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World Heritage Day : भारत के खास पर्यटन स्थल, जो बन गए विरासत- जानें पूरी कहानी

यात्राओं का संबंध मानव सभ्यता के विकास से है। खासकर अपने देश भारत में यात्राओं का बहुत गौरवमयी इतिहास और उसकी महत्ता भी रही है। प्राय: धर्म से जुड़ी यात्राओं ने स्वाधीनता संघर्ष और जन-जागरण में भी बड़ी भूमिका निभाई। आज भी अलग-अलग संदर्भों में देश में चार हजार से ज्यादा धार्मिक यात्राएं होती हैं। भारत की यह महान यात्रा परंपरा विश्व विरासत का दर्जा दिए जाने योग्य है।

World Heritage Day : भारत के खास पर्यटन स्थल, जो बन गए विरासत- जानें पूरी कहानी

World Heritage Day 2019 : अपने देश भारत में हजारों साल से धार्मिक यात्राएं आदर्श, जीवन मूल्य, समाज सुधार, दार्शनिकता और संन्यास की परंपरा के रूप में प्रतिष्ठित हैं। हिंदुस्तान के शायद ही किसी महापुरुष के जीवन मंच ऐसी दुर्लभ, धार्मिक यात्राओं का योगदान न हो। गौतम बुद्ध, महावीर, गुरुनानक, शंकराचार्य और महात्मा गांधी सबके जीवन में यात्राओं का बहुत महत्व रहा है। चाहे ये यात्राएं समाज को नया जीवन दर्शन देने के लिए की गई हों, चाहे ये यात्राएं धर्म के प्रचार या'वसुधैव कुटुंबकम' का अलख जगाने के लिए की गई हों या फिर ये यात्राएं देश के एक सिरे को दूसरे सिरे से जोड़ने की भावनात्मक कोशिश के रूप में की गई हों। ऐसी यात्राओं का पूरी दुनिया में और कहीं कोई जोड़ या विकल्प नहीं है।

आदि शंकराचार्य की यात्राएं

अकेले महात्मा गांधी ही नहीं, भारत को भारत बनाने वाली जितनी भी शख्सियतें हैं, उन्होंने अपने जीवन में बहुत यात्राएं कीं। उनके जीवन में जो भी कुछ महान है, उसमें उनकी यात्राओं का महत्व शामिल है। कहते हैं आधुनिक भारत का विचार जिस शख्स ने अंग्रेजों से भी पहले इस देश को दिया, वह आदि शंकराचार्य थे। शंकराचार्य पहले शख्स थे, जिन्होंने पूरे भारत को एक भावनात्मक सूत्र में जोड़ा, भले इस भावनात्मक सूत्र की धुरी धार्मिक थी। देश के 12 अलग-अलग कोनों में ज्योतिर्लिंगों की स्थापना और जहां ज्योतिर्लिंग नहीं हैं, वहां ज्योतिर्पीठ की स्थापना। यह सब शंकराचार्य की यात्राओं से ही संभव हुआ। शंकराचार्य के कदम देश के करीब-करीब हर हिस्से में पड़े थे। अंग्रेजों से भी पहले भारत को आधुनिक नक्शा, धार्मिक मठों और मतों को आपस में जोड़ने वाली इन यात्राओं ने ही दिया।



बौद्ध-जैन संतों की यात्राएं

भारत में ज्यादातर संत अपनी यात्राओं के लिए मशहूर रहे हैं। चाहे वे उत्तर के संत रहे हों या दक्षिण भारत के। पूर्व के रहे हों या पश्चिम के। भारतभूमि में संत हमेशा यात्राओं को अपनी जीवनचर्या मानते रहे हैं। चाहे भारत में जन्मा कोई भी धर्म हो, यात्राएं हर धर्म की सर्वोच्च महत्ता में शामिल रही हैं। यही वजह है कि जब भारत में बौद्ध धर्म का बोल-बाला था, तो पूरे भारत में बौद्ध भिक्षुओं की हमेशा यात्राएं चलती रहती थीं। देश के कोने-कोने में बौद्ध विहार बनाए गए, वे यात्रा पर निकले बौद्ध भिक्षुओं के लिए ही थे। जैन धर्म में भी यात्राओं का महत्व रहा है।

स्वाधीनता संघर्ष में महत्ता

आजादी की लड़ाई के दौरान भी हमारी इस विरासत और संस्कृति ने अंग्रेजों को परेशान भी किया, हैरान भी किया और अंततः पराजित भी। अंग्रेज हैरान रहते थे कि संपर्क के बिना आखिरकार स्वतंत्रता सेनानी आसानी से देश के कोने-कोने में कैसे संदेशा भेज देते हैं। दरअसल, इसमें भी भारत की इन धार्मिक यात्राओं का एक बड़ा योगदान था। पश्चिम भारत में धर्म जात्राएं, पूर्व में भगवान जगन्नाथ की यात्रा और चैतन्य महाप्रभु की यात्रा मंडली सिर्फ धर्म का हीनहीं बल्कि देश में स्वाभिमान की भी अलख जगाती थीं। अंग्रेजों के खिलाफ जंग के लिए पूरे देश को तैयार भी करती थीं।

