Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh
Breaking

सुशील सिद्धार्थ का व्यंग्य : इस तुरंत का अंत नहीं

रिएक्शन देने का टाइम है बंदे के पास, एक्शन की सच्चाई जानने का नहीं।

सुशील सिद्धार्थ का व्यंग्य : इस तुरंत का अंत नहीं
इस दौर में बुद्धि की इतनी प्रचुरता और स्वभाव में इतनी अधम आतुरता है कि सब कुछ तुरंत समझ लें, कह दें। कोई घटना घटी नहीं कि उस पर आने वाली राय से अखबार, चैनल व फेसबुक की दुनिया पटी नहीं। घटना का आगा-पीछा क्या है, जानने की रुचि नहीं। रिएक्शन देने का टाइम है बंदे के पास, एक्शन की सच्चाई जानने का नहीं।
--------------------------------------------
शायद कुछ लोगों को याद आ जाए कि इस देश में एक भाषा हिंदी भी है। बहुत पहले प्राइमरी की किसी क्लास में एक पोयम पढ़ाई जाती थी। फेमस पोएट श्यामनारायण पांडेय द्वारा रिटेन थी। खैर, उसकी एक पंक्ति थी, ‘राणा की पुतली फिरी नहीं तब तक चेतक मुड़ जाता था।’ न जाने क्यों हाल-फिलहाल का जीवन देखकर यह कथन उपनिषद का वाक्य लगने लगता है।

