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World Tiger Day: देश में बढ़ी है बाघों की संख्या, पर अब भी बहुत काम करना बाकी

भारत में बाघ कि वर्तमान संख्या 2967 हैं। 2006 में भारत में टाइगर की संख्या 1411 थी, जो कि 2010 में बढ़कर 1706 हो गई, 2014 मैं इनकी संख्या 2226 थी। अतः बाघ को संरक्षित करने में नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी का अमूल्य योगदान है।

International Tiger Day : अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस की शुरुआत कब और क्यों हुई, जानें भारत के किस जंगल में है कितने शेर
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International Tiger Day Start Date Reasons Importance Tiger Reserve In India

2010 मैं रूस में होने वाली टाइगर समिट के बाद 29 जुलाई को हर वर्ष अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस (World Tiger Day) मनाया जाता है। इसका उद्देश्य टाइगर के प्राकृतिक आवास को संरक्षित करना ओर जनमानस को इस प्रजाति के बारे में अवेयर करना है। बाघ का इतिहास हज़ारों साल पुराना है, हमारे वेदों, पुराणों तथा लोक कथाओं में इसका उल्लेख है। वर्तमान में यह केवल वश्वि के 14 देशों में पाया जाता है उन्होंने आठ उपप्रजातियो मै केवल पाँच ही शेष रह गई है। इसके अतिरक्ति भारत में 18 राज्यों में देश के 2.21% भूभाग पर बाघ पाये जाते है।

बीसवीं सदी के पूर्व में राजा महाराजाओं तथा अंग्रेज़ शासकों द्वारा का बाघका अंधाधुंध शिकार करने के कारण तथा सेकंड वर्ल्ड वार के बाद जनसंख्या में भारी वृद्धि के कारण देश के वन क्षेत्र का बड़ा भाग खेती के लिए आबाद किया गया। इसके फलस्वरूप घास का तराई क्षेत्र जो के बाघ के रहने के लिए उपयुक्त था वह ख़त्म होता गया। भारत में बाघों की आबादी के समक्ष प्रमुख ख़तरे टाइगर रिज़र्व से होकर गुज़रने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग, वन अग्नि और बाढ़ से होने वाले नुक़सान, पारंपरिक चीनी दवाओं के लिए बाघ का अवैध शिकार, औद्योगिक विकास से वनो की कटाई के कारण उनके प्राकृतिक आवास पर दबाव बढ़ गया। अतः 1970 तक भारत में टाइगर की संख्या में काफ़ी कमी आयी।

भारत में वर्ष 1973 मैं टाइगर के इन सीटू कंजर्वेशन के लिए बाघ परियोजना का शुभारंभ किया गया।राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण बाघ संरक्षण योजना का कार्यान्वयन करता है।

भारत में बाघ कि वर्तमान संख्या 2967 हैं। 2006 में भारत में टाइगर की संख्या 1411 थी, जो कि 2010 में बढ़कर 1706 हो गई, 2014 मैं इनकी संख्या 2226 थी। अतः बाघ को संरक्षित करने में नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी का अमूल्य योगदान है। बाघ की आबादी का आंकलन पद चिन्ह से, कैमरा ट्रैप से, धवनि गणन और प्रत्यक्ष गणना से होता है। दो टाइगर को फेसियल मार्क में भिन्नता के आधार पर भी पहचाना जा सकता है। भारत में वर्तमान में 50 टाइगर रिज़र्व हैं। टाइगर रिज़र्व को विकसित करने के लिए कोर-बफ़र स्ट्रेजी का यूज़ होता है। भारत में टाइगर रिज़र्व की बढ़ती संख्या के कारण मनुष्य को बाघ की आबादी से दूर रखेंगे। इसके अतिरक्ति वन्य जन्तु संरक्षण अधिनियम 1972 होने से बाघके शिकारपर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के अलावा उसकी खाल, हड्डियाँ, नाख़ून तथा मूँछों के रखने तथा व्यापार पर भी पाबंदी लगायी हुई है। बाघ को विशेष महत्व देने तथा उसके संरक्षण हेतु भारत सरकार ने बाघ को राष्ट्रीय पशु घोषित किया है।

बाघ मांसाहारी पशु होने के कारण शाकाहारी पशुओं की संख्या को नियंत्रित करता है वह उतना ही पशुओं को मारता है जितने उसके भोजन के लिए ज़रूरी हो इस प्रकार बाघ जंगल के प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका अदा करता है। बाघ को वश्वि का सुंदरतम पशु माना जाता है यह वश्वि के केवल कुछ देशों में पाया जाता है। ये घनी झाड़ियों ओर ऊँची घास में छिपना पसंद करता है जंगल ही इसका प्राकृतिक आवास स्थल है। जंगल में इसे देखने के लिए देश विदेश के हज़ारों पर्यटक हर वर्ष भारत आते है। इससे देश को विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है,हज़ारों लोगों को रोज़गार मिलता है ओर प्राकर्तिक जंगलों का सरंक्षण होता है। कान्हा, बांधवगढ़, रणथंबोर, जिम कॉर्बेट इसके उदाहरण है जहाँ हज़ारों पर्यटक बाघ को देखने के लिए आते हैं।

