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परिवार में बढ़ती दूरियों को मिटाने के लिए उठाने होंगे ये कदम

नए दौर की जीवनशैली में परिवार में लोग एक स्पेस लेकर जीना पसंद करते हैं, दखलअंदाजी पसंद नहीं करते। नतीजा यह होता है, एक दिन हम इतने अकेले हो जाते हैं कि जिंदगी की मुश्किलों का अकेले सामना करते हुए जीवन को मुसीबत में डालते हैं। जबकि परिवार में सबके साथ जुड़कर रहने से जिंदगी आसान हो जाती है। सबका साथ होने पर मुश्किलें लंबे समय तक टिकती नहीं। इसलिए स्पेस और आजादी के नाम पर ऐसी भी दूरियां न बनाइए कि परिवार में आपसी जुड़ाव खत्म हो जाएं।

परिवार में बढ़ती दूरियों को मिटाने के लिए उठाने होंगे ये कदम
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नए दौर की सामाजिकता में अपने हों या पराए, कोई किसी से कुछ नहीं पूछता, कोई जुड़ाव नहीं रखना चाहता। आज के दौर की लाइफस्टाइल में सभी ने अपने आप को आजाद कर रखा है या यों कहें कि सबने एक-दूसरे को काफी स्पेस दे रखा है। तभी तो आज की लाइफस्टाइल में कुछ बातें आम मानी जाने लगी हैं।

पैरेंट्स कहते हैं कि हम अपने बच्चों को रोकते-टोकते नहीं। बच्चों का भी कहना है कि वे भी मां-पापा से कुछ नहीं पूछते। ना ही कुछ बताना जरूरी समझते हैं। और तो और पति-पत्नी के बीच भी ऐसी ही कुछ समझ बन गई है या बना ली गई है। बुजुर्ग भी नई पीढ़ी के व्यवहार को अनदेखा कर यह कहने लगे हैं कि वे कुछ बताना ही नहीं चाहते तो हम बार-बार क्यों पूछें?

पारिवारिक जीवन में लोगों को यह नया अंदाज काफी मनभावन लगता है। साथ ही सभी खुश और संतुष्ट हैं कि अब उनके रिश्तों में स्पेस है। लेकिन ज्यादातर रिश्तों में यह स्पेस कभी ना मिटाई जाने वाली दूरियों में बदल रहा है। ऐसे में गौर करने वाली बात यह है कि एक दूजे से दूर होने की नहीं, बैलेंस्ड बिहेवियर के साथ संवाद बनाने और साथ देने की ज्यादा जरूरत है।

संवाद बिना साथ कैसा

रिश्तों में अगर संवाद ही नहीं रहेगा तो साथ के क्या मायने रह जाएंगे? एक दूजे के मन की सुने-समझे बिना एक छत के नीचे रहना औपचारिकता भर ही लगता है। इसलिए मॉडर्न लाइफस्टाइल के नाम पर ना तो आपस में कुछ कहना बंद कीजिए और ना ही पूछना। सवाल-जवाब की यह डोर ही तो अपनों को बांधे रखती है।

इस डोर का टूटना साथ रहते हुए भी साथ छूट जाने जैसा है। कहने-सुनने, पूछने, बताने के इस भाव में फिक्र भी छुपी है और एक-दूजे की सलामती चाहने की सोच भी। लेकिन स्पेस देने के नाम पर कई बार इतनी दूरियां आ जाती हैं कि साथ रहते हुए असुरक्षा का भाव मन में आ जाता है।

यूं भी जरूरत से ज्यादा स्पेस दूरियां ही बढ़ाता है। यह बात हर रिश्ते पर लागू होती है। कई बार सार्थक संवाद और अनुशासन आपके निजी जीवन में दखलअंदाजी करने के लिए नहीं, बल्कि आपकी उलझनों को समझने और साथ देने के इरादे से भी किया जाता है। इसीलिए स्पेस की ओवरडोज को रिश्तों के लिए समस्या ना बनने दें।

