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मुमताज को गाने में उठाने की कीमत संजय खान को पड़ी भारी, किताब Best Mistakes Of My Life में किया जिक्र

एक्टर, फिल्ममेकर संजय खान ने ऑटोबायोग्राफी ‘बेस्ट मिस्टेक्स ऑफ माय लाइफ’ में अपनी जिंदगी के तमाम पहलुओं को साझा किया है।

मुमताज को गाने में उठाने की कीमत संजय खान को पड़ी भारी, किताब Best Mistakes Of My Life में किया जिक्र

एक्टर, फिल्ममेकर संजय खान ने ऑटोबायोग्राफी ‘बेस्ट मिस्टेक्स ऑफ माय लाइफ’ में अपनी जिंदगी के तमाम पहलुओं को साझा किया है। इसमें उनका बचपन, मुंबई में कलाकार बनने का सफर और वह दुर्घटना जिसने जीवन बदल दिया, सबके बारे में विस्तार से लिखा है।

हिंदी सिनेमा में 70-80 के दशक में एक्टर संजय खान बहुत पॉपुलर थे। उन्होंने ‘हकीकत’, ‘दोस्ती’, ‘एक फूल दो माली’, ‘दस लाख’, ‘इंतकाम’, ‘धुंध’, ‘उपासना’, ‘मेला’ और ‘काला धंधा गोरे लोग’ जैसी कई यादगार फिल्में कीं।

एक्टर के बाद बतौर डायरेक्टर, प्रोड्यूसर भी संजय खान ने काम किया, उन्होंने ‘चांदी सोना’ और ‘अब्दुल्ला’ जैसी हिट फिल्में बनाईं। इसके बाद टीवी के लिए ‘स्वॉर्ड ऑफ टीपू सुल्तान’ को भी उन्होंने डायरेक्ट किया, इसमें टीपू सुल्तान का किरदार भी निभाया था।

इन दिनों वह अपनी ऑटोबायोग्राफी ‘बेस्ट मिस्टेक्स ऑफ माय लाइफ’ को लेकर चर्चा में हैं। यह किताब पेंग्विन इंडिया से पब्लिश हुई है। हाल ही में संजय खान से मुलाकात हुई। यहां प्रस्तुत है उनसे हुई बातें उन्हीं ही जुबानी।

ऑटोबायोग्राफी लिखने की वजह

मैं 78 साल का हो चुका हूं। मेरी जिंदगी में कई टर्निंग प्वाइंट्स आए। इसके बावजूद मैं अपनी जिंदगी पर किताब लिखने को लेकर सीरियस नहीं था। लेकिन मेरे एक अजीज दोस्त तीर्थ ठाकुर, जो चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया भी रहे हैं, एक बार मुझसे मिलने आए।

तीर्थ जी ने कहा कि जब भी वह मुझसे मिलते हैं तो बहुत प्रभावित होते हैं। उनका कहना था कि लोग मुझे भूल जाएं, उससे पहले अपनी जिंदगी को एक किताब के जरिए बयां करना चाहिए।

अपने दोस्त की बात मानकर मैंने ऑटोबायोग्राफी लिखना शुरू किया। बतौर राइटर, डायरेक्टर मैंने पहले काम किया है तो जानता हूं कि फिल्मों का टाइटल कैची होना चाहिए। ऐसे में मैंने सोचा कि अपनी ऑटोबायोग्राफी का टाइटल भी हटकर रखूं।

यही वजह है कि इसका टाइटल ‘बेस्ट मिस्टेक्स ऑफ माय लाइफ’ रखा। इससे लोगों को ऑटोबायोग्राफी पढ़ने में इंट्रेस्ट पैदा होगा। मैंने बहुत ईमानदारी से अपनी जिंदगी के बारे में ऑटोबायोग्राफी में लिखा है।

समेटा है अपना हर पहलू

ऑटोबायोग्राफी में मेरा पूरा जीवन है। इसमें मेरा बचपन और मुंबई आने का सफर भी शामिल है। हम छह भाई-बहन थे। मैं, फिरोज भाई साहब (फिरोज खान), अकबर, समीर और दो बहनें। हमारे वालिद साहब बिजनेसमैन थे।

मेरा जन्म बैंग्लुरु में हुआ था। अम्मी जान ने हम सभी बच्चों को अच्छी परवरिश दी। दिन में पांच मर्तबा नमाज पढ़ने वाली अम्मी ने यही सीख दी कि दुनिया में मानवता से बढ़कर कोई और धर्म नहीं है।

