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देशभक्ति फिल्मों को नई दिशा देने वाली फिल्म है ''उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक''

इन दिनों एक डायलॉग ‘हाऊ इज द जोश’ की गूंज संसद से लेकर आम जानों है। स्वयं प्रधानमंत्री और गोवा के मुख्यमंत्री ने अपने भाषणों में इसकी विशेष रूप से चर्चा की है। यह डायलॉग हाल में रिलीज हुई फिल्म उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक’ का है। भले ही यह एक फिल्मी डायलॉग है लेकिन इससे लोगों का जुड़ाव यह साबित करता है कि नए भारत के नागरिकों का जज्बा और नजरिया बहुत बदल चुका है।

देशभक्ति फिल्मों को नई दिशा देने वाली फिल्म है
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इन दिनों एक डायलॉग ‘हाऊ इज द जोश’ की गूंज संसद से लेकर आम जानों है। स्वयं प्रधानमंत्री और गोवा के मुख्यमंत्री ने अपने भाषणों में इसकी विशेष रूप से चर्चा की है। यह डायलॉग हाल में रिलीज हुई फिल्म उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक’ का है। भले ही यह एक फिल्मी डायलॉग है लेकिन इससे लोगों का जुड़ाव यह साबित करता है कि नए भारत के नागरिकों का जज्बा और नजरिया बहुत बदल चुका है।
इसे राजनीतिक इच्छाशक्ति और सेना के शौर्य ने भी साबित किया है। जैसा कि हम सब जानते हैं कि वर्ष 2016 में 28-29 सितंबर की मध्यरात्रि में भारतीय सेना ने पाक अधिकृत कश्मीर में सर्जिकल स्ट्राइक के जरिए कई आतंकियों और उनके लॉन्च पैड को नेस्तनाबूद कर दिया था। उस अभूतपूर्व घटना ने पूरी दुनिया में भारत की छवि को नई पहचान दी।
यह घटना तब से लगातार चर्चा में बनी हुई है। ऐसे में रियल लाइफ स्टोरीज और बायोपिक के ट्रेंड से प्रभावित हिंदी सिनेजगत का ऐसी चर्चित और ऐतिहासिक घटना पर ध्यान देना स्वाभाविक था। फिल्म ‘उरी’ के द्वारा यह पहल की, बतौर डायरेक्टर बॉलीवुड में आगाज करने वाले आदित्य धर ने।
लेकिन यह फिल्म भी वास्तविक घटना की तरह एक नया इतिहास लिख देगी, इसका आभास शायद आदित्य को नहीं था। बहरहाल, 11 जनवरी को रिलीज हुई यह फिल्म अब भी पांचवें सप्ताह में भी सिनेमाघरों में लगी है। लगभग 45 करोड़ के बजट में बनी इस फिल्म के बॉक्स ऑफिस कलेक्शन का आंकड़ा 212 करोड़ को पार कर चुका है।
ब्लॉकबस्टर सिद्ध हो चुकी इस फिल्म की ओवरसीज कलेक्शन का आंकड़ा 300 करोड़ पार कर चुका है। लगता है दर्शकों में इस फिल्म को देखने का जोश अब भी बना हुआ है। ऐसे में इस फिल्म पर अलग से चर्चा किया जाना जरूरी है।
सबसे पहले अगर बात देशभक्ति पर आधारित हिंदी फिल्मों की करें तो याद आता है कि देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत फिल्मों को दर्शकों का प्यार शुरू से मिलता रहा है। फिर वो चाहे ब्लैक एंड व्हाइट जमाने की फिल्म ‘वीर अमर सिंह राठौर रही’ और ‘आनंदमठ’ हो या फिर उसके बाद आई ‘हकीकत’, ‘उपकार’, ‘पूरब और पश्चिम’, ‘आक्रमण’, ‘शहीद’ हो।
बीते दो दशक में आईं ‘बॉर्डर’, ‘बेबी, ए वेडनेस डे’, ‘हॉलीडे’, ‘लक्ष्य’, ‘लगान’, ‘एलओसी’, ‘द राइजिंग ऑफ मंगल पांडे’, ‘प्रहार’, ‘तिरंगा’, ‘सरफरोश’, ‘रंग दे बसंती’, ‘स्वदेस’ हों या बीते वर्ष में आई ‘परमाणु, सत्यमेव जयते’ और इसी वर्ष आई ‘मणिकर्णिका’। इन सभी फिल्मों पर अगर नजर डालें तो हम पाते हैं कि विषय और कहानी के आधार पर इनमें भरपूर वैरायटी थी।
बड़े बैनर्स के साथ सुपरस्टार्स से सजी या मल्टीस्टारर इन फिल्मों ने कभी देशभक्तों की शहादत को, कभी दुश्मन देश से युद्ध में भारतीय सेना के पराक्रम को, कभी देश के भीतर आतंक और इसे तोड़ने की कोशिश करने वालों को मिटाने, कभी देश की सांस्कृतिक महानता को रेखांकित करने तो कभी आम आदमी के भ्रष्ट व्यवस्था के विरुद्ध लड़ने की वास्तविक या काल्पनिक कहानी को पर्दे पर उतारा।
