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दिल्ली सिग्नेचर ब्रिज / सेल्फी के आगे सबकुछ फीका

दिल्ली में बहुचर्चित सिग्नेचर ब्रिज का उद्घाटन हुआ, घोषित उद्देश्य बताया गया कि इसके जरिये आवागमन होगा। पब्लिक उधर से इधर जाएगी। पर अब देखने में यह आ रहा है कि पब्लिक उधर से आती है तो भी एक की काम कर रही है ब्रिज के सामने टेढ़े एंगल से खड़े होकर सेल्फी लेना। और इधर से आकर भी पब्लिक एक ही काम कर रही है, टेढ़े एंगल से सेल्फी लेना।

दिल्ली सिग्नेचर ब्रिज / सेल्फी के आगे सबकुछ फीका
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दिल्ली में बहुचर्चित सिग्नेचर ब्रिज का उद्घाटन हुआ, घोषित उद्देश्य बताया गया कि इसके जरिये आवागमन होगा। पब्लिक उधर से इधर जाएगी। पर अब देखने में यह आ रहा है कि पब्लिक उधर से आती है तो भी एक की काम कर रही है ब्रिज के सामने टेढ़े एंगल से खड़े होकर सेल्फी लेना। और इधर से आकर भी पब्लिक एक ही काम कर रही है, टेढ़े एंगल से सेल्फी लेना।

पुल गुजरने के लिए नहीं सेल्फी लेने के लिए होता है। आखिर में हर आइटम को सेल्फी के काम ही आना है। कुछ समय पहले एक पुस्तक मेले में जाना हुआ था। वहां अलग से सेल्फी पाइंट बना दिया गया था। जिसका मन हो, आए इधर सेल्फीबाजी मचा दे बाकी लोगों को किताबें पढ़ने दे। पर हुआ यूं कि मैं सेल्फी पाइंट के पास बैठकर किताब पढ़ रहा था कि सेल्फी पाइंट से कई करुण पुकारें उठीं।

प्लीज हमारी फोटू खींच दो इस किताब के साथ। सेल्फी पाइंट के पास कोई पढ़ नहीं सकता, हरेक को सेल्फी यज्ञ में आहुति देनी है। किताबें धन्य हुईं, फोटू खिंच गई। बड़े-बड़े पुलों की मंजिल सेल्फी है, तो छोटी मोटी किताबें क्या बेचती हैं। सबको अंत में सेल्फी में निपटना है। टीवी पर बड़े-बड़े राजनीतिक प्रवक्ता अपने कमरे में बयान देते हैं, तो उनके पीछे अलमारियों में कई किताबें भरी रहती हैं।

तरह-तरह की किताबें बहुत शालीन सौम्य बनाने वाली किताबें, फिर उन्हीं प्रवक्ताओं को टीवी पर गाली-गलौज करते हुए देखता हूं। फिर समझ में आता है कि किताबों का काम सिर्फ फोटूबाजी में है, पढ़ने पढ़ाने का ताल्लुक उनसे उनका नहीं है, जिनके कमरे में वो दिखायी देती हैं। बड़े बड़े नेतागण, प्रवक्तागण किताबों का इस्तेमाल सिर्फ सेल्फीबाजी, फोटूबाजी में कर रहे हैं, तो पुस्तक मेले के आम पाठक पर क्यों नाराज हुआ जाए। जो पुस्तक मेले में सेल्फी पाइंट पर विकट मार मचाए रहता है।

यह तो हमें पता चलता है कि ऊपर जन्नत से आदम और हव्वा को नीचे फेंक दिया गया था पर यह ना पता चलता कि आदम और हव्वा ने नीचे आने के बाद सबसे पहले क्या काम किया था। इधर मैं आश्वस्त हो गया हूं कि जमीन पर आने के बाद उन्होंने सबसे पहला काम यही किया होगा कि मोबाइल के सामने मुंह टेढ़ा करके सेल्फी ठोंकी होगी, परमेश्वर को टैग की होगी, इस मैसेज के साथ, फीलिंग हैप्पी।

सबसे पहले क्या काम करना चाहिए, सेल्फीबाजी और सबसे अंत में भी क्या होना चाहिए, सेल्फीबाजी। शाहजहां ने ताजमहल के पूरा होने पर सबसे पहले क्या किया होगा। ताज के सामने अपनी सेल्फी ली होगी। वह सेल्फी अभी हिंदुस्तान में मिल नहीं रही है, तो उसकी वजह यही है कि कोहिनूर हीरे समेत तमाम कीमती चीजें अब ब्रिटेन में ही हैं। सिग्नेचर ब्रिज से लेकर पुस्तक मेले तक सेल्फी के बगैर कुछ नहीं हो रहा है। बस हर जगह हर कोई सेलफी लेने में इतना मस्त है कि उसे किसी और चीज से कोई मतलब ही नहीं रह गया है।

शमशान घाट में भी जल्दी एक सेल्फी पाइंट होने लगेगा, जहां बंदे सेल्फी खेंचकर फेसबुक पर पोस्ट करेंगे, लुकिंग ग्रेसफुल इन व्हाइट कुरता। छिछोरे खुद को परम ग्रेसफुल साबित करने के लिए हर हाल में प्रतिबद्ध होते हैं। पुल पर सेल्फी लेकर कोई आखिर साबित क्या करना चाहता होगा। शायद यह है कि यह पुल भी नायाब है और हम भी नायाब हैं, एक ही पीस हैं। खुद को नायाब मानना तो हरेक का हक है, पर पुल के साथ सेल्फी को फेसबुक पर पोस्ट करना और उस पर अपने हर मित्र से लाइक और कमेंट की उम्मीद करना मित्र के मानवाधिकारों का हनन ही है।

वह मित्र खुद ही पहले ब्रिज पर हो आया है और अपनी सेल्फी के लाइक गिनने में बिजी है, अपने ब्याह को छोड़कर वह दोस्त की बारात में बैंड बजायेगा, यह उम्मीद मानवाधिकार हनन से कम है क्या। मैंने भी डाली है ब्रिज के साथ सेल्फी, हरेक मित्र मानव बने और लाइक करे और तीन पेज का कमेंट भी दे। वादा रहा, अगर आप ऐसी सेल्फी डालेंगे तो मैं भी ऐसा ही करूंगा।

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