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भारत से बराबरी के चक्कर में बर्बाद हो रहा पाकिस्तान, ये है सबूत

अमेरिकी मदद रुकने के बाद पाक सरकार में भारत की बढ़ती ताकत को लेकर काफी बौखलाहट है। इसी से घबराकर उसने अपने 2018-19 के बजट में रक्षा क्षेत्र के लिए 9.6 अरब डॉलर रखे है। जाहिर है, इतने भारी-भरकम धन का इस्तेमाल हथियारों की खरीद पर होगा। यदि पिछले साल के घोषित बजट से तुलना की जाए तो यह बढ़त करीब 20 फीसदी अधिक बैठती है।

भारत से बराबरी के चक्कर में बर्बाद हो रहा पाकिस्तान, ये है सबूत

पाकिस्तान सरकार की प्राथमिकता अपने नागरिकों को रोटी, कपड़ा, मकान देने की नहीं है। उसे तो खुन्नस भारत से है। इसलिए उसने अपने रक्षा बजट में तगड़ा इजाफा कर लिया है ताकि किसी भी सूरत में भारत से मुकाबला किया जा सके।

दरअसल अमेरिकी मदद रुकने के बाद पाक सरकार में भारत की बढ़ती ताकत को लेकर काफी बौखलाहट है। इसी से घबराकर उसने अपने 2018-19 के बजट में रक्षा क्षेत्र के लिए 9.6 अरब डॉलर रखे है। जाहिर है, इतने भारी-भरकम धन का इस्तेमाल हथियारों की खरीद पर होगा। यदि पिछले साल के घोषित बजट से तुलना की जाए तो यह बढ़त करीब 20 फीसदी अधिक बैठती है।

पाकिस्तान को हमेशा भारत से तुलना करने का रोग लग चुका है। वो भारत से क्षेत्रफल, आबादी और अर्थव्यवस्था के स्तर पर मीलों, दशकों पीछे है। पर वो हमसे मुकाबला करने के फेर में अपनी जनता के संबंध में सोचने के लिए तैयार नहीं है। भारत को अपना रक्षा बजट इसलिए बढ़ाना पड़ता है, क्योंकि हमें भीमकाय से भी खतरा है। ये बात पाकिस्तानी नेतृत्व के पल्ले नहीं पड़ती। दरअसल पाकिस्तान में चुनी सरकारें भी सेना के इशारों पर चलती हैं। उनकी कोई हैसियत नहीं है। पाकिस्तान में सेना का वर्चस्व हर जगह दिखता है।

अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पढ़े जनरल अयूब खान ने पाकिस्तान सेना में भारत विरोध की जड़ें मजबूत कीं। पाकिस्तान की सेना में पंजाबियों का वर्चस्व साफ है। उसमें 80 फीसदी से ज्यादा पंजाबी हैं। ये भारत से नफरत करते हैं। इस भावना के मूल में पंजाब में देश के विभाजन के समय हुए खून-खराबे को देखा जा सकता है। पाकिस्तान का पंजाब इस्लामिक कट्टरपन की प्रयोगशाला है।

वहां पर हर इंसान अपने को दूसरे से बड़ा और कट्टर मुसलमान साबित करने की होड़ में लगा रहता है। पंजाब के अलावा पाकिस्तान के बाकी भागों में भारत विरोधी माहौल इतना अधिक नहीं है। पाकिस्तान आर्मी ने खून-खराबा करने में अपनों को भी नहीं बख्शा है। हो सकता है कि इस पीढ़ी को पाकिस्तानी आर्मी के ईस्ट पाकिस्तान या अब बांग्लादेशद्ध में रोल की पर्याप्त जानकारी न हो।

पाकिस्तानी सेना ने साल 69 ये 71 में अपने ही मुल्क के बंगाली भाषी लोगों पर जुल्म ढाहना शुरू किया। इस कार्रवाई को पाकिस्तानी सेना ने आपरेशन सर्च लाइट का नाम दिया। यह जुल्म ऐसा-वैसा नहीं था। लाखों लोगों की बेरहमी से हत्या, हजारों युवतियों से सरेआम बलात्कार, तरह-तरह की अमानवीय यातनाएं। पाकिस्तानी सेना के दमन में मारे जाने वालों की तादाद 30 लाख थी।

