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Independence Day 2022: भारत का हो रहा संपूर्ण विकास, हर क्षेत्र में बढ़ी महिलाओं की भागीदारी... देश की नारी अब नहीं रही बेचारी

आज की महिलाएं पिंजरे में बंद (Women Empowerment) नहीं हैं, अब उनके पास उड़ने (Independence Day 2022) के लिए खुला आसमां है।

Independence Day 2022: भारत का हो रहा संपूर्ण विकास, हर क्षेत्र में बढ़ी महिलाओं की भागीदारी... देश की नारी अब नहीं रही बेचारी
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आज की महिलाएं पिंजरे में बंद नहीं हैं, अब उनके पास उड़ने के लिए खुला आसमां है। लेकिन यह सर्वांगीण विकास के लिए कितना खुला है, इस पर विचार करने की जरूरत है।

  • आज हर क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी है

पीनाज मसानी, गजल गायिका

आज जब हम आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं, इस अवसर पर मैं एक स्त्री होने के नाते नकारात्मक पहलुओं से अपना ध्यान हटाकर जब सकारात्मक पहलुओं की ओर देखती हूं, तो महसूस होता है कि देश में आधी आबादी ने साढ़े सात दशकों में बहुत तरक्की की है। कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है, जहां महिलाओं की भागीदारी ना हो। यह हम महिलाओं के लिए गर्व की बात है। आज गांव-गांव में पढ़ने-लिखने की सुविधा है। अब माता-पिता अपनी बेटियों को उच्च शिक्षा के लिए बड़े शहरों में भेज रहे हैं। यह लोगों की मानसिकता में बहुत बड़ा बदलाव है,जबकि पहले ऐसा नहीं था। महिलाओं को आगे बढ़ाने में सरकार का भी बहुत बड़ा योगदान रहा है। ग्रामीण महिलाएं भी बैंक में जाकर अपना पैसा जमा करवाती हैं। वे साइकिल-स्कूटी चलाकर गांव से शहर काम के लिए जाती हैं। अब उन्हें इस बात का भय नहीं है कि लोग क्या कहेंगे। पहले भी महिलाएं खेतों में जाकर काम करती थीं, अब सभी वर्गों की महिलाएं ऑफिस में जाकर काम कर रही हैं। सबसे बड़ा परिवर्तन यह आया है कि आज महिलाएं खुद ही काम करना चाहती हैं। बड़ी बात यह है कि महिलाएं बाहर के काम के साथ-साथ घर-परिवार की भी जिम्मेदारी अच्छे से निभा रही हैं। जहां तक लिंग भेद की बात है तो यह सभी क्षेत्रों में है। संगीत के क्षेत्र में भी है। सब कुछ समझते हुए भी हमें चुप रह जाना पड़ता है। फिर भी मैं कहूंगी कि आज की महिलाएं इतनी हिम्मती हैं कि सब कुछ झेलने के बाद भी वे दिनों-दिन आगे बढ़ रही हैं। एक खूबसूरत मुकाम हासिल कर रही हैं। महिलाओं को सही मायने में सक्षम बनना है, पूरी आजादी हासिल करनी है तो विचारों से सशक्त बनना होगा।

