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प्राचीन समय से ही चलती आ रही है ''अंग प्रत्यारोपण'' विधा

वैश्विक स्तर पर स्वीकृत आयुर्वेद की उत्पत्ति भी भारत में ही हुई थी।

प्राचीन समय से ही चलती आ रही है
नई दिल्ली. अंग प्रत्यारोपण यानि कि ऑर्गन ट्रांसप्लांट, आधुनिक चिकित्सा पद्वति का एक बड़ा हिस्सा बन चुका है, लेकिन आपको यह जानकर हैरानी होगी कि प्लास्टिक सर्जरी जैसी चीज़ें केवल आज के युग में नहीं, बल्कि प्राचीन समय में भी थी.... इसका इतिहास जानकर यकीन नहीं कर पाएंगे आप! तब भी भारत में अंग प्रत्यारोपण किया जाता था।
आयुर्वेद
वैश्विक स्तर पर स्वीकृत आयुर्वेद की उत्पत्ति भी भारत में ही हुई थी। हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार समुद्र मंथन से उत्पन्न हुए दिव्य चिकित्सक धनवंतरि ने आयुर्वेद की रचना कर इस ग्रंथ को प्रजापति को सौंप दिया था, ताकि इसकी सहायता से मानव जाति की रक्षा की जा सके।
पुराणों में अंग प्रत्यारोपण
हिन्दू पौराणिक कथाओं में गणेश जी के धड़ पर हाथी का सिर दिखाया गया है। विष्णु के वराह अवतार के धड़ पर सूअर का सिर और नरसिंह अवतार पर सिंह का सिर मौजूद है। यह इस बात का प्रमाण है कि भारत के चिकित्सकों को वैचारिक प्रेरणा तो पौराणिक काल में ही मिल गई थी।
अथर्ववेद
अथर्ववेद की रचना के साथ ही भारत में चिकित्सा पद्वति का उदय हो गया था। इस वेद में रोगों के लक्षण को पहचानने और उनसे मुक्ति पाने के लिए उपयोगी औषधियों का भी जिक्र किया गया है। अथर्ववेद और आयुर्वेद के इतर हिन्दू पौराणिक गाथाओं में स्वस्थ रहने के लिए जरूरी आहार, व्यवहार और विभिन्न बीमारियों के उपचार का जिक्र है।

अनुपात का बिगड़ना
बिगड़े अनुपात की वजह से उत्पन्न हुए लक्षणों को पहचाना जाता है और संतुलन का आंकलन कर उपचार शुरू किया जाता है।
लाइफस्टाइल
इसी तरह मनुष्य की जीवनशैली को भी राजसिक, तामसिक और सात्विक नामक तीन भागों में विभाजित किया गया है। वैज्ञानिक भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि व्यक्तिगत जीवनशैली या लाइफ स्टाइल ही स्वस्थ और अस्वस्थ शरीर का कारण बनती है।
आविष्कार
प्राचीन समय में भारतीय चिकित्सक उपचार में अत्यन्त प्रभावी तरीकों को अपनाते और नए-नए तरीकों का आविष्कार करते थे। उनके पास वो तरीके भी थे, जिनके द्वारा वह रुग्ण अंगों को काटकर उनके स्थान पर दूसरे अंगों को प्रत्यारोपित करते थे।
तीन दोष
हिन्दू धर्म से जुड़े प्राचीन ग्रंथों के अनुसार मानव शरीर से जुड़े तीन दोष पहचाने गए हैं, जिन्हें वात, पित्त और कफ कहा जाता है। इन तीनों के ही उचित अनुपात पर ही किसी भी व्यक्ति का शारीरिक स्वास्थ्य निर्भर करता है। जब भी किसी व्यक्ति के शरीर में इन तीन दोषों का अनुपात बिगड़ता है तो उसका शरीर अस्वस्थ हो जाता है।
शिक्षार्थियों का अभ्यास
उन्होंने विभिन्न प्रकार के शल्य यंत्रों को भी निर्मित किया था जिनकी सहायता से वह शिक्षार्थियों को सिखाने का प्रयत्न करते थे।
शल्य चिकित्सा
वह ना सिर्फ मानव शरीर पर बल्कि मृत पशुओं के शरीर पर शल्य चिकित्सा का अभ्यास किया करते थे। भारतीय शल्य चिकित्सा को इसके बाद चीन, श्रीलंका और दक्षिण पूर्वी एशिया के कई अन्य देशों में भी फैलाया गया था।
गर्भ उपनिषद
ऋषि पिप्पलाद कृत गर्भ उपनिषद में मानव शरीर में मौजूद 108 जोड़, 107 मर्मस्थल, 109 स्नायुतंत्र और 707 नाड़ियों, 360 हड्डियों, 4.5 करोड़ सेल और 500 मैरो का उल्लेख किया गया है।
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