परिवार के अलावा मुझे अपने दोस्त भी बहुत प्यारे थे, उनका मेरी जिंदगी में बहुत योगदान रहा। मैं जब बैंग्लुरु में था तो कुछ खास दोस्त मुझसे हमेशा कहानियां सुनाने की जिद करते थे। वे कहते थे कि मैं हर दिन उन्हें एक नई कहानी सुनाऊं। शायद यहीं से मेरे अंदर एक राइटर, डायरेक्टर के बीज पड़ गए थे। यह बात बाद में मैंने महसूस की।

मुंबई ने मुझे सब कुछ दिया

बचपन में ही हम वालिद साहब के साथ बैंग्लुरु से मुंबई आ गए थे। मुझे याद है, तब वहां से मुंबई के लिए डायरेक्ट ट्रेन नहीं थी, बेलगाम में ट्रेन बदलनी पड़ती थी। जब मैंने पहली बार मुंबई देखा तो ऊंची-ऊंची इमारतें देखकर हैरान हो गया।

यहां की रौनक मुझे भा गई। इसके बाद मेरा सफर आगे बढ़ता गया। मैंने बॉलीवुड में कदम रखा, मुझे सफलता मिली। इस तरह मुंबई ने मुझे नाम, पैसा और परिवार सब कुछ दिया। इसके लिए हमेशा इस शहर का शुक्रगुजार रहूंगा।

हादसे ने बदल दी जिंदगी

मेरी जिंदगी में सब कुछ ठीक चल रहा था। बतौर एक्टर, डायरेक्टर सफलता मिली। टीवी के लिए एक सीरियल ‘स्वॉर्ड ऑफ टीपू सुल्तान’ भी मैंने बनाया था, इसे दर्शकों ने खूब पसंद किया।

लेकिन सीरियल के बनने के दौरान ही स्टूडियो में और सेट पर आग लग गई। कई लोग झुलस गए, मैं भी डेढ़ साल तक अस्पताल में मौत से जूझता रहा। मेरी 70 से ज्यादा सर्जरी हुई। अगर मेरी पत्नी जरीन खान ने मुझे संभाला न होता तो मैं आपके सामने होता भी या नहीं, यह नहीं मालूम।

बतौर डायरेक्टर नई पारी की शुरुआत

मेरे साथ जो हादसा हुआ, उसके बाद फिल्मों से, डायरेक्शन से दूर हो गया। लेकिन अब बतौर डायरेक्टर फिर से एक्टिव हो रहा हूं। पहले मैं अपने दामाद रितिक रोशन (सुजैन रोशन के एक्स हसबैंड) को लेकर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम पर एक फिल्म बनाने वाला था।

लेकिन अब फिल्म की कास्ट बदल गई है। इसके अलावा दो वॉर फिल्में बना रहा हूं। मेरी तीनों ही फिल्मों की स्क्रिप्ट्स तैयार हैं। इस दिवाली पर ये फिल्में फ्लोर पर जाने वाली हैं।

संजय खान ने अपने जमाने की कई बड़ी-बड़ी एक्ट्रेस के साथ काम किया। सभी के साथ उनके रोमांटिक सॉन्ग्स को खूब पसंद किया जाता है। इसका राज क्या था?

मुझे याद है, मैं फिल्म ‘मेला’ में मुमताज के साथ एक गाने ‘गोरी के हाथ में चांदी का छल्ला…’ शूट कर रहा था। अचानक कोरियोग्राफर सत्य नारायण जी ने कहा कि मुझे मुमताज को गाने के दौरान बांहों में उठाना होगा।

यह मुझे बड़ा अटपटा लगा, क्योंकि उस दौर में ऐसा करने का कोई चलन नहीं था। उस वक्त के हिसाब से यह स्टेप बोल्ड था। मैंने सत्य नारायण जी से कहा कि मुमताज को उठाऊंगा तो गिर जाऊंगा। ऐसे में सत्य नारायण जी ने सबके सामने मेरे मसल्स को हाथ लगाकर कहा-ये मसल्स हैं ना, फिर क्यों नहीं उठा सकते मुमताज को? मैंने उनकी बात मानकर मुमताज को गाने में उठाया। फिल्म रिलीज होने पर गाना बहुत हिट हुआ। इसके बाद तो ज्यादातर एक्ट्रेसेस ने जिद पकड़ ली कि मैं उन्हें गाने में उठाऊं। मैंने कई एक्ट्रेसेस को सॉन्ग्स के दौरान बांहों में उठाया।

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