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के.के.मेनन को नहीं पसंद तन्हाई, कहा-नाम बनाने के लिए काम बोलता है

बहुत कम ही ऐसे एक्टर होते हैं, जो हर किरदार में बखूबी ढलना जानते हैं। उसे बिल्कुल रियल बना देते हैं। के.के. मेनन भी उन्हीं कलाकारों में से हैं। अब तक अलग-अलग जॉनर में वह अपने अभिनय के विविध रंग बिखेर चुके हैं।

के.के.मेनन को नहीं पसंद तन्हाई, कहा-नाम बनाने के लिए काम बोलता है
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बहुत कम ही ऐसे एक्टर होते हैं, जो हर किरदार में बखूबी ढलना जानते हैं। उसे बिल्कुल रियल बना देते हैं। के.के. मेनन भी उन्हीं कलाकारों में से हैं। अब तक अलग-अलग जॉनर में वह अपने अभिनय के विविध रंग बिखेर चुके हैं। इन दिनों मेनन अपनी फिल्म ‘फेमस’ को लेकर चर्चा में हैं। इसमें उनका किरदार ही नहीं लुक भी बहुत डिफरेंट है।

मेनन बताते हैं, ‘इस फिल्म की कहानी बहुत अलग है, किरदार भी मिट्टी से जुड़े हैं। ‘फेमस’ की कहानी डाकुओं पर है। लंबे अरसे बाद बॉलीवुड में डाकुओं के जीवन पर फिल्म बनी है। इसकी कहानी काफी दमदार है।

मैंने फिल्म में कड़क सिंह नाम के एक शख्स का रोल किया है। यह किरदार बहुत अलग किस्म का है, इसकी मूंछें भी बहुत अलग तरह की हैं। कड़क सिंह अपने नाम की तरह ही दबंग टाइप का इंसान है। मुझे भी यह किरदार निभाकर बतौर एक्टर बहुत अच्छा लगा।’

जब भी दर्शक के.के. मेनन को बड़े पर्दे पर देखते हैं तो लगता है कि वह अपने किरदार के लिए काफी होमवर्क करते हैं। लेकिन मेनन कहते हैं, ‘मैं अपने किरदारों के लिए ज्यादा होमवर्क नहीं करता हूं। इसके बजाय स्क्रिप्ट की हर डिटेल को पढ़ता हूं। साथ ही अपने डायरेक्टर से डिस्कशन करता हूं, यही मेरा होमवर्क होता है। मुझे कई बार लगता है कि ज्यादा होमवर्क करने से एक्टर भटक जाता है।’

फिल्म का नाम ‘फेमस’ है। बॉलीवुड में जब कोई एक्टर बनता है तो फेमस होने की ख्वाहिश रखता है। कई एक्टर इसके लिए पीआर का सहारा लेते हैं, खुद की पब्लिसिटी करते हैं। लेकिन मेनन इन सब बातों से दूर रहते हैं। वह बताते हैं, ‘मैं इस तरह का इंसान नहीं हूं कि फेमस होने के लिए पीआर मैनेजर रखूं, पब्लिसिटी के हथकंडे अपनाऊं।

मेरा मानना है कि एक एक्टर का काम बोलता है। अगर आप अच्छी एक्टिंग करेंगे तो फेमस जरूर होंगे। वैसे मेरा मानना है कि जो इंसान पहले से फेमस है, वह और फेमस होना चाहता है। ऐसी उम्मीदों का कोई अंत नहीं है, बाद में इस वजह से जिंदगी से सुकून दूर हो जाता है। ऐसा होना ठीक नहीं है।’

पिछले कुछ समय से के.के़ मेनन की फिल्मों को सफलता नहीं मिल रही है। पिछली फिल्म ‘वोडका डायरीज’ में उनका किरदार अच्छा होने के बावजूद दर्शकों ने फिल्म को पसंद नहीं किया है। लंबे समय से एक्टिंग वर्ल्ड में एक्टिव मेनन को अपनी फिल्मों की असफलता-सफलता से कितना फर्क पड़ता है, पूछने पर वह बताते हैं, ‘किसी भी फिल्म की सफलता सिर्फ मेरे लिए ही नहीं, फिल्म से जुड़े सभी लोगों के लिए मायने रखती है।

अगर फिल्म छोटे बजट की है, एक्सपेरिमेंटल है और असफल हुई है तो फिर मेकर्स को निराशा होती है, इस वजह से आगे अलग तरह के कंटेंट पर लोग वर्क नहीं करते हैं। फिल्म ‘वोडका डायरीज’ एक सस्पेंस थ्रिलर थी, कम बजट की फिल्म थी। इसे दर्शकों ने क्यों नकारा, पता नहीं? कई बार दर्शक एक एक्टर की एक्टिंग की खूब तारीफ करते हैं, लेकिन अलग जॉनर की फिल्में देखते ही नहीं हैं। अब क्या किया जाए?’

सुनने में आया है कि एक मराठी फिल्म में भी के.के. मेनन काम कर रहे हैं। मराठी फिल्म में एक्ट करने का डिसीजन उन्होंने बहुत सोच-समझकर लिया है। वह बताते हैं, ‘मराठी फिल्मों में पिछले कुछ सालों में बहुत अच्छा कंटेंट सामने आया है। मुझे मराठी भाषा अच्छे से समझ में आती है। इन दिनों मैं मराठी बोलना सीख भी रहा हूं।

एक्टर, डायरेक्टर लोकेश गुप्ता की इस फिल्म में बच्चों और पैरेंट्स के बीच जनरेशन गैप की कहानी है। यह कहानी मुझे अच्छी लगी, इस फिल्म का टाइटल है ‘एक सांगायचय’ (कुछ कहना है)।’

के.के. मेनन के किरदार फिल्मों में बहुत अकेले किस्म के होते हैं। असल जिंदगी में भी वह देखने में संजीदा लगते हैं। कई लोगों को लगता है कि वह असल जिंदगी में खुद में खोए रहने वाले इंसान हैं। लेकिन यह बात पूरी तरह से सच नहीं है।

के.के. कहते हैं, ‘मैं असल जिंदगी में लोनली नहीं हूं। मुझे तन्हाई पसंद है, लेकिन मैं तन्हा नहीं हूं। अपनी पत्नी के साथ सुकून भरी जिंदगी जी रहा हूं। मैं रिश्तों की कद्र करने वाला इंसान हूं। हां, मैं अपनों से अलग किसी दूसरे शख्स की कंपनी को एंज्वॉय नहीं कर पाता हूं। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि मैं एक बोर इंसान हूं।’

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