haribhoomi hindi news
Delhi High Court: दिल्ली हाईकोर्ट ने राइट टू एजुकेशन के तहत खास स्कूल चुनाव के अधिकार को लेकर फैसला सुनाया है, यहां पढ़ें पूरी खबर...

Delhi High Court: दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है कि किसी बच्चे के शिक्षा के अधिकार में उसके लिए कोई खास स्कूल चुनाव करने का अधिकार शामिल नहीं है। बता दें कि कोर्ट ने यह फैसला एक महिला की अपील पर सुनाया है। इस अपील में महिला ने अपने बच्चे को 2024-2025 एकेडमिक सेशन के लिए EWS कैटेगरी के तहत एक प्राइवेट स्कूल में दूसरी कक्षा में दाखिले के लिए गुहार लगाई थी।

दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस डी के उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की बेंच का कहना है कि 'शिक्षा का अधिकार एक्ट एक फायदेमंद कानून है। इसे सामाजिक समावेश के लक्ष्यों को पाने और यह पक्का करने के लिए बनाया गया था कि स्कूल एक ऐसी जगह बनें, जहां जाति, नस्ल या वर्ग के आधार पर कोई भेदभाव न हो। कोर्ट ने 25 मार्च को फैसला सुनाते हुए कहा कि शिक्षा के इस अधिकार को किसी खास स्कूल को चुनने के अधिकार के तौर पर नहीं देखा जा सकता।'

अपीलकर्ता ने दी थी चुनौती 

बताया जा रहा है कि अपीलकर्ता ने इससे पहले 2023-2024 के शैक्षणिक सत्र के लिए एक प्राइवेट स्कूल की पहली क्लास में EWS कैटेगरी के तहत अपने बच्चे के दाखिले के लिए हाई कोर्ट की एकल जज की पीठ से संपर्क किया था। इस अपील में, अपीलकर्ता ने एकल जज के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें कहा गया था कि 'चूंकि स्कूल के पास अपीलकर्ता के बच्चे को दाखिला देने से इनकार करने का कोई वैध आधार नहीं था, फिर भी संबंधित शैक्षणिक वर्ष के खत्म हो जाने के कारण कोर्ट उसके बच्चे को अगले शैक्षणिक वर्ष यानी 2024-25 में एडमिशन देने का आदेश जारी करने में असमर्थ थी।' 

एकल जज ने कहा था कि इस शैक्षणिक वर्ष के लिए क्लास पहली में EWS की जो सीटें खाली पड़ी हुई हैं, उन्हें अगले साल इसी कक्षा के लिए आगे बढ़ाया जाएगा। अगर कोई EWS उम्मीदवार आवेदन करना चाहता है, जिसमें अपीलकर्ता का बच्चा भी शामिल है तो ये सीटें उसके लिए उपलब्ध होंगी। लेकिन, अपीलकर्ता ने डिवीजन बेंच के सामने यह तर्क दिया कि उसके बच्चे को शैक्षणिक वर्ष 2024-2025 के लिए स्कूल में कक्षा 2 में प्रवेश दिया जाना चाहिए।

डिवीजन बेंच ने अपील में राहत देने से मना कर दिया। बेंच ने कहा कि  कि याचिका के लंबित रहने के दौरान अंतरिम आदेश के तहत अस्थायी दाखिला या सीट आरक्षित करने का कोई आदेश न होने सूरत में शैक्षणिक साल समाप्त होने के साथ ही स्कूल में एडमिशन लेने का अधिकार भी खत्म हो गया है।

स्कूल के अंदर जाने से रोका-अपीलकर्ता

बेंच ने यह भी कहा कि जब स्कूल ने एडमिशन देने से मना कर दिया तो शिक्षा निदेशालय ने अपीलकर्ता के बच्चे को एक दूसरे स्कूल में समायोजित कर दिया। यह स्कूल उन पसंदीदा स्कूलों में से एक था जिन्हें अपीलकर्ता ने आवेदन फॉर्म भरते वक्त चुनाव किया था। कोर्ट ने यह नोट किया कि अपीलकर्ता ने दूसरे स्कूल को स्वीकार नहीं किया।

अपीलकर्ता का कहना था कि मार्च 2023 में शिक्षा निदेशालय ने किए गए लॉटरी ड्रॉ के दौरान उनके बच्चे का नाम एक प्राइवेट स्कूल में एडमिशन के लिए चुना गया था। उन्होंने आरोप लगाया कि जब वह डॉक्यूमेंट्स के वेरिफिकेशन और एडमिशन की प्रक्रिया पूरी करने के लिए स्कूल गईं तो उन्हें अंदर जाने से रोक दिया गया। बताया गया कि उन्हें आगे की जानकारी दी जाएगी।

अपीलकर्ता ने रिट याचिका क्यों दायर की ?

कोर्ट को यह भी बताया गया कि बाद में अपीलकर्ता को सूचना दी गई कि EWS बच्चों को तब तक एडमिशन नहीं दिया जा सकता, जब तक कि जनरल कैटेगरी की सभी सीटें भर न जाएं। इसलिए उनके बच्चे को वेटिंग लिस्ट में डाल दिया गया। इसलिए, उसने एक रिट याचिका दायर की, जिसमें स्कूल को यह निर्देश देने की मांग की गई कि वह शिक्षा निदेशालय द्वारा लॉटरी के माध्यम से चुनी गई उम्मीदवारों की सूची के आधार पर प्रवेश दे।

नगर निगम स्कूल में प्रवेश देने की पेशकश

अपील की सुनवाई के दौरान, शिक्षा निदेशालय के वकील ने अपीलकर्ता के बच्चे को किसी भी नगर निगम स्कूल में प्रवेश देने की पेशकश की। अपीलकर्ता के वकील ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। उन्होंने कहा कि अपीलकर्ता आवंटित स्कूल के अलावा किसी अन्य संस्थान में प्रवेश स्वीकार करने को तैयार नहीं है, क्योंकि उनकी ओर से कोई गलती न होने के बावजूद उनके बच्चे को प्रवेश देने से मना कर दिया गया था। 

7