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Noise Pollution के नुकसान जानकर हैरान हो जाएंगे, जानें क्या कहते है एक्सपर्ट्स

अक्सर आपने देखा होगा जब भी आपको आस-पास ज्यादा शोर-शराबा होता है, तो आप घबरा जाते हैं और अपने कानों को दोनों हाथों से दबाने की कोशिश करते हैं। ताकि आप शोर को सुन न सकें। यहां आपको शोर से होने वाले नुकसान और उनसे कैसे बचा जाए। इसके बारे में बताया जा रहा है।

Noise Pollution के नुकसान जानकर हैरान हो जाएंगे, जानें क्या कहते है एक्सपर्ट्स
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प्रतिकात्मक तस्वीर 

आपने यह जरूर महसूस किया होगा कि शोर-शराबे में जी घबराने लगता है। शोर-शराबा हमारी मेंटल हेल्थ (Mental Health) के लिए ही नहीं फिजिकल हेल्थ (Physical Health) के लिए भी नुकसानदायक है। यह हमारी कार्यक्षमता, सोचने-समझने की क्षमता और स्वभाव पर भी नेगेटिव इफेक्ट डालता है।

लर्निंग एबिलिटी पर प्रभाव: मशहूर पत्रकार-लेखक रोन चेपेसियक द्वारा किए गए अध्ययन 'डेसीबल हेल : द इफेक्ट ऑफ लिविंग इन ए नॉइजी वर्ल्ड' में पाया गया कि जो बच्चे अत्यधिक आवाज और शोरगुल के माहौल में बड़े होते हैं, उनकी सेहत और लर्निंग एबिलिटी पर प्रतिकूल असर पड़ता है।

साइंस डेली में प्रकाशित एक अध्ययन में न्यूरो विज्ञानियों ने पाया है कि तेज आवाज के बीच लगातार रहने से कान के हियरिंग सेल्स स्थायी रूप से डैमेज हो सकते हैं, जो कानों में साउंड रिसीवर का काम करती हैं। एक बार क्षतिग्रस्त होने के बाद यह दोबारा विकसित नहीं हो सकती, जिससे व्यक्ति की सुनने की शक्ति खत्म हो सकती है। मोटिवेशनल लेखक रॉबिन शर्मा के अनुसार, अत्यधिक शोरगुल लोगों से बातचीत और ड्रीमिंग को डिस्टर्ब करता है और हमारी जिंदगी की क्वालिटी को भी अकसर प्रभावित करता है।

सेकेंड हैंड स्मोकिंग जैसा नुकसान: अमेरिका स्थित मैसाचुसेट्स के एक संस्थान क्वाइट कोलिशन के मुताबिक ध्वनि प्रदूषण यानी शोर-शराबा सेकेंड हैंड स्मोकिंग जितना नुकसानदायक होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization) ने चेतावनी दी है कि शोर-शराबे वाले शहरों में रहने से ना सिर्फ हियरिंग लॉस बल्कि कार्डियोवैस्कुलर डिजीज और स्लीप डिसऑर्डर भी हो सकता है।

अन्य दुष्प्रभाव (Other Side Effect): अगर आप ज्यादा देर तक शोरगुल वाले स्थान पर रहते हैं तो आपकी ऊर्जा में तेजी से कमी आने लगती है। सारे दिन अत्यधिक शोरगुल में रहने से आपके शरीर और इम्यून सिस्टम (Immune System) पर बुरा असर पड़ता है। एक्सपर्ट कहते हैं कि वर्कप्लेस (Work Place) पर होने वाला शोर प्रोडक्टिविटी भी घटाता है। तमाम कोशिशों के बावजूद शहरी शोरगुल से बच पाना मुश्किल हो गया है। लेकिन ध्वनियों के माध्यम से हम अपने मन को शांत करना सीख सकते हैं। तिब्बती संत सिंगिंग बाउल के प्रयोग से और प्राचीन मिस्र के लोग वावेल ध्वनियों की चैटिंग से मन को शांत रखते थे। साउंड एक्सपर्ट डेनिश लीसेस्टर कहते हैं कि ध्वनि में रिलैक्स, एलर्ट और माइंड सूदिंग की अनूठी शक्तियां होती हैं।

अपनाएं ये उपाय: कई बार वर्किंग आवर्स में शोरगुल वाले स्थानों पर रहना आपकी मजबूरी होती है, इससे होने वाली क्षति की पूर्ति के लिए आपको सुबह या शाम कुछ देर सॉफ्ट साउंड यानी मधुर प्राकृतिक स्वर जैसे झरने की आवाज, चिड़ियों की चहचहाहट आदि के बीच रहना चाहिए। मधुर शास्त्रीय संगीत के स्वर भी आपकी एकाग्रता और प्रोडक्टिविटी बढ़ाते हैं।

साउंड हीलिंग थेरेपी: जर्मन इंजीनियर पीटर हैस ने रेडियेस्थेसिया (मानव शरीर में वाइब्रेशनल फील्ड का विज्ञान) में अपने अध्ययन में बताया है कि साउंड हीलिंग थेरेपी शरीर के बायोलॉजिकल रिदम और अन्य प्रक्रियाओं में तारतम्य स्थापित कर सकती है। अपनी तरह की उनकी इस पहली विज्ञान सम्मत स्टडी में पारंपरिक संगीत का हमारे तन और मन पर सकारात्मक असर प्रमाणित किया गया।

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