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ज़ीका और डेंगू से लड़ने के लिए तैयार हो रही अच्छे मच्छरों की सेना

ज़ीका वायरस से दुनिया के 60 से अधिक देशों पीड़ित हैं

ज़ीका और डेंगू से लड़ने के लिए तैयार हो रही अच्छे मच्छरों की सेना
बीजिंग. चीन ज़ीका और डेंगू मच्छरों से छुटकारा पाने के लिए एक अनोखा प्रयोग कर रहा है। चीन के वैज्ञानिक ‘अच्छे’ मच्छरों की ऐसी फौज तैयार कर रहे हैं जिनसे ज़ीका और डेंगू फैलाने वाले मच्छरों की आबादी पर लगाम लगायी जा सकती है।
ज़ीका वायरस से दुनिया के 60 से अधिक देशों पीड़ित हैं। गर्भवती महिलाओं को इससे ज्यादा खतरा है। ज़ीका वायरस से पीड़ित महिलाओं के बच्चों में जन्मजात विकृति आ सकती है। अभी तक ज़ीका वायरस का सफल टीका नहीं खोजा जा सका है। वहीं पूरी दुनिया में 39 करोड़ रुपये डेंगू से प्रभावित हो चुके हैं। डेंगू का टीका है लेकिन इसकी अभी तक गारंटी नहीं है कि किसी को दोबारा डेंगू नहीं होगा। ये दोनों बीमारियों मच्छरों द्वारा फैलती हैं।
चीन के गुआनझाउ प्रांत में स्थित 3500 वर्गफुट की प्रयोगशाला में ज़ीका और डेंगू बीमारियों से लड़ने के ऐसे मच्छरों का प्रजनन कराया जा रहे है जो इन बीमारियों को फैलाने वाले मच्छरों की आबादी पर लगाम लगाएंगे। झियांग शी इसके प्रमुख शोधकर्ता हैं। वो मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी से आए हैं। चीन की ये मच्छर फैक्ट्री सुन यात सेन यूनिवर्सिटी में स्थित है। दोनों यूनिवर्सिटों के इस संयुक्त सेंटर का नाम सुन यात सेन मिशिगन यूनिर्सिटी सेंटर है।
इस प्रयोगशाला में ट्रे में मच्छरों के लार्वा रखे हुए हैं। यहां की एक ट्रे में करीब 6000 लार्वा रखे जाते हैं। इन लार्वा की मदद से वैज्ञानिक हर हफ्ते 50 लाख एडिस एल्बोपिक्टस मच्छरों का प्रजनन कराते हैं। यही मच्छर डेंगू और ज़ीका जैसी बीमारियों के लिए जिम्मेदार होते हैं। मच्छरों को बीफ के लीवर पाउडर और यीस्ट से बना आहार दिया जाता है।
इन मच्छरों के प्रजनन के दौरान उनमें वोल्बएशिया नामक बैक्टीरिया डाल दिया जाता है। इस बैक्टीरिया की वजह से ये मच्छर मनुष्यों को डेंगू वायरस से संक्रमित नहीं कर पाते हैं। इस बैक्टीरिया की वजह से नर मच्छरों की प्रजनन क्षमता भी प्रभावित होती है। प्रयोगशाल से केवल नर मच्छरों को बाहर छोड़ा जाता है। उनके द्वारा प्रजनित मादा मच्छरों के अंडों से बच्चे नहीं निकलते।
वैज्ञानिक माइक्रोस्कोप की मदद से मच्छरों के अंडे में वोल्पशिया बैक्टीरिया डालते हैं जिससे संक्रमित मच्छर पैदा होते हैं। फिर ये मच्छर प्रजनन द्वारा ऐसे दूसरे मच्छर पैदा करते हैं। मच्छरों के लार्वा जब प्यूपा में बदल जाते हैं तो वैज्ञानिक नर को मादा से अलग करते हैं। मादा मच्छरों को लैब तकनीशियन मार देते हैं और नर मच्छरों को एक प्लास्टिक डिब्बे में बंद करके रख जाते हैं ताकि वो वयस्क मच्छर बन सकें।
इन मच्छरों को प्रयोग के लिए फैक्ट्री से करीब 60 किलोमीटर दूर स्थित शाज़ाई द्वीप गांव में छोड़ा जाता है। इस गांव की आबादी करीब 1900 है। शी को उम्मीद है कि इससे मच्छरों की संख्या काफी कम हो जाएगी। वैज्ञानिक इन मच्छरों को द्वीप पर छोड़ने के बाद उनके द्वारा प्रजनित मादा मच्छरों के अंडों पर भी नजर रखते हैं और देखते हैं कि उनसे नए मच्छरों का जन्म हो रहा है कि नहीं। शी के अनुसार उनके प्रयोग के बाद गांव के मच्छरों की संख्या में 96 प्रतिशत की कमी आई है। हालांकि अन्य वैज्ञानिकों को बड़े पैमाने पर इसे लागू किए जाने की संभावना पर संदेह जताया है।
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