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नारायणपुर में माता मावली का मेला बुधवार को आस्था, परंपरा और आदिवासी सांस्कृतिक वैभव से शराबोर नजर आया। 

इमरान खान- नारायणपुर। बुधवार को नारायणपुर आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक वैभव से सराबोर नजर आया, जब ऐतिहासिक माता मावली मेला पूरे पारंपरिक विधि-विधान और उल्लास के साथ प्रारंभ हुआ। ढोल-नगाड़ों की गूंज, मांदर की थाप और पारंपरिक वेशभूषा में सजे जनजातीय समुदायों की भव्य उपस्थिति ने पूरे वातावरण को भक्तिमय ऊर्जा से भर दिया। ऐसा प्रतीत हुआ मानो बस्तर की आत्मा स्वयं उत्सव के रूप में साकार हो उठी हो।

कुलदेवी के रूप में पूजी जाती हैं माता मावली
माता मावली को अंचल की कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है। सैकड़ों वर्षों से निरंतर आयोजित हो रहा यह मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान का सशक्त प्रतीक रहा है। प्राचीन परंपरा के अनुसार देवी पूजा और ‘देव परघाव’ की रस्म के साथ मेले का शुभारंभ हुआ। विभिन्न गांवों से आए देवी-देवताओं के प्रतीक, सुसज्जित डोलियां, छत्र और पारंपरिक ध्वजों के साथ श्रद्धालुओं ने पूरे मेले स्थल की परिक्रमा की। हर कदम पर आस्था और उत्साह का संगम दिखाई दिया।

मेले में दिखा आदिवासी जीवन शैली का जीवंत दर्पण 
मेला आदिवासी जीवन शैली का जीवंत दर्पण बनकर उभरा है। गोंड, मुरिया सहित विभिन्न जनजातीय समुदायों के पारंपरिक लोकनृत्य, जोशीले गीत और वाद्ययंत्रों की गूंज ने आयोजन को अद्वितीय गरिमा प्रदान की। रंग-बिरंगी वेशभूषा और पारंपरिक आभूषणों से सजे कलाकारों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। स्थानीय हस्तशिल्प, वन उत्पाद, पारंपरिक आभूषण और बस्तर के विशेष व्यंजनों से सजी दुकानों ने मेले को और आकर्षक बना दिया है। यह आयोजन स्थानीय कारीगरों और वनवासियों के लिए आर्थिक सशक्तिकरण का भी महत्वपूर्ण अवसर साबित हो रहा है।

अंदरूनी इलाकों से भी पहुंचे लोग
इस वर्ष मेले का एक विशेष और सकारात्मक पहलू यह है कि, लंबे समय तक नक्सल प्रभाव से प्रभावित रहे अंदरूनी इलाकों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु निर्भय होकर मेले में पहुंच रहे हैं। क्षेत्र में शांति और विश्वास के बढ़ते माहौल ने लोगों को खुलकर अपनी आस्था और संस्कृति से जुड़ने का अवसर दिया है। वर्षों बाद कई गांवों की सामूहिक उपस्थिति ने मेले की भव्यता को नई ऊंचाई दी है। ग्रामीण अंचलों से आए बुजुर्गों का कहना है कि मावली मेला केवल उत्सव नहीं, बल्कि पीढ़ियों को जोड़ने वाली सांस्कृतिक कड़ी है। यह परंपरा समाज को एकसूत्र में बांधने और अपनी जड़ों से जुड़े रहने का संदेश देती है।

प्रशासन ने किए व्यापक इंतजाम
प्रशासन की ओर से सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधा, पेयजल और यातायात की व्यापक व्यवस्था की गई है। आगामी दिनों में श्रद्धालुओं की संख्या और बढ़ने की संभावना है, जिससे यह ऐतिहासिक आयोजन और अधिक विराट स्वरूप लेगा। माता मावली मेला एक बार फिर यह प्रमाणित कर रहा है कि आधुनिकता के इस दौर में भी बस्तर की प्राचीन परंपराएं अडिग हैं—वे जीवित हैं, गतिशील हैं और आस्था, संस्कृति तथा सामुदायिक एकता की अमिट पहचान बनी हुई हैं।

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