सवाल-जवाब क्यों नहीं

आजकल ज्यादातर घरों में लोग एक-दूजे से कुछ पूछने से पहले सोचते हैं। यहां तक कि बुजुर्ग भी अब बच्चों से कम ही सवाल करते हैं। इसकी वजह यह है कि मौजूदा दौर की जीवनशैली में कुछ पूछने-जानने का मतलब पर्सनल लाइफ में झांकना माना जाने लगा है। सोचने वाला पहलू यह है कि यह बात पर्सनल रिश्तों में भी सोची जाने लगी है।

ऐसे में यह एक बड़ा सवाल है कि अपनों से अपने ही सवाल-जवाब क्यों ना करें? घर के ही सदस्यों की जिंदगी की दशा और दिशा में दिलचस्पी क्यों ना लें? जबकि उनका इरादा व्यक्तिगत जिंदगी की तफ्तीश करना नहीं बल्कि हर तरह से अपनों की कुशल कामना से ही जुड़ा होता है। रिश्ते प्यार और भरोसे की नींव पर टिके होते हैं।

अपनों से किए जाने वाली बातचीत इस नींव को और मजबूती ही देती है। ऐसे में बिना संवाद इतनी दूरियां आ जाना कि घर के लोग ही एक-दूजे के बिना जीना सीख लें, तो यकीनन यह चिंता की बात है। प्रैक्टिकल होकर इस बात को समझिए कि अपनों से सवाल-जवाब करना कोई मजबूरी नहीं बल्कि आपसी जुड़ाव के लिए जरूरी है।

गलती से पहले कौन संभालेगा

नई-पुरानी पीढ़ी में आई दूरियां वाकई तकलीफदेह हैं, क्योंकि इनके चलते ना तो बड़े-बुजुर्ग बच्चों की खुशियों का हिस्सा बन पाते हैं और ना ही नई पीढ़ी को समय पर बुजुर्गों के अनुभवों से मार्गदर्शन मिल पाता है। ऐसे कितने ही उदाहरण सामने आए हैं, जो बताते हैं कि समय रहते बच्चों को टोकना उन्हें बड़ी गलती करने से बचाता था।

इसीलिए बड़ों का हक भी है और दायित्व भी कि वे बच्चों को उन बातों के लिए आगाह करें, जो उन्हें गलत रास्ते पर ले जा सकती हैं। हमसे क्या मतलब? ऐसा सोचना गलत है। आजकल देखा जा रहा है, आजाद होना, आजाद छोड़ देने के नाम पर अपनों से दूर होना कितनी गलतियों की वजह बन रहा है।

घर में हर उम्र के सदस्य के लिए यह समझना जरूरी है कि स्पेस का मतलब बेपरवाह होना नहीं है। एक दूजे को स्पेस देने की भी अपनी एक लिमिट होती है। जरूरत इस बात की है कि यह दायरा दूरियां बढ़ाने वाला बिल्कुल ना बने। एक दायरे में रहते हुए जितना कुछ एक-दूजे से पूछा या बताया जा सकता है, जरूर साझा करें।

मदद के लिए किसे पुकारेंगे ?

आपके अपने ही जब आपकी जिंदगी के हालातों से परिचित नहीं होंगें तो किसी मुसीबत में पड़ने पर आप किसे पुकारेंगे ? कुछ ना कहने-सुनने की इस जीवनशैली से जुड़ा यह भी एक चिंतनीय सवाल है। इसीलिए स्पेस या आजादी के नाम पर किसी भी रिश्ते में अकेलापन और असंतुलन नहीं आना चाहिए।

थोड़ी बहुत रोक-टोक या दखलअंदाजी रिश्तों में दिल का वो आधार तैयार करती है, जिसपर आप सुरक्षित महसूस करते हैं। यह भरोसा पाते हैं कि उन लोगों को मदद के लिए पुकारा जा सकता है, जो आपकी विषम परिस्थिति को समझ सकते हैं।

पहले से कुछ भी पता ना हो और आप किसी समस्या में उलझ जाएं तो अपनों के लिए भी उन हालातों को समझना मुश्किल हो जाता है। ऐसा होने पर वे चाहकर भी आपकी मदद नहीं कर पाते। इसलिए पारिवारिक जीवन में ऐसा स्पेस या फ्रीडम न लीजिए या दीजिए, जो आपसी जुड़ाव को खत्म करें, अकेला बनाए।

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