मिडिल-ईस्ट में जारी युद्ध और वैश्विक अस्थिरता के बीच अमेरिका ने एक बड़ा कूटनीतिक फैसला लेते हुए रूस और ईरानी तेल पर दी गई विशेष छूट को समाप्त कर दिया है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के इस ऐलान ने भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों की चिंता बढ़ा दी है।
अब तक भारत रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदकर अपनी अर्थव्यवस्था को सहारा दे रहा था, लेकिन अब वाशिंगटन के इस कदम के बाद भारत को अपनी तेल आयात रणनीति में आमूलचूल बदलाव करना पड़ेगा।
छूट खत्म होने का गणित और भारत पर होने वाला असर
अमेरिकी वित्त मंत्री बेसेंट के मुताबिक, रूस और ईरानी तेल पर लागू सामान्य लाइसेंस, जो प्रतिबंधों में ढील प्रदान करते थे, उन्हें अब रिन्यू नहीं किया जाएगा।
रूसी तेल: 12 मार्च 2026 से पहले लोड किए गए रूसी कार्गो के लिए दिया गया 30 दिन का लाइसेंस अब समाप्त हो चुका है। मार्च में भारत का रूसी तेल आयात 1.96 मिलियन बैरल प्रति दिन (mbpd) के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया था, जो अब प्रभावित होगा।
ईरानी तेल: ईरान को दी गई अलग से छूट भी 19 अप्रैल 2026 को समाप्त हो जाएगी।
इन छूटों के खत्म होने का सीधा मतलब है कि भारतीय तेल कंपनियों (OMCs) को अब अंतरराष्ट्रीय बाजार की ऊंची कीमतों पर तेल खरीदना पड़ सकता है, जिससे देश की आयात लागत बढ़ेगी।
अब भारत के पास क्या हैं विकल्प?
भारत सरकार ने हमेशा से तेल आपूर्ति के 'विविधीकरण' पर जोर दिया है। पेट्रोलियम मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा के अनुसार, भारत अब खाड़ी देशों के अलावा अन्य क्षेत्रों पर फोकस कर रहा है:-
लैटिन अमेरिका और ब्राजील: ब्राजील, कोलंबिया और इक्वाडोर भारतीय रिफाइनरियों के लिए महत्वपूर्ण आपूर्तिकर्ता बन गए हैं।
गुयाना का उदय: गुयाना दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते तेल निर्यातकों में से एक बनकर उभरा है और भारत यहाँ से अपनी हिस्सेदारी बढ़ा सकता है।
अफ्रीकी देश: नाइजीरिया और अंगोला जैसे पश्चिमी अफ्रीकी देश खाड़ी के कच्चे तेल का एक स्थिर विकल्प पेश करते हैं।
अमेरिका से बढ़ती खरीद: भारत अमेरिकी शेल तेल (Shale Oil) की खरीद भी बढ़ा सकता है, जो उत्पादन और विश्वसनीयता दोनों मोर्चों पर फिट बैठता है।
चुनौती: क्या रियायती रूसी तेल का विकल्प संभव है?
रक्षा और ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि ब्राजील या अफ्रीका जैसे विकल्प मौजूद तो हैं, लेकिन वे रियायती रूसी तेल की पूरी तरह भरपाई नहीं कर सकते।
रूस से मिलने वाला सस्ता तेल भारत के लिए महंगाई को नियंत्रित करने का एक बड़ा हथियार था। अब छूट समाप्त होने से भारत की आयात लागत में इजाफा होना तय है, जिसका सीधा असर घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ सकता है।
कूटनीति और ऊर्जा सुरक्षा की परीक्षा
अमेरिका के इस फैसले ने भारत को एक नई आपूर्ति चुनौती के सामने खड़ा कर दिया है। हालांकि, भारत का तर्क है कि उसका आयात भंडार अब पहले से कहीं अधिक लचीला और विविध है। भारत अब होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे चोकपॉइंट्स से हटकर नए समुद्री रास्तों और नए साझेदारों की तलाश में है।
यह देखना दिलचस्प होगा कि पीएम मोदी और उनका ऊर्जा मंत्रालय इस वैश्विक 'ऑयल गेम' में भारत के हितों की रक्षा कैसे करते हैं।