इतना ही नहीं पाकिस्तानी फौजी दरिंदों ने दो लाख महिलाओं से बलात्कार किया। पाकिस्तानी सेना अपने आप में किसी माफिया गिरोह से कम नहीं है। माना जा रहा था कि भारत से 1971 के युद्ध में धूल चाटने के बाद सेना सुधर जाएगी। लेकिन, ये नहीं हुआ। पाकिस्तान आर्मी ने देश में चार बार निर्वाचित सरकारों का तख्ता पलटा। अयूब खान, यहिया खान, जिया उल हक और परवेज मुशर्रफ ने पाकिस्तानी सेना को एक माफिया के रूप में विकसित किया।

देश में निर्वाचित सरकारों को कभी कायदे से काम करने का मौका ही नहीं दिया गया, जम्हूरियत की जड़ें जमने नहीं दीं। वर्ष 1956 तक देश का संविधान तक नहीं बन पाया। जब बना भी तो चुनाव नहीं हो पाए और सेना ने सत्ता ही हथिया ली। नफरत फैलाकर भय का माहौल पैदा करना ही पाक आर्मी का मूल मकसद रहा है। 1947 के बाद से पाकिस्तान में लगभग तीस साल तक सैन्य शासन रहा और सेना ने केंद्रीयकरण को बढ़ावा दिया।

जब सेना का शासन नहीं रहा तब भी इस केंद्रीयकरण का प्रभाव बना रहा। अयूब खान और जिया-उल-हक के शासन के दौरान भी लोकतंत्र बहाली के लिए प्रदर्शन और आंदोलन हुए। लेकिन आर्मी का कब्जा बना रहा। वहां का सेना चीफ अपने मुल्क के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से शक्तिशाली और भारत विरोधी ही होता है। सेना चीफ कयानी हो या राहील शरीफ सब भारत के खिलाफ जहर उगलते हैं। शरीफ भारत के खिलाफ भड़काऊ टिप्पणी करने के लिए बदनाम थे।

भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज जब पाकिस्तान दौरे पर थी, तब राहील शरीफ जंग की सूरत में भारत को अंजाम भुगतने की चेतावनी दे रहे थे। यानी उन्हें कूटनीति की कोई समझ नहीं थी। जनरल शरीफ ने कहा था, हमारी सेना हर तरह के हमले के लिए तैयार है। अगर भारत ने छोटा या बड़ा किसी तरह का हमला कर जंग छेड़ने की कोशिश की तो हम मुंहतोड़ जवाब देंगे और उन्हें ऐसा नुकसान होगा जिसकी भरपाई मुश्किल होगी।

दरअसल 1965 की जंग में उनके चाचा और 1971 की जंग में उनके बड़े भाई मारे गए थे। उनके बडे पाकिस्तान के पूर्व सेनाध्यक्ष और राष्ट्रपति परवेज के साथी थे। बेशक, गुजरे कुछ समय के दौरान अगर भारत-पाकिस्तान के संबंध क्रमश: खराब होते रहे तो उसके लिए राहील शरीफ भी कम जिम्मेदार नहीं थे। वे एक तरह से उसी पाकिस्तानी आर्मी की नुमाइंदगी कर रहे थे, जिसकी रगों में भारत विरोध है।

पाकिस्तानी आर्मी का एकमात्र मकसद भारत को हर लिहाज से नुकसान पहुंचाना है। इसलिए वहां पर नवाज शरीफ प्रधानमंत्री हों या फिर कोई और, हालात सुधरने वाले नहीं हैं। क्योंकि सेना पर किसी का जोर नहीं है। आप पाकिस्तान आर्मी के गुजिश्ता दौर के पन्नों को खंगाल लें। समझ आ जाएगा कि वह किस हद तक भारत विरोधी रही है।

वहां की सेना पर पंजाबियों का वर्चस्व साफ है। ये भारत विरोधी हैं। इसके मूल में वे विभाजन के समय हुई मारकाट को दोषी मानते हैं। इसके अलावा पाकिस्तान के हिस्से वाले पंजाब में इस्लामिक कट्टरपन सबसे ज्यादा है। वहां पर हर इंसान अपने को दूसरे से बड़ा कट्टर मुसलमान साबित करने की होड़ में लगा रहता है।

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