लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित वोटों के महत्व को देखते हुए कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने अपनी रणनीतियां तेज कर दी हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी लखनऊ के इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में करीब 4 हजार दलित समुदाय के लोगों के साथ सीधा संवाद करेंगे।
यह पहली बार है जब राहुल गांधी बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम की जयंती के उपलक्ष्य में किसी बड़े मेगा इवेंट का हिस्सा बन रहे हैं। इस कदम को 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले मायावती के 'जाटव' कोर वोट बैंक को अपनी ओर आकर्षित करने के एक बड़े प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
सपा और कांग्रेस की साझा नजर: 'PDA' और मुस्लिम-दलित गठजोड़ पर जोर
समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने भी कांशीराम जयंती को 'PDA दिवस' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के रूप में मनाने का एलान किया है। सपा 15 मार्च को प्रदेश के सभी 75 जिलों में बड़े कार्यक्रम आयोजित करने जा रही है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि अखिलेश यादव को यह समझ आ चुका है कि केवल मुस्लिम और यादव (MY) समीकरण के भरोसे सत्ता में वापसी संभव नहीं है।
वहीं कांग्रेस भी यूपी में करीब 40% मुस्लिम-दलित वोट बैंक पर नजर गड़ाए हुए है, क्योंकि इसके बिना दिल्ली या लखनऊ की सत्ता तक पहुँचना उनके लिए बेहद मुश्किल है।
बसपा की वर्तमान स्थिति और विपक्षी दलों की उम्मीदें
लोकसभा चुनावों के बाद बहुजन समाज पार्टी को फिलहाल कमजोर स्थिति में माना जा रहा है। संसद में बसपा का कोई सदस्य नहीं है और यूपी विधानसभा में केवल एक विधायक बचा है। इसी राजनीतिक शून्यता का लाभ उठाने के लिए सपा और कांग्रेस दलितों के बीच यह संदेश देना चाहते हैं कि वे ही उनके असली हितैषी हैं।
हालांकि, मायावती का संगठन अभी भी जमीनी स्तर पर सक्रिय है और 9 अक्टूबर 2025 को लखनऊ में उमड़ी लाखों की भीड़ यह साबित करती है कि बसपा का कोर वोटर फिर से उनके साथ तेजी से जुड़ रहा है।
यूपी में दलित वोटर्स की ताकत और निर्णायक सीटें
उत्तर प्रदेश की सियासत में दलितों की भूमिका बेहद निर्णायक है। प्रदेश में करीब 21% दलित वोटर हैं और 403 विधानसभा सीटों में से 84 सीटें अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित हैं। इसके अलावा 40 से 50 ऐसी सीटें हैं जहाँ दलित वोटर 20% से 30% के बीच हैं, जिसका सीधा मतलब है कि प्रदेश की करीब 130 सीटों पर दलित मतदाता हार-जीत का फैसला करते हैं।
दलितों के भीतर उपजातियों की बात करें तो 54% जाटव, 16% पासी और बाकी हिस्सों में धोबी, कोरी, वाल्मीकि जैसी जातियां बंटी हुई हैं, जिन्हें साधने के लिए सभी दलों में होड़ मची है।
2024 के नतीजों से मिला विपक्षी गठबंधन को उत्साह
2024 के लोकसभा चुनाव 'संविधान खतरे में है' के विमर्श के बीच लड़े गए थे, जिसका सीधा फायदा सपा-कांग्रेस गठबंधन को मिला। प्रदेश की 17 सुरक्षित सीटों में से इंडिया गठबंधन ने भाजपा के बराबर 8 सीटें जीती थीं। यहाँ तक कि सामान्य कोटे की अयोध्या सीट पर भी दलित चेहरे अवधेश प्रसाद को उतारकर सपा ने बड़ी जीत दर्ज की थी।
गठबंधन इसी सफलता को 2027 के विधानसभा चुनाव में भी दोहराना चाहता है, जबकि भाजपा गैर-जाटव दलितों जैसे पासी, धोबी और कोरी समाज को अपने पाले में बनाए रखने की कोशिश कर रही है।