लेकिन फिल्म ‘उरी’ कई मायनों में इन सभी से अलग है। सबसे खास बात यह है कि इसमें कोई बड़ा स्टार या ग्लैमरस/टॉप एक्ट्रेस नहीं है। न ही इसे किसी नामचीन डायरेक्टर ने बनाया। बावजूद इसके दर्शक अगर इसे लगातार देखने मॉल या सिनेमाहॉल में जा रहे हैं तो इससे जाहिर होता है कि वे केवल इस फिल्म को और इसके द्वारा दिखाई जा रही सच्ची कहानी को देखना-महसूसना चाहते हैं। इससे दर्शकों की बदलती पसंद को भी समझा जा सकता है।
2 घंटे 18 मिनट की इस फिल्म को देखने के दौरान शायद ही कोई मिनट ऐसा होगा, जब नजर पर्दे से हटती है। फिल्म शुरू होती है जून 2015 में पूर्वोत्तर में भारतीय सुरक्षा बलों पर एनएससीएन आतंकियों के द्वारा किए गए हमले और फिर म्यांमार की सीमा में घुसकर भारतीय सेना द्वारा उन्हें मारने के लिए की गई कार्यवाही से।
इसके बाद सितंबर 2016 में कश्मीर में उरी आर्मी कैंप पर आतंकी हमले और उसके जवाब में सेना-इंटेलिजेंस की प्लानिंग और पीओके में घुसकर किए गए एक्शन को दिखाया गया है। डायरेक्टर आदित्य के ही द्वारा लिखी गई इसकी स्क्रिप्ट की खासियत यह है कि इसमें रियालिटी का रेशियो ड्रामेटिक एंगल से काफी ज्यादा है।
यही वजह है कि दर्शक इसकी कहानी से लगातार जुड़ा रहता है। हालांकि कुछ सीन और सिचुएशन पूरी तरह अवास्तविक लगते हैं, जैसे- पीएम का सेना के एक ऑफिसर के दिल्ली ट्रांसफर के लिए कहना या एक रॉ एजेंट का आर्मी ऑफिसर की मां की केयर के लिए नर्स बन जाना या फिर नेशनल सिक्यूरिटी एडवाइजर का इसरो के एक इंटर्न के अनएप्रूव्ड प्रोजेक्ट को सेंसिटिव मिशन के लिए एक्सेप्ट करना।
एडिटिंग के दौरान अगर इन्हें हटा भी दिया जाता तो भी कहानी की थीम पर कोई फर्क नहीं पड़ता और न ही इसकी कंटिन्यूटी डिस्टर्ब होती। हालांकि इन खामियों को वास्तविक कहानी के फिल्मी रूपांतरण के नाम पर नजरअंदाज किया जा सकता है।
फिल्म की एक खासियत यह भी है कि इसमें देश के लिए अपना सब कुछ लुटाने को तैयार सैनिकों के मानवीय-भावनात्मक पक्ष और पारिवारिक जुड़ाव की संवेदना को गहराई से प्रकट किया गया है। मेजर विहान सिंह शेरगिल के रोल में विकी कौशल ने प्रभावी ढंग से देश के प्रति सेना के जज्बे और मानवीय संवेदना के बीच संतुलन के भावों को अपने अभिनय और भावों से पर्दे पर उतारा है।
परेश रावल, रजित कपूर, मोहित रैना, स्वरूप संपत और चाइल्ड आर्टिस्ट रीवा अरोरा अपनी छोटी-छोटी भूमिकाओं में भी प्रभावित करते हैं। कीर्ति कुल्हारे का रोल इतना छोटा है कि उनके लिए कुछ करने का अवसर ही नहीं मिलता। यामी गौतम ने संतोषजनक एक्टिंग की है। हालांकि उनके कैरेक्टर को स्पेस तो मिला पर फिल्म में उसकी कोई इंपॉर्टेंस नहीं नजर आती है।
फिल्म में चार गाने हैं लेकिन इन्हें स्टोरी रोककर कहीं थोपने की कोशिश नहीं की गई है। शाश्वत सचदेव का म्यूजिक कहानी के भावों को उभारने में काफी हद तक सफल है। फिल्म के डायलॉग्स खासतौर पर दर्शकों में जोश भरने वाले हैं।
हालांकि कहीं-कहीं फिल्म की स्पीड कुछ ज्यादा ही तेज लगती है तो कई स्थलों पर एडिटिंग की चूक भी नजर आती है। बावजूद इसके यह फिल्म दो साल पहले घटित हुई घटना को फिल्मी पर्दे पर फिर से जीवंत करने में बहुत हद तक सफल हुई है, इसमें संदेह नहीं।
यह भी कहना चाहिए कि ऐसी फिल्में आम देशवासियों के मन में अपनी सेना के शौर्य, उनके त्याग के प्रति सम्मान और बढ़ा देती हैं। निश्चित ही इस फिल्म को मिले रेस्पॉन्स से आने वाले दौर में पेट्रियॉटिक फिल्मों को बनाने की प्लानिंग कर रहे फिल्म मेकर्स को एक नई दिशा मिलेगी।

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