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डा. रमेश ठाकुर का लेख : सुरक्षित बने हवाई सफर

मौजूदा विमान हादसे की जिम्मेदारी सीधे स्थानीय अथाॅरिटी, प्रशासन और एयरपोर्ट अथाॅरिटी ऑफ इंडिया की बनती है। जिम्मेदार टाॅप अधिकारियों पर हादसे में हताहत बेकसूर हवाई यात्रियों की हत्या का मुकदमा होना चाहिए। मुआवजा बांटकर घोर लापरवाही और मुंह खोले खड़ी कमियों पर पर्दा नहीं डालना चाहिए। कुछ भी हो, कोझिकोड विमान हादसे ने हवाई यात्राओं की सुरक्षा की विश्वसनीयता को खतरे में जरूर डाल दिया है।

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विमान क्रैश

डा. रमेश ठाकुर

लगातार होते विमान हादसों को देखकर हवाई सफर करने वाले यात्री पसोपेश में हैं। उनके भीतर भय पैदा हो गया है। कोझिकोड एयरपोर्ट पर भीषण विमान हादसे ने हवाई यात्राओं की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विमान जिस तरह से क्षतिग्रस्त हुआ, उसे देखकर रोंगटे खड़े हो गए। प्लेन दो हिस्सों में टूटकर चकनाचूर हो गया। हादसे के जो तत्कालीन कारण सामने आए हैं, उससे सीधे सवाल एयरपोर्ट अथाॅरिटी, विमानन कंपनियों और उड्डयन विभाग पर खड़े हुए हैं। हादसे की शुरुआती रिपोर्ट बताती है कि रनवे छोटा होने के चलते हादसा हुआ। कोझिकोड एयरपोर्ट का रनवे अगर लंबा होता, तो हादसा नहीं होता? जबकि कई वर्षों से इस बात की मांग उठ रही थी कि रनवे लंबा किया जाए।

कोझिकोड एयरपोर्ट का रनवे दिल्ली एयरपोर्ट के रनवे से भी छोटा है। कोझिकोड का रनवे 8800 फुट लंबा है, जबकि दिल्ली का 11000 फुट लंबा रनवे है। छोटे रनवे पर बारिश में प्लेनों की लैंडिंग कराना बड़े खतरे से कम नहीं होता। रनवे जब भीग जाता है तो प्लेन के फिसलने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। दस वर्ष पहले मेंगलुरू के एयरपोर्ट पर भी कुछ ऐसा ही हादसा हुआ था। संयोग देखिए तब भी प्लेन दुबई से आया था। 22 मई 2010 को एयर इंडिया का विमान दुबई से आते वक्त रनवे को पार करते हुए पास की पहाड़ियों में जा गिरा था, जिसमें 158 लोगों की मौत हुई थी। उस हादसे से भी एयरपोर्ट अथाॅरिटी ने कोई सबक नहीं सीखा।

मेंगलुरू और कोझिकोड के दोनों हादसों के बाद भी अगर कोई सतर्कता नहीं दिखाई, तो ऐसे दर्दनाक हादसों की पुनरावृत्ति होती रहेगी। कुछ वर्ष पूर्व केंद्र सरकार ने देशभर के एयरपोर्ट की सुरक्षा-समीक्षा की थी। रिपोर्ट में सामने आया था कि कई ऐसे रनवे हैं जो बोइंग विमानों का भार झेलने के लायक नहीं हैं। बोइंग विमानों का वजन लगभग 70 से 100 टन के आसपास होता है। लैंडिंग के वक्त एकदम तेजी से इतना भार जमीन पर पड़ता है तो कम दूरी के रनवे मुकाबला नहीं कर पाते। बारिश में छोटे रनवे की हालत और भी ज्यादा खराब हो जाती है। खराब मौसम में जब ये विमान लैंड करते हैं तो रनवे पर उनके टायरों की रबड़ उतर जाती हैं। ब्रेक लगाने के वक्त प्लेन के फिसलने की आशंका बढ़ जाती है। उसी स्थिति में अगर रनवे लंबे हों, तो पायलट नियंत्रण कर लेता है।

कोझिकोड के जिस एयरपोर्ट पर हादसा हुआ है उसके आसपास बहुत ज्यादा हरियाली है इसलिए वहां दूसरे एयपोर्ट्स के मुकाबले विजिबिलिटी हमेशा कम रहती है। इसलिए उस रनवे पर हादसे की संभावनाएं हमेशा बनी रहती हैं। इतना सब कुछ जानने के बाद भी एयरपोर्ट प्रशासन आंख मूंद कर बैठा रहता है, अगले हादसे का इंतजार करता रहता है। दस साल पहले जो हादसा हुआ था उसमें भी विमान दो हिस्सों में ऐसे ही टूट गया था। हादसे का तरीका मौजूदा हादसे जैसा ही था। तेज बारिश में प्लेन की लैंडिंग कराना कोझिकोड रनवे पर खतरे से कम नहीं होता, फिर क्यों विमान को उतारने की इजाज़त दी।

