं जोर से चीखा था और मैंने कुछ दिन अपने डैड से बात भी नहीं की थी। खैर, घर में एक छोटा-सा भी कॉकरोच न आए, इसलिए हम घर को हमेशा क्लीन रखते हैं।

रिधिमा तिवारी

मुझे हाइट और पानी दोनों का फोबिया है। बहुत ही अफसोस कि बात है कि लोग बीच के किनारे रोमांटिक पल गुजारना पसंद करते हैं लेकिन मुझे समुद्र देखकर अजीब-सी घबराहट होती है। एक बार मैं बैंकॉक गई हुई थी, अपनी तेलुगू फिल्म की शूटिंग के लिए। मेरे साथी स्विमिंग पूल में एंज्वॉय कर रहे थे, उन्होंने मुझे बहुत समझाकर लाइफ जैकेट पहनाकर पूल में उतारा, क्या कहूं उस दिन तो मेरी जान ही निकल गई। मैं जोर से चिल्लाने लगी, ‘मुझे बाहर निकालो, बाहर निकालो।’ वहां उस दिन जो तमाशा हुआ, उसके लिए मैं आज भी शर्मिंदा हूं। दरअसल, यह डर मेरे अंदर बचपन से ही था, इसलिए मैं स्विमिंग भी नहीं सीख पाई।

महिमा कोठारी

एक बार की बात है, मैं कहीं गई थी, ऊपर के दसवें माले पर लिफ्ट से जा रही थी, तभी अचानक से लिफ्ट बंद पड़ गई। मैं बहुत डर गई, और उस दिन से लिफ्ट का फोबिया मेरे दिलो-दिमाग में घर कर गया। तब से मैं लिफ्ट में अकेले जाने से डरती हूं। मुझे लगता है कि मानो मैं लिफ्ट में गई और लिफ्ट अचानक से बंद पड़ गई तो क्या होगा? वैसे तो मैं लिफ्ट में जाने से बचती हूं लेकिन कभी जाना हो तो अनजान जगह की लिफ्ट में एंटर करते ही सबसे पहले इमर्जेंसी बटन, अलार्म कहां है, सब चेक कर लेती हूं, उसके आस-पास ही हाथ रखती हूं। ऐसा इसलिए करती हूं कि लिफ्ट बंद पड़े तो मैं तुरंत बटन दबा दूं। इसके साथ ही अपने आपको बार-बार समझाती भी हूं कि ऐसा नहीं होगा, एक बार जो हो गया, सो हो गया।

पार्थ समथान

मुझे फोबिया है अपने फैमिली मेंबर्स को खोने का, मैं अपने करीबियों के बहुत क्लोज हूं। मैं खुद जल्दी कभी उन्हें छोड़कर दूर नहीं जाता। मेरा परिवार, मेरे दोस्त न सिर्फ मेरी जिंदगी का अहम हिस्सा हैं बल्कि मेरे लिए तो वो मेरी जिंदगी ही हैं। मुझे सबसे प्यारे हैं। कभी-कभार में सपने में देखता भी हूं कि मेरा कोई अपना मुझसे दूर हो रहा है तो सपने में भी मैं घबरा जाता हूं। अगले दिन सुबह भी मुझे एक अजीब-सा डर महसूस होता है। दो-तीन दिनों के बाद मैं नॉर्मल हो पाता हूं। इस फोबिया से बाहर निकलने के लिए मैं अपने आपको अकसर समझाता हूं कि ऐसा कुछ नहीं होगा, कभी नहीं होगा।

नीलू वाघेला

मुझे दो चीजों का फोबिया है, पहला हाइट्स यानी कि ऊंचाई का, मैं ऊपर से नीचे नहीं देख सकती, कोशिश भी करूं तो सहम जाती हूं। मुझे खुद अपने इस फोबिया की जानकारी नहीं थी, मुझे इस बारे में तब पता चला जब शूटिंग के लिए मुझे ऊंचे टावर पर चढ़ाना पड़ा था। दूसरा फोबिया है, फास्ट ड्राइविंग का, मैं ऐसी कार में नहीं बैठ सकती, जो बहुत तेज चल रही हो। दोनों ही चीजों के डर से बाहर निकलने के लिए मैं अपने आपको बार-बार समझाती हूं कि ये सिर्फ एक तरह का डर है और कुछ नहीं। मुझे लगता है, ऐसे डर से बाहर निकलने में विल पावर बहुत काम आती है।

साहिल चड्ढा

मुझे फोबिया है फेलियर, इंपरफेक्शन का। मैं बिल्कुल सह नहीं पाता कि मैं असफल हो गया हूं या फिर यह कहूं कि मैं परफेक्ट साबित नहीं हो पाया। मुझे याद है, कॉलेज के दिनों में मैं एक कॉम्पिटिशन में अपनी टीम को रिप्रेजेंट कर रहा था, अफसोस कि हम क्वालीफाई नहीं कर पाए। उस दिन मैं किसी से आंख मिलाकर बात नहीं कर पाया। तब मुझे लगा कि मैं फेलियर को फेस नहीं कर सकता यानी मुझे फेलियर का फोबिया है, इसलिए उस दिन से मैं और मेहनत करने लगा। अब मैं अपने आपको बताता हूं कि हार-जीत, सफलता-असफलता जिंदगी का हिस्सा है। जब भी जो मेरे हिस्से में आए, उसे मुझे एक्सेप्ट कर लेना चाहिए। इसलिए अब मैं अपने फेलियर को पॉजिटिवली लेता हूं और सच्चाई को अपनाने की कोशिश करता हूं।

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