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पंचकूला की विशेष सीबीआई अदालत ने हुड्डा के साथ-साथ एजेएल के दिवंगत चेयरमैन मोतीलाल वोरा को भी दोषमुक्त करार दिया। सुनवाई के दौरान 78 वर्षीय हुड्डा न्यायालय में उपस्थित रहे।

हरियाणा की राजनीति और कानूनी गलियारों से एक बेहद महत्वपूर्ण खबर सामने आई है। पंचकूला स्थित सीबीआई (CBI) की विशेष अदालत ने एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (AJL) को भूखंड आवंटित करने के बहुचर्चित मामले में प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को बड़ी राहत दी है। न्यायालय ने शुक्रवार को सुनवाई करते हुए हुड्डा और एजेएल के तत्कालीन चेयरमैन मोतीलाल वोरा को इस केस के सभी आरोपों से मुक्त कर दिया है। 

उल्लेखनीय है कि मोतीलाल वोरा, जो मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रह चुके थे, उनका छह वर्ष पूर्व देहांत हो चुका है। वहीं, 78 वर्षीय भूपेंद्र सिंह हुड्डा स्वयं शुक्रवार को पंचकूला की विशेष अदालत में पेश हुए, जहां उनके पक्ष में यह फैसला सुनाया गया। 

हाईकोर्ट की टिप्पणी बनी फैसले का आधार 
भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने इससे पहले सीबीआई की विशेष अदालत द्वारा आरोप तय किए जाने के निर्णय को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट में जस्टिस त्रिभुवन दहिया की एकल पीठ ने करीब एक महीने पहले इस मामले पर गंभीर टिप्पणी की थी। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा था कि प्रथम दृष्टया हुड्डा के खिलाफ आरोप सिद्ध नहीं हो रहे हैं। 
उच्च न्यायालय का मानना था कि पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में किसी व्यक्ति के विरुद्ध आपराधिक मुकदमा चलाना न्याय प्रणाली का दुरुपयोग है। इसी आधार को संज्ञान में लेते हुए शुक्रवार को पंचकूला की सीबीआई कोर्ट में हुड्डा के अधिवक्ता एसपीएस परमार ने पुरजोर तरीके से अपना पक्ष रखा, जिसे स्वीकार करते हुए कोर्ट ने उन्हें दोषमुक्त करने का आदेश जारी किया। 

ये था पूरा विवाद  
यह पूरा मामला पंचकूला के सेक्टर-6 में स्थित लगभग 3,360 वर्ग मीटर के एक सरकारी प्लॉट के आवंटन से जुड़ा है। जांच एजेंसियों का आरोप था कि मुख्यमंत्री रहते हुए हुड्डा ने नियमों की अनदेखी कर लगभग 65 करोड़ रुपये की अनुमानित कीमत वाले इस भूखंड को एजेएल को मात्र 69.39 लाख रुपये में फिर से आवंटित कर दिया था। सीबीआई ने इस मामले में हुड्डा के साथ-साथ हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (HSVP) के चार वरिष्ठ अधिकारियों को भी नामजद किया था। 

1982 से अब तक, विवादों का सफरनामा 
इस जमीन के आवंटन और बहाली की कहानी चार दशक पुरानी है। 
1. शुरुआती आवंटन (1982) : भजनलाल सरकार के कार्यकाल के दौरान यह जमीन एजेएल को अखबार शुरू करने के उद्देश्य से दी गई थी। उस समय मोतीलाल वोरा संस्थान के प्रमुख थे। 
2. प्लॉट की वापसी (1992) : 10 साल बीत जाने के बाद भी जब जमीन पर निर्माण कार्य पूरा नहीं हुआ, तो भजनलाल सरकार ने आवंटन रद्द कर दिया। तर्क दिया गया कि 6 महीने में शुरू होने वाला काम 10 साल में भी अधूरा था। 
3. हुड्डा सरकार की वापसी और पुनः आवंटन (2005): सत्ता परिवर्तन के बाद जब 2005 में भूपेंद्र हुड्डा मुख्यमंत्री बने, तो उन्होंने पुराने रेटों पर ही इस प्लॉट को दोबारा एजेएल के नाम कर दिया। इसी कदम को लेकर बाद में भ्रष्टाचार की शिकायतें दर्ज हुईं। 

भाजपा शासन में दर्ज हुआ था केस 
राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद 2014 में भाजपा सरकार आई, जिसने इस मामले की जांच तेज की। मई 2016 में हरियाणा विजिलेंस ब्यूरो ने प्राथमिकी दर्ज की, जिसके बाद अप्रैल 2017 में जांच सीबीआई को सौंप दी गई। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने भी इस मामले में धन शोधन (Money Laundering) के कोण से जांच शुरू की थी। 
सीबीआई ने 2018 में अपनी चार्जशीट दाखिल की थी, लेकिन 2021 से 2025 के बीच हाईकोर्ट ने इस मामले की कार्यवाही पर रोक लगा रखी थी। आखिरकार, लंबे समय तक चली कानूनी जंग के बाद कोर्ट ने माना कि आवंटन प्रक्रिया में आपराधिक षड्यंत्र के पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं। 

समर्थक बोले- पूर्व मुख्यमंत्री के खिलाफ लगाए गए आरोप राजनीति से प्रेरित थे 
भूपेंद्र सिंह हुड्डा के लिए यह फैसला एक बड़ी राजनीतिक जीत के रूप में देखा जा रहा है। उनके समर्थकों का मानना है कि यह निर्णय साबित करता है कि पूर्व मुख्यमंत्री के खिलाफ लगाए गए आरोप राजनीति से प्रेरित थे। हालांकि, सरकारी एजेंसियों के अगले कदम पर अभी सबकी नजरें टिकी हैं। फिलहाल, 7 घंटे की आग वाली घटना के बाद हरियाणा की सियासत में यह दूसरी सबसे बड़ी चर्चा का विषय बना हुआ है। 

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