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कंगाली के दौर से गुजर रहा पाकिस्तान एक बार फिर अमेरिका से 'वसूली' के जुगाड़ में जुट गया है। ईरान और अमेरिका के बीच शांति वार्ता की मेजबानी करने के बदले पाकिस्तान ने वाशिंगटन से भारी वित्तीय सहायता की उम्मीद जताई है।

पाकिस्तान एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर खुद को 'पीसमेकर' के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन इसके पीछे उसकी मंशा शांति से ज्यादा अमेरिकी डॉलर पर टिकी है।

खुफिया रिपोर्टों और विशेषज्ञों का दावा है कि इस्लामाबाद में ईरान और अमेरिका के बीच होने वाली प्रस्तावित वार्ता के लिए पाकिस्तान ने अमेरिका से भारी वित्तीय सहायता की उम्मीद लगा रखी है।

कंगाली की कगार पर खड़ा पाकिस्तान इस वार्ता को अपनी डूबती अर्थव्यवस्था के लिए एक 'लाइफलाइन' के रूप में देख रहा है। वह चाहता है कि इस मध्यस्थता के बदले अमेरिका उसे मोटा आर्थिक पैकेज या कर्ज में बड़ी रियायत दिलाए।

​यह पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान ने किसी कूटनीतिक संकट को कमाई के अवसर में बदला हो। इतिहास के पन्ने बताते हैं कि पाकिस्तान पहले भी दो बार इसी तरह अमेरिका से अपनी जेब भर चुका है।

पहली बार 80 के दशक में सोवियत-अफगान युद्ध के दौरान और दूसरी बार 9/11 के बाद 'वॉर ऑन टेरर' में शामिल होकर पाकिस्तान ने अमेरिका से अरबों डॉलर की सैन्य और नागरिक सहायता वसूली थी। विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान की पुरानी आदत रही है कि वह खुद को एक रणनीतिक साझेदार के रूप में बेचता है और बदले में बड़ी रकम हासिल करता है।

​मौजूदा स्थिति में पाकिस्तान खुद को ईरान और अमेरिका के बीच एकमात्र भरोसेमंद मध्यस्थ के रूप में देख रहा है। पाकिस्तान की कोशिश है कि वह अमेरिका को यह विश्वास दिलाए कि केवल वही ईरान को वार्ता की मेज पर ला सकता है।

इसके बदले में पाकिस्तानी सेना और सरकार की नजर 'कोएलिशन सपोर्ट फंड' जैसे पुराने फंडिंग रास्तों को फिर से खुलवाने पर है। हालांकि, अमेरिकी रक्षा विभाग के कई अधिकारी अब पाकिस्तान की इस 'दोहरी चाल' को लेकर सतर्क हैं और वे इसे एक कूटनीतिक ब्लैकमेलिंग की तरह देख रहे हैं।

​डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल में पाकिस्तान को मिलने वाली सैन्य सहायता पर रोक लगा दी गई थी, जिससे दोनों देशों के रिश्तों में कड़वाहट आई थी। लेकिन अब ट्रंप के 'पसंदीदा' कहे जाने वाले जनरल आसिम मुनीर इस रिश्ते को फिर से 'लेन-देन' के धरातल पर लाने की कोशिश कर रहे हैं।

सवाल यह है कि क्या ट्रंप प्रशासन पाकिस्तान के इस पुराने 'वसूली' वाले ट्रैक रिकॉर्ड को जानते हुए भी उसे फंड जारी करेगा? विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान इस समय अपनी कूटनीति का इस्तेमाल केवल और केवल विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाने के लिए कर रहा है।

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