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भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता ने कहा कि अनाज मंडियों में बायोमैट्रिक सिस्टम और ट्रैक्टरों पर नंबर प्लेट की अनिवार्यता जैसे नियम खेती को खत्म करने की साजिश हैं।

भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता और प्रमुख किसान नेता राकेश टिकैत रविवार को भिवानी पहुंचे। वे यहां पूर्व सांसद जंगबीर सिंह के देहांत पर शोक व्यक्त करने और उनके परिजनों को ढांढस बंधाने आए थे। इस दौरान पत्रकारों से रूबरू होते हुए टिकैत ने सरकार की कृषि नीतियों और फसल खरीद के नए नियमों पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने स्पष्ट कहा कि सरकार के अव्यावहारिक फैसलों के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में भाईचारा और परिवार टूटने की कगार पर हैं। 

बायोमैट्रिक सिस्टम पर उठाए सवाल  
राकेश टिकैत ने अनाज मंडियों में फसल बेचने के लिए लागू किए जा रहे डिजिटल और बायोमैट्रिक नियमों की कड़ी आलोचना की। उन्होंने तर्क दिया कि खेती को कॉरपोरेट ऑफिस के चश्मे से देखना गलत है। टिकैत ने कहा कि आज भी गांवों में जमीनें बुजुर्गों के नाम पर हैं। यदि किसी 95 साल के बुजुर्ग के नाम जमीन है, तो क्या फसल बेचने के लिए उनका अंगूठा लगवाने उन्हें मंडी ले जाया जाएगा? 

उन्होंने आगे कहा कि यदि जमीन किसी विवाहित बेटी के नाम है, तो भुगतान उसके खाते में जाने और बायोमैट्रिक की अनिवार्यता से पारिवारिक विवाद बढ़ेंगे। टिकैत ने मांग की कि पुरानी व्यवस्था, जिसमें किसान और व्यापारी आपसी तालमेल से काम करते थे, उसे ही बहाल रखा जाए क्योंकि अत्यधिक 'पढ़ा-लिखा' सिस्टम खेती की जमीनी हकीकत से कोसों दूर है। 

एनजीटी के नियम किसानों को बना देंगे अपराधी 
ट्रैक्टरों पर नंबर प्लेट और समय सीमा के नियमों को लेकर टिकैत ने गंभीर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के आदेशों के चलते एनसीआर में 10 साल और अन्य इलाकों में 15 साल पुराने ट्रैक्टरों का न तो दोबारा पंजीकरण हो रहा है और न ही बीमा। ऐसी स्थिति में किसानों के कृषि वाहन कबाड़ हो जाएंगे। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि कोई किसान पुराने ट्रैक्टर के साथ पकड़ा गया, तो उसे जेल जाना पड़ेगा। टिकैत ने कहा कि किसान के पास अक्सर पुराने वाहनों के पूरे दस्तावेज नहीं होते, ऐसे में सरकार का यह रुख सीधे तौर पर ट्रैक्टरों को बंद करने की साजिश है।

उद्योगपतियों और सरकार की नजर अब किसानों की कीमती जमीनों पर 
राकेश टिकैत ने आईएमटी (IMT) और बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट्स को किसानों की जमीन छीनने का जरिया बताया। उन्होंने कहा कि बड़े उद्योगपतियों और सरकार की नजर अब किसानों की कीमती जमीनों पर है। उद्योग लगाने के नाम पर फाइलें मंजूर कराई जाती हैं, लेकिन हकीकत में वहां कारखाने नहीं लगते। बाद में वही जमीनें महंगे दामों पर बेचकर मुनाफा कमाया जाता है। उन्होंने किसानों से भावुक अपील करते हुए कहा कि वे अपनी जमीन किसी भी कीमत पर न बेचें, क्योंकि जमीन कभी घाटे का सौदा नहीं होती और दिल्ली की सत्ता की 'कलम' किसानों के प्रति बेईमान हो चुकी है।

फसल नुकसान और मुआवजे की मांग
हाल की बारिश और ओलावृष्टि से गेहूं की फसल की तबाही पर टिकैत ने कहा कि भले ही दाना खेत में हो, लेकिन वह छोटा रह जाएगा और उसे समेटने में लेबर का खर्च कई गुना बढ़ जाएगा। उन्होंने सरकार को सुझाव दिया कि गिरदावरी के समय पूरे क्षेत्र के बजाय 'एक खेत' को इकाई माना जाए। यदि किसी विशेष खेत में नुकसान हुआ है, तो केवल उसी आधार पर मुआवजा मिलना चाहिए। क्षेत्र को इकाई मानने से असली पीड़ित किसान को कभी न्याय नहीं मिल पाता।

आंदोलन की दोबारा आहट 
जब उनसे पूछा गया कि क्या इन नियमों के खिलाफ फिर से आंदोलन होगा तो टिकैत ने बेबाकी से कहा कि इसकी पूरी जरूरत है और देशभर में बैठकें शुरू हो चुकी हैं। उन्होंने कहा कि लोग अब जागरूक हो रहे हैं। यदि सरकार ने अपनी नीतियां नहीं बदलीं तो पहले हुए ऐतिहासिक आंदोलन की तरह ही एक बार फिर बड़ा 'मूवमेंट' शुरू किया जाएगा। उन्होंने जहरीली खेती पर भी चिंता जताई और कहा कि सरकार ऑर्गेनिक खेती पर सब्सिडी देने के बजाय विदेशी दूध आयात करने की तैयारी में है, जो भारतीय पशुधन और किसानों को पूरी तरह बर्बाद कर देगा। 

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