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साल 2003 में दर्ज रेप के एक मामले में हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को रद्द करते हुए आरोपी को दोषमुक्त कर दिया है।

पंकज गुप्ते- बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने शादी का झांसा देकर दुष्कर्म के मामले में निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को रद्द कर दिया है। इसके साथ ही आरोपी को बरी करने का फैसला सुनाया है।

हाईकोर्ट ने कहा है कि, मामले में प्रस्तुत साक्ष्यों से यह साबित नहीं होता कि, आरोपी ने पीड़िता से शादी का झूठा वादा कर केवल शारीरिक संबंध बनाने के उद्देश्य से संबंध बनाए थे। ऐसे मामलों में यदि संबंध सहमति से बने हों और धोखे की मंशा साबित न हो पाए, तो इसे दुष्कर्म नहीं माना जा सकता। 

मामला सरगुजा का
दरअसल पूरा मामला सरगुजा जिले के अंबिकापुर क्षेत्र का है। शिकायत के अनुसार पीड़िता और आरोपी पढ़ाई के दौरान एक-दूसरे के संपर्क में आए थे और आरोपी ने शादी का आश्वासन देकर 2000 से 2003 के बीच कई बार शारीरिक संबंध बनाए। बाद में शादी नहीं करने पर पीड़िता ने 2003 में पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। जिसके आधार पर आरोपी के खिलाफ धारा 376 के तहत अपराध दर्ज किया गया था। सत्र न्यायालय अंबिकापुर ने वर्ष 2005 में आरोपी को दोषी ठहराते हुए 7 वर्ष के कठोर कारावास और 5 हजार रुपए जुर्माने की सजा सुनाई थी।

7 साल की सजा को हाईकोर्ट में चुनौती
इसी फैसले को आरोपी ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की सिंगल बेंच ने मामले की सुनवाई के बाद कहा कि, उपलब्ध साक्ष्यों से यह स्पष्ट है कि दोनों के बीच संबंध सहमति से थे। मेडिकल और एफएसएल रिपोर्ट में भी दुष्कर्म के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिले। साथ ही यह भी साबित नहीं हो सका कि, आरोपी ने शुरू से ही शादी का झूठा वादा कर संबंध बनाए थे।

ट्रायल कोर्ट ने दोषी ठहराने में की गलती
हाईकोर्ट ने कहा कि, ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया और आरोपी को दोषी ठहराने में त्रुटि की। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय के फैसले को निरस्त करते हुए आरोपी को दुष्कर्म के आरोप से बरी कर दिया और उसकी अपील स्वीकार कर ली।

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