भारत में ज्यादातर संत अपनी यात्राओं के लिए मशहूर रहे हैं। चाहे वे उत्तर के संत रहे हों या दक्षिण भारत के। पूर्व के रहे हों या पश्चिम के। भारतभूमि में संत हमेशा यात्राओं को अपनी जीवनचर्या मानते रहे हैं। चाहे भारत में जन्मा कोई भी धर्म हो, यात्राएं हर धर्म की सर्वोच्च महत्ता में शामिल रही हैं। यही वजह है कि जब भारत में बौद्ध धर्म का बोल-बाला था, तो पूरे भारत में बौद्ध भिक्षुओं की हमेशा यात्राएं चलती रहती थीं। देश के कोने-कोने में बौद्ध विहार बनाए गए, वे यात्रा पर निकले बौद्ध भिक्षुओं के लिए ही थे। जैन धर्म में भी यात्राओं का महत्व रहा है।

स्वाधीनता संघर्ष में महत्ता

आजादी की लड़ाई के दौरान भी हमारी इस विरासत और संस्कृति ने अंग्रेजों को परेशान भी किया, हैरान भी किया और अंततः पराजित भी। अंग्रेज हैरान रहते थे कि संपर्क के बिना आखिरकार स्वतंत्रता सेनानी आसानी से देश के कोने-कोने में कैसे संदेशा भेज देते हैं। दरअसल, इसमें भी भारत की इन धार्मिक यात्राओं का एक बड़ा योगदान था। पश्चिम भारत में धर्म जात्राएं, पूर्व में भगवान जगन्नाथ की यात्रा और चैतन्य महाप्रभु की यात्रा मंडली सिर्फ धर्म का हीनहीं बल्कि देश में स्वाभिमान की भी अलख जगाती थीं। अंग्रेजों के खिलाफ जंग के लिए पूरे देश को तैयार भी करती थीं।





यात्राओं की विरासत

आज जबकि संयुक्त राष्ट्र संघ, दुनिया के अलग-अलग समुदायों के जीवन जीने की प्रवृत्तियों और पंरपराओं को भी धरोहर के रूप में चिन्हित कर रहा है। पिछले दिनों कुंभ मेले को भी मानवता की महान विरासत के रूप में चिन्हित किया है। उसी क्रम में भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नामों, रूपों और तरीकों में मौजूद धार्मिक यात्राओं को भी चिह्नित करना चाहिए क्योंकि भारत के अलावा दुनिया में कोई और देश नहीं है, जहां यात्राएं इतनी सुनिश्चित और इतनी बड़ी संख्या में होती रही हों।

आज भी देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग संदर्भों से कोई 4000 से ज्यादा धार्मिक यात्राएं पूरे साल में होती हैं। जिनमें सबसे ज्यादा लोकप्रिय और पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित करने वाली धार्मिक यात्राएं हैं- चारधाम की यात्रा, जिसमें गंगोत्री, यमुनोत्री के साथ-साथ बद्रीनाथ-केदारनाथ की यात्राएं भी शामिल हैं। इसी तरह अमरनाथ की यात्रा, सबरीमाला की यात्रा, कैलाश मानसरोवर की यात्रा, नर्मदा परिक्रमा और करीब-करीब 3 चौथाई हिंदुस्तान में होने वाली कांवड़ यात्राएं शामिल हैं।

संयुक्त राष्ट्र को हिंदुस्तान की इन यात्राओं को विश्व विरासत के रूप में चिन्हित करना चाहिए क्योंकि यह परंपरा न सिर्फ मानवीय अनुभवों को संपन्न बनाती है बल्कि लोकतांत्रिक समरसता बनाए रखे हुए है। ये यात्राएं देश के आंतरिक पर्यटन का भी एक बहुत बड़ा जरिया हैं। भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय के एक अनुमान के मुताबिक ऐसी धार्मिक यात्राएं हर साल 100 अरब रुपए से ज्यादा का कारोबार मुहैया कराती हैं।

गांधी के गुरु ने दिया था यात्रा का गुरुमंत्र

भारत में यात्राएं सनातन जीवन पद्धति का एक बड़ा और अनिवार्य हिस्सा रही हैं। 1915 में जब महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे और अपने राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले से पूछा कि राजनीतिक जीवन में आने के लिए उन्हें क्या करना चाहिए? गोखले का सुझाव था कि उन्हें पहले समूचे भारत की यात्रा करनी चाहिए। दक्षिण अफ्रीका से गांधी के लौटने के बाद उनकी अपने राजनीतिक गुरु से दो तीन मुलाकातें ही हो सकी थीं। क्योंकि 9 जनवरी 1915 को गांधी जी 46 साल की उम्र में भारत लौटे थे और 19 फरवरी 1915 को गोपाल कृष्ण गोखले स्वर्ग सिधार गए थे। इतने कम समय में उन्होंने अपने राजनीतिक शिष्य को जो गुरुमंत्र दिया था कि वह पूरे देश की यात्रा करें, उन्हें ज्ञान और दिशा खुद ब खुद मिल जाएगी।

गांधी जी ने कई जगहों पर अपनी की गई इस संपूर्ण भारत की यात्रा का जिक्र किया है और इसे अद्भुत, अनुभव देने वाली और सही मायनों में राजनैतिक शिक्षण प्रदान करने वाली कहा है। गांधी जी हमेशा मानते थे कि अगर उन्होंने राजनीति में उतरने के पहले समूचे भारत की यात्रा नहीं की होती, तो वह इस देश को नहीं समझ पाते। ज्यादातर मामलों में अद्भुत शख्सियत थे महात्मा गांधी। जीवन में एक लाख किलोमीटर से भी ज्यादा की पैदल यात्रा करने वाले वे दुनिया के अकेले नेता माने जाते हैं। गांधी जी का जीवन उस सनातन संस्कृति का व्यवहारिक उदाहरण था, जिसमें ज्ञान के लिए 'चरैवेति, चरैवेति' (चलते रहो, चलते रहो) का आह्वान किया गया है।

- लोकमित्र

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