अंशुमाली रस्तोगी का व्यंग्य : आप बस योग करते रहिए

तुरंत के लिए इतनी अश्लील बेचैनी देखकर ‘तुरंतोपनिषद’ लिखने का मन कर रहा है। मुझमें महात्मा की योग्यता नहीं। महात्मा का अर्थ अपनी आत्मा को महासागर में डुबो देने वाला। मैं ऋषि भी नहीं। ऋषि के लिए जरूरी है चेला चेली बनाना, देशभर में मठ खोलना, धर्म की जड़ में मट्ठा डालना, प्रवचन में आई स्त्रियों पर टॉर्च की रौशनी डालना, उसमें से किसी के साथ एकांत में नागिन डांस करना और अंत में लोक कल्याण के लिए जेल जाना।
इस कारण कोई दूसरा यह उपनिषद लिखेगा। मैं तो इसके कुछ उदाहरण प्रस्तुत करूंगा। इस दौर में बुद्धि की इतनी प्रचुरता और स्वभाव में इतनी अधम आतुरता है कि सब कुछ तुरंत समझ लें, कह दें। कोई घटना घटी नहीं कि उस पर आने वाली राय से अखबार, चैनल व फेसबुक की दुनिया पटी नहीं। घटना का आगा-पीछा क्या है, जानने की रुचि नहीं। रिएक्शन देने का टाइम है बंदे के पास, एक्शन की सच्चाई जानने का नहीं। घटनाओं पर वज्रपात की तरह टिप्पणियां बरसीं।
किसी ने कह दिया कि पीएम का सूट इत्ते लाख का है, तो इत्ते हमले कि दिल्ली उनकी पार्टी का कुरुक्षेत्र बन गई। इत्ते से कित्ते के बीच हाहाकार मचा रहा।यह तुरंता मानसिकता बाजार के दबाव में हर जगह फफूंद की तरह दिख रही। मंगनी में अंगूठी पहनाई कि फोटो फेसबुक पर, तुरंत पता चलना चाहिए कि बंदा या बंदी स्मार्ट है। इस निजी तुरंतपने से बाजार कैसे लाभ उठाता है! एक किताब छप कर आई। इससे जुड़े सभी लोग बदहवास। लेखक सोचता है कि महीना भर में तड़ातड़ समीक्षाएं न आर्इं तो धड़ाधड़ शोर कैसे मचेगा? जरा सी समीक्षा लेट हुई तो संपादक जी का बहाना, ‘भाई किताब पुरानी हो ली। इसके बाद आई किताबों का भी प्रेशर है।’
समीक्षक फ्लैप पढ़कर या उलट-पुलट कर जो बन पड़ा लिख रहा है। कहीं देर न हो जाए और रिश्ते सूखने न लगें। सबको जल्दी है। प्रकाशक को जल्दी है कि किस किताब को साल की उपलब्धि या बेस्ट सेलर घोषित कर दें। किताब रोती रहती है, ‘हाय अभागों, कोई मुझे पढ़ो भी।’ कुछ आलोचकों को अति आत्मविश्वास का बुखार चढ़ जाता है। कहानी या कविता छपे साल भी नहीं बीतता कि उसे कालजयी घोषित कर देते हैं। महानता ऐसे ही आत्मविश्वास के बिल में अंडे देती है। क्या महान समय लगा है। सब्जी के बढ़ने का इंतजार नहीं, इंजेक्शन ठोंको। फलों के पकने का इंतजार नहीं, केमिकल्स लेपो। गाय भैंस के दूध उतरने का इंतजार नहीं, सुई लगाओ।
यहां तक कि भगवान का रूप माने-जाने वाले डॉक्टरों की कृपा से नेचुरल डिलीवरी की प्रतीक्षा नहीं, करो सीजेरियन। उत्तर प्रदेश में पुलिस के सर्वोच्च पद पर रहे एक मित्र ने बताया कि तमाम अस्पतालों में टारगेट दिया जाता है कि महीने में इतने सीजेरियन करने ही करने हैं। इतना अमाउंट चइए ही चइए।फिल्मों का हाल तो अद्भुत है। पहले अब पिक्चर डेढ़ सौ दिन चलतीं तो सिल्वर जुबिली मनाती थी तब हिट मानी जाती थी। राजेंद्र कुमार का नाम ही जुबिली कुमार पड़ गया था। आज? बस दो दिन में हिट। पैसा वसूल। अब हर हीरो ‘हफ्ता कुमार’ है। गाने किसी तैमूर लंग, चंगेज खान या हिटलर की तरह हमला करते हैं। चंद हफ्तों में चैनल, एफएम सुनने की शक्ति, मोबाइल, त्योहार सब तहस-नहस। फिर गाना हमेशा के लिए गायब। तुरंत आओ, सुनाओ और जाओ। बड़ा सुख मिलता है यह सब देखकर-सुनकर।
परिवार से समाज तक यह तुरंता कल्चर हावी है। आप से दोस्ती हुई तो बस यह परियोजना शुरू कि कैसे जल्द से जल्द आपका उपयोग कर आगे बढ़ जाऊं। आपके लिए अठानवे काम अगले ने किए। दो नहीं कर पाया तो फौरन फैलता कि यार ये किसी काम के आदमी नहीं। परिवार के किसी सदस्य से छोटा सा मनमुटाव हुआ कि शुभचिंतक की सलाह, ‘ज्यादा लफड़ा न पालो। तुरंत फैसला लो, आर या पार।’ आज कितने ही रिश्ते आर या पार का व्यापार कर रहे हैं। अच्छा है, ‘काल मरें सो आज मर, आज मरे सो अब’। सबसे खुशी की बात है कि हिंदी के अधिकांश व्यंग्यकार इस तुरंता कल्चर के ब्रांड एंबेसडर हैं।
इधर बात उड़ती, उधर दर्जनों व्यंग्य तैयार। न सोचने का कष्ट न समझने की जहमत। इसलिए इस तुरंत का अंत नहीं। आप इससे बच नहीं सकते। पूरा बाजार आपको तुरंता बनाने पर आमादा है। और आप जानते ही हैं कि बाजार पूरी दुनिया का दादा है।
खबरों की अपडेट पाने के लिए लाइक करें हमारे इस फेसबुक पेज को फेसबुक हरिभूमि, हमें फॉलो करें ट्विटर और पिंटरेस्‍ट पर-
Next Story
Top