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तलाक.तलाक..तलाक... कितना जायज! समीक्षा जरूरी

काउंसिल का कहना है कि पति अपनी पत्नी को एक ही बार में तीन बार तलाक कहकर तलाक न दे।

तलाक.तलाक..तलाक... कितना जायज! समीक्षा जरूरी
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नई दिल्ली. मुस्लिम समाज में मात्र एक बार में तीन बार तलाक कहने से परिवारों के टूटने के कारण समाज में आ रही परेशानियों को दूर करने के लिये सुन्नी उलेमा काउंसिल ने इस मुददे पर मुस्लिम उलेमाओं से विचार करने और इस प्रक्रिया को तीन माह में संपन्न कराने की व्यवस्था पर आम सहमति बनाए जाने को कहा है।
सुन्नी उलेमा काउंसिल ने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और देवबंद तथा बरेलवी समुदाय के उलेमाओं को लिखे पत्र में दावा किया है कि पाकिस्तान, मिस्र, सूडान, इराक, जार्डेन जैसे सात देशों ने अपने यहां कानून बनाया है कि पति द्वारा पत्नी को तलाक देने में तीन मासिक धर्म का अंतर होना चाहिएं।
काउंसिल का कहना है कि पति अपनी पत्नी को एक ही बार में तीन बार तलाक कहकर तलाक न दे बल्कि पहली बार तलाक कहने और दूसरी बार तलाक कहने में महिला के एक मासिक धर्म अवधि का अंतर होना चाहिए। इसी तरह दूसरी से तीसरी बार तलाक कहने के बीच एक और मासिक धर्म का अंतर होना चाहिए। मतलब यह कि तीन बार तलाक कहने में करीब तीन माह का अंतर होना चाहिएं। काउंसिल का कहना है कि इससे मुस्लिम समाज को फायदा यह होगा कि परिवारों को टूटने से बचाया जा सकेगा।
नीचे की स्लाइड्स में पढें, मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड, देवबंद और बरेली के उलेमाओं को पत्र -
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