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विनय तिवारी ''मोहल्ला अस्सी'' में काशी को पिकनिक स्पॉट नहीं बनाएंगे, 9 गालियों और एक कट के बाद होगी रिलीज

विनय तिवारी निर्मित फिल्म ‘मोहल्ला अस्सी’ विवादों के चलते और सेंसर बोर्ड की आपत्ति की वजह से कई साल से अटकी हुई थी। अब यह 16 नवंबर को रिलीज हो रही है।

विनय तिवारी
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निर्माता विनय तिवारी की फिल्म ‘मोहल्ला अस्सी’ कई तरह के विवादों और अड़चनों के बाद अब जाकर 16 नवंबर को रिलीज होने जा रही है। इस फिल्म से जुड़ी बातें विस्तार से बता रहे प्रोड्यूसर विनय तिवारी।

थोड़ी घबराहट है

इतने साल पहले फिल्म ‘मोहल्ला अस्सी’ को लेकर जो सपना देखा था, जहां से सफर शुरू किया था, अब मंजिल मिलने वाली है। यह सब देखकर अच्छा भी लग रहा है और थोड़ी घबराहट भी है।

हालांकि इतना यकीन है कि जो फिल्म हम लोगों ने बनाई है, वह बहुत अच्छी है और जो लोग सिनेमा में कुछ बढ़िया देखने के शौकीन हैं, उन्हें यह जरूर पसंद आएगी।

ऐसे किया फिल्मों की ओर रुख

शुरू से ही रचनात्मक कामों, खासतौर से सिनेमा की तरफ मेरी रुचि रही है, यह मेरे मन में काफी पहले से था कि मैं फिल्मों की तरफ जाऊं। मेरे एक दोस्त ने डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी से मेरी मुलाकात करवाई।

तब मुझे उन्हीं से पता चला कि उनके पास काशीनाथ सिंह के उपन्यास ‘काशी का अस्सी’ के राइट्स हैं, जिस पर वह फिल्म बनाना चाहते हैं। मैं यह उपन्यास पढ़ चुका था, इसके लेखक काशीनाथ सिंह से भी मिल चुका था।

डॉक्टर साहब का बनाया सीरियल ‘चाणक्य’ हो या उनकी फिल्म ‘पिंजर’, हम लोगों ने देखी है, उनकी प्रतिभा पर सबको भरोसा है। मैंने उनसे कहा कि आप निर्देशित कीजिए फिल्म ‘मोहल्ला अस्सी’ और मैं प्रोड्यूस करता हूं। मुझे यकीन था कि वह इस फिल्म को भी बहुत अच्छे से बनाएंगे और ऐसा हुआ भी है।

चंद्रप्रकाश जी से कोई विवाद नहीं

इस बात की बड़ी चर्चा रही कि डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी के साथ मेरा विवाद हुआ था। मेरा उनसे कोई बड़ा विवाद नहीं था। वैचारिक या कहें कि रचनात्मक मतभेद ही थे, यह जरूरी भी होते हैं, किसी काम को बेहतर बनाने के लिए।

जैसे वह नहीं चाहते थे कि फिल्म में गाने हों, लेकिन मेरा कहना था कि बनारस की पृष्ठभूमि पर फिल्म है और जो थीम है तो उसमें गाने होंगे तो वे ज्यादा असर करेंगे। बाद में उन्हें भी मेरी बात सही लगी और वे राजी हो गए।

सेंसर बोर्ड से टकराव

सेंसर ने तो हमारी फिल्म को सर्टिफिकेट देने तक से मना कर दिया था। उनका कहना था कि इसमें गालियां हैं, धर्म की बात है, मंदिर की बात है। हमारा कहना था कि जो भी है, वह इस समाज से अलग थोड़े ही है।

लेकिन सेंसर बोर्ड के लोग माने नहीं। तब हम लोग हाईकोर्ट गए। उन्होंने पूरी फिल्म देखी और सिर्फ एक छोटा-सा कट लगाया। बाकी पूरी की पूरी फिल्म वैसी है, जैसी बनी थी।

फिल्म से मिलेगा मैसेज

यह फिल्म काशी की उस संस्कृति के पतन की बात करती है, जो कभी वहां की पहचान हुआ करती थी। आपको इसे देखकर भरपूर मनोरंजन मिलेगा, साथ ही फिल्म को देखकर दर्शकों की सोच पर भी असर पड़ेगा।

इसके ट्रेलर में एक संवाद है, मैं बनारस को पिकनिक स्पॉट और गंगा को स्विमिंग पूल नहीं बनने दूंगा। यह एक बहुत अच्छा मैसेज है। मुझे लगता है कि यह फिल्म काशी को मान दिलाएगी।

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