  • महिलाएं आत्मनिर्भर हुई हैं

पायल कपूर, इंटीरियर डिजाइनर

सही मायने में महिलाएं तभी आजाद कहलाएंगी, जब वे आत्मनिर्भर होंगी। भारत की महिलाएं पहले से आत्मनिर्भर हुई हैं। आज महिलाओं को किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ता। वे अपने घर-परिवार और करियर से संबंधित कोई भी निर्णय ले सकती हैं। अब महिलाओं को परिवार में मान-सम्मान मिल रहा है, उनकी स्थिति मजबूत हुई है। देश की आजादी के बाद समाज में यह एक बहुत बड़ा बदलाव है। स्त्री होने के नाते उन्हें अपने घर-परिवार की अच्छे से देखभाल भी करनी होती है। इस काम को वे बहुत ही प्यार से, जिम्मेदारी से करती हैं। अपने ऑफिस के काम के दौरान बीच-बीच में फोन करके अपने बच्चों का हाल-चाल पूछ लेती हैं, जरूरी हिदायतें भी देती रहती हैं। आज की महिलाएं मल्टीटास्कर हैं, जबकि पति घर के कामों से बचते हैं। दरअसल, हमारे भारतीय समाज में बेटे को शुरू से कोई घरेलू काम नहीं सिखाया जाता है, जबकि लड़कियों से कहा जाता है कि तुम्हें घर के सब काम सीखने हैं। यही वजह है कि लड़के शादी के बाद भी पत्नी को घर के कामों में सहयोग नहीं देते। पहले संयुक्त परिवार होते थे तो घर की औरतों को पुरुषों के सहयोग की जरूरत नहीं पड़ती थी। अब तो एकल परिवार होते हैं। इस कारण घर की अकेली महिला के ऊपर ढेर सारी जिम्मेदारियों का बोझ हो जाता है, जबकि पति-पत्नी दोनों वर्किंग होते हैं तो घर के काम में पति का सहयोग मिलना चाहिए। हालांकि यंग जेनरेशन में कुछ, इस बात को समझते हैं, घर के कामों में पत्नी का हाथ बंटाते हैं। साथ ही दोनों एक-दूसरे को स्पेस भी देते हैं। महिलाओं के लिए यह सुखद बदलाव है।

आज भी हो रहा है महिलाओं का शोषण

  • मालती जोशी, लेखिका

आजादी के मायने बहुत विस्तृत होते हैं, हम सच्चे अर्थों में आजादी का मतलब अभी भी समझ नहीं पाए हैं। शिक्षित होना, आत्मनिर्भर बनना ही सिर्फ आजादी नहीं है। ऐसा नहीं है कि पहले स्त्री का शोषण होता था, जो आजादी मिलने के बाद नहीं होता। आज भी उसका शोषण हो रहा है और अपने ही घर में हो रहा है-आर्थिक शोषण। कई घरों में उसके ऊपर अपने छोटे भाई-बहनों को पढ़ाने-लिखाने की जिम्मेदारी होती है। कई मां-बाप तो अपनी कमाऊ बेटी की शादी ही करना नहीं चाहते। उनको लगता है कि बेटी चली जाएगी तो घर का खर्चा कैसे चलेगा। इतना ही नहीं, ससुराल में भी लोग कमाऊ बहू ही चाहते हैं। ताकि वह अपने ननद-देवर का खर्चा उठाए। इसके कारण बहू अपना परिवार बढ़ाना नहीं चाहती, क्योंकि उसके ऊपर दोहरी जिम्मेदारी आ जाएगी। वह परिवार के लिए सब कुछ करती है, लेकिन अपनी इच्छा से एक पैसा खर्च नहीं कर सकती है। करती है तो उसे हिसाब देना पड़ता है। यह कैसी आजादी है? कई लोग तो अपनी बेटियों से लिखवा लेते हैं कि हमें मां-बाप की जायदाद नहीं चाहिए। आज भी बेटा-बेटी और बहू में भेदभाव देखा जाता है। बेटे को इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ाया जाता है, बेटी को सरकारी स्कूल में। अभी भी लोगों को पुत्र मोह से मुक्ति नहीं मिली है। यह भेदभाव प्रोफेशनल फील्ड में भी देखा जा सकता है, जिसके कारण पुरुष की अपेक्षा महिला को कम वेतन दिया जाता है। जबकि दोनों समान काम करते हैं। हमारे कानून में समानता की बात जरूर है लेकिन क्या सच्चे अर्थों मे यह लागू है? दुष्कर्म के मामले में भी देखा जाता है, जब कोई घटना इस तरह की होती है तो लोग कहते हैं कि लड़की जब 'ऐसे कपड़े' पहन कर बाहर जाएगी तो यही सब होगा ही। सच बात तो यह है कि आजादी के 75 साल के बाद भी लोगों के विचार महिलाओं को लेकर नहीं बदले हैं।

प्रस्तुति: संध्या रानी

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