मानवभक्षी बाघों के बारे में रोचक तथ्य

मानवभक्षी बाघों की समस्या मुख्यतः राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों मैं लगे वन क्षेत्रों में ज़्यादा है। कई बार शिकारी की गोली या आपसी लड़ाई में घायल बाघ भी अपंगता वस वन्यजीवों का शिकार करने में

असमर्थ होते हैं और मानवभक्षी हो जाते। सुंदरबन के संरक्षित वन क्षेत्र में सभी पशुखारा पानी पीते हैं क्योंकि वहाँ खारे पानी की अधिकता हैसर्फि़ आदमियों के शरीर में मीठा पानी उपलब्ध रहने से इन पर हमला करते हैं। दुधवा राष्ट्रीय उद्यान में बफर ज़ोन न होने के कारण आस पास के गन्ने के खेत शाकाहारी वन्य प्राणियों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं जिससे भागों को गन्ने के खेत में शिकार आसानी से मिल जाता है जब किसान गन्ने की फसलों को कटाई के लिए जाता है तो घबराहट और अपने सुरक्षा से भयभीत बाद आतंकित होकर किसानों पर हमला कर देते हैं। इसके सारांश में यह कहा जा सकता है कि इकोलॉजी कल भी प्रदर्शन के कारण प्रभावित आहार शृंखला से भोजन की कमी एवं मानव द्वारा बाघों प्राकृतिक परिवेश में अतक्रिमण ओर व्यावधान बाघो को कभी कभी मानवभक्षीबना देता है

प्रकृति तथा प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण का काम इतना सरल नहीं है कि कोई भी सरकार इसे बिना जन सहयोग के पूर्ण कर सके इसलिए बाघ संरक्षण को सफल बनाने के लिए जन सहयोग अति आवश्यक है। बाघ हमारा राष्ट्रीय गौरव है इसलिए इसकी रक्षा करना प्रत्येक देशवासी का कर्तव्य है। यदि टाइगर रिज़र्व के निकटवर्ती क्षेत्र के ग्रामीण अपने एरीआ में आने वाले संदग्धि व्यक्तियों की गतिविधियों पर निगरानी रखेंगे ओर उनकी सूचना निकटवर्ती वन कर्मचारियों और अधिकारियों को देते रहेंगे बाघ संरक्षण का कार्य काफ़ी सफल हो सकता है।

इसके अतिरक्ति यदि एक देश से बाघों के सरंक्षण पर अच्छा काम किया जाता है और इसके पड़ोसी देश में बाघ का शिकार किया जाता है तो इसका बुरा असर सभी देशों पर पड़ता है। इसलिए बाघोंके संरक्षण के लिए सभी देशों में समान क़ानून हो।

बाघ एक क्रिटिकल हैबिटेट से दूसरे में आने के लिए जिन मार्गों का उपयोग करते हैं उन्हें टाइगर कॉरिडोर कहा जाता है। कई बार सड़क नर्मिाण एवं वद्यिुत लाइने स्थापित करने के लिए इन कॉरिडोर को नुक़सान होता है। इस समस्या से बचने के लिए समर्पित वन्य प्राणी मार्ग बनाएँ जो कि अंडरपास और ओवर पास के रूप में हो सकता है।

बाघ सरंक्षण को बढ़ावा देने के लिए और बच्चों में इस अद्भुभुत वन्य प्राणी के प्रति उत्सुकता बढ़ाने के लिए छात्र और छात्राओं का नियमित समय अंतराल पर प्राकृतिक शक्षिा शिविर का आयोजन करके इन बाघ अभयारण्यो का भ्रमण करवाया जाए। आइए हम सब मिलकर प्रकृति के इस अमूल्य धरोहर को आने वाली पीढ़ियों को सुपुर्द करने में क़ामयाब हो।याद रखिए कि यदि इस अमूल्य धरोहर को हम रक्षा नहीं कर पाए तो यह हमेशा हमेशा के लिए चीता की तरह हमारी धरती से लुप्त हो जाएगा।

लेखक: डॉक्टर सुनील कुमार (भारतीय वन सेवा, हरियाणा कैडर)

यदु भारद्वाज (भारतीय वन सेवा, गुजरात कैडर)

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