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Happy Doctors Day 2019 : नेशनल डॉक्टर्स डे पर जानें डॉक्टर्स के खट्टे मीठे अनुभव और विचार

National Doctors Day 2019 /Happy Doctors Day 2019




Happy Doctors Day 2019 : लोगों की सेवा हमारा जुनून होता है

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में बीडीएस डॉ. पी. व्योमा राव बताती हैं, ‘काम के दौरान कई बार पेशेंट खराब व्यवहार करते हैं, समझाने पर भी उन पर हमारी किसी बात का उन पर कोई असर नहीं होता। ऐसे समय में भी हम शांति से ही काम लेते हैं। हमें पता है कि हमारा जीवन साधारण लोगों से भिन्न होता है। हम घर से ज्यादा वक्त अपने हॉस्पिटल या क्लीनिक में बिताते हैं।

घर-परिवार से दूर होना मुश्किल होता है लेकिन हम इसे भी आनंद के तौर पर स्वीकार करते हैं इसलिए नहीं कि चिकित्सा हमारा पेशा है या हमें धन अर्जित करने की लालसा है बल्कि इसलिए कि लोगों की सेवा हमारा जुनून है। यही बात हमारी भूख-प्यास, नींद मिटा कर हमें काम करने की ऊर्जा देती हैं। एक डॉक्टर हर परिस्थिति में अपना संपूर्ण


सामर्थ्य मरीज की चिकित्सा में लगाता है लेकिन इसके बाद भी यदि मरीज को न बचाया जा सके तो इसका दोषी डॉक्टर को कैसे माना जा सकता हैं? ऐसे में दुख होता है ऐसी खबरें पढ़कर या सुनकर जिसमें लोग डॉक्टर पर हमला करते हैं, उन्हें मारते-पीटते हैं। उम्मीद है कि लोग इस बात को समझने की कोशिश करेंगे।’

डॉ. पी. व्योमा राव, राजनांदगांव

Happy Doctors Day 2019 : रोगी-डॉक्टर के बीच हो सद्भाव

होम्योपैथी चिकित्सा परिषद से जुड़े डॉ. अनुरुद्ध वर्मा मानते हैं, ‘तीमारदारों और डॉक्टरों के बीच हाथा-पाई या विवाद की खबरें अकसर आती हैं। चिकित्सा क्षेत्र की प्रतिबद्धता और प्रामाणिकता सवालों के घेरे में है। पुराने जमाने में भगवान का रूप समझे जाने वाले चिकित्सक के प्रति मरीजों और समाज का रवैया बिल्कुल बदला हुआ है। इसके लिए केवल लोग ही जिम्मेदार नहीं हैं, कहीं न कहीं चिकित्सकों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है।

लोगों की समस्या यह है कि वे चिकित्सा विज्ञान की सीमाओं पर गौर नहीं करते। आम धारणा यही होती है कि चिकित्सक विशेष व्यक्ति है, जो रोगी का उपचार करता है। कभी-कभी काम की अधिकता चिकित्सकों को चिड़चिड़ा बना देती है और कभी-कभी वास्तव में रोगी की उपेक्षा हो जाती है और ऐसे में यदि किसी रोगी की जान जाती है तो उसके परिजनों का गुस्सा होना स्वाभाविक है।

सच यह है कि समाज में न तो सारे चिकित्सक सामाजिक सरोकारों से दूर हैं और न ही सारे रोगियों ने चिकित्सक को भगवान मानना बंद कर दिया है। ऐसे में चिकित्सक और मरीज के आपसी संबंधों में लगाव और सद्भाव तभी संभव है, जब दोनों के बीच संवाद स्थापित हो। इसी सहज संवाद और सहयोग से दोनों के मध्य भरोसा उत्पन्न होता है।

चिकित्सकों को धन एवं व्यावसायिकता का लोभ छोड़कर चिकित्सा कार्य को सेवा का कार्य मानना चाहिए, जिससे रोगियों में उनके प्रति विश्वास का संकट उत्पन्न न हो और रोगियों और परिजनों को भी चाहिए कि वे चिकित्सक को पूरा सहयोग देकर उस पर विश्वास बनाए रखें।’

डॉ. अनुरुद्ध वर्मा, लखनऊ

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