मौजूदा विमान हादसे की जिम्मेदारी सीधे स्थानीय अथाॅरिटी, प्रशासन और एयरपोर्ट अथाॅरिटी ऑफ इंडिया की बनती है। जिम्मेदार टाॅप अधिकारियों पर हादसे में हताहत बेकसूर हवाई यात्रियों की हत्या का मुकदमा होना चाहिए। मुआवजा बांटकर घोर लापरवाही और मुंह खोले खड़ी कमियों पर पर्दा नहीं डालना चाहिए। कुछ भी हो, कोझिकोड विमान हादसे ने हवाई यात्राओं की सुरक्षा की विश्वसनीयता को खतरे में जरूर डाल दिया है। देश हो या विदेश समय-समय पर विमान दुर्घटनाओं की ख़बरें आती रहती हैं। हवाई हादसे अब रेल हादसों की तरह आम होते जा रहे हैं। कोझिकोड हादसे से पहले पूर्व की ज्यादातर घटनाओं में भी मानवीय व तकनीकी चूक सामने आईं हैं, इसलिए अब हवाई सफर पूरी तरह से राम भरोसे हो गया है। विमान घटनाओं के बाद जब जिम्मेदारी लेने की बात आती है तो सरकारें ये कहकर पल्ला झाड़ लेती हैं कि इसमें निजी विमान कंपनियों की हिमायत है।

हवाई यात्रियों के जेहन से किसी एक घटना का डर निकल भी नहीं पाता, दूसरी घटना हो जाती है। काठमांडू के त्रिभुवन इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर भी कोझिकोड की तरह लैंड करते वक्त बांग्लादेश का विमान फिसला था जिसमें 58 यात्री मरे थे। संसार भर में खतरों की समीक्षा पर आधारित सुरक्षा उपायों को लागू करने के लिए नागर विमानन सुरक्षा ब्यूरो सुरक्षा पद्धतियों को लगातार उन्नत तथा पुनः पारिभाषित करते रहते हैं, पर नतीजा वही ढाक के पात। अल्जीरिया विमान हादसे के बाद भारतीय विमानन कंपनियों ने कुछ सकर्तता दिखाई थी, लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, सतर्कता भी फुस्स हो गई।

एविएशन क्षेत्र में भारत आज भी दूसरे देशों से काफी पीछे है। नए विमानन नियम, नई सहूलियतें, आधुनिक तामझाम, यात्रा में सुगमता की गारंटी और भी कई तमाम बातें उस समय धरी रह जाती हैं, जब बड़े प्लेन हादसों की ख़बरें आ जाती हैं। पिछले वर्ष इन्हीं दिनों दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट के रनवे पर भी आमने-सामने एक साथ दो विमानों के आने से बड़ा हादसा होते-होते बचा था। इसे एटीएस का गलती कहें या विमानन कंपनियों की तकनीकी नाकामी, या फिर पायलटों की लापरवाही? हरियाणा के चरखी विमान हादसे को शायद ही कोई भूल पाए, याद करके आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उस हादसे को भारत में अब तक का सबसे बड़े हवाई हादसे में गिना जाता है। घटना 12 नवंबर, 1996 में घटी थी, जब दो विमानों में मिड एयर कॉलिजन हुआ, एक विमान सऊदी अरब का था, तो दूसरा कजाखिस्तान का। उस हादसे में दोनों विमानों में सवार सभी 349 यात्रियों में से कोई जिंदा नहीं बचा।

कोझिकोड विमान हादसे ने एविएशन क्षेत्र को फिर से समीक्षा करने की जरूरत की तरफ इशारा किया है। हिंदुस्तान में महज दिल्ली, मुंबई जैसे दो-तीन ही इंटरनेशनल स्टैंडर्ड के एयरपोर्ट हैं, जबकि देश में एविएशन सेक्टर में भारी संभावनाएं हैं। यह क्षेत्र सालाना 14 फीसदी की दर से ग्रोथ कर रहा है। दुनिया के टॉप-5 कंट्री में शुमार भारतीय एविएशन सेक्टर होने के बावजूद अविश्वसनीय है। हवाई यात्रियों में भारी इज़ाफा होने के बाद भी अभी तक टियर दो और टियर तीन श्रेणी के शहरों को हवाई रूटों से नहीं जोड़ा गया। बीते पांच वर्षों में एविएशन क्षेत्र को आधुनिक तकनीकों से लैस किया गया है, लेकिन सही क्रियान्वयन नहीं किया गया। कोझिकोड जैसे हादसे उसी के नतीजा हैं। भारतीय विमानन नेटवर्क को सतर्क हो जाना चाहिए। घटना के पहलुओं को चिह्िन्त कर दुरुस्त करना चाहिए।

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