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व्यंग्य : मैगी की घर वापसी

देखो मैगी, मेरा तो शुरू से सर्मथन तुम्हारे पक्ष में ही रहा है।

व्यंग्य : मैगी की घर वापसी
पियारी मैगी, तुम्हें तुम्हारी घर वापसी पर बहुत-बहुत बधाई। आखिर सरकार को तुम्हारी पवित्रता के आगे झुकना ही पड़ा। बैन की अग्नि में तपकर तुम कुंदन बनकर बाहर आई हो। लोगों ने एक दफा फिर से तुम्हारी ओर सम्मान की निगाह से देखना शुरू कर दिया है। न केवल मेरे घर बल्कि पूरे भारत भर के घरों के बच्चे इत्ता खुश हैं, मानो उन्हें जन्नत मिल गई हो। फिर भी, मैं तुम्हारी तकलीफ को समझ सकता हूं। इत्ते दिनों का बैन वो भी इत्ती भद्दी-भद्दी बातों के साथ जो तुमने झेला, उस दर्द को पाटा नहीं जा सकता। एक तरह से हर कोई तुम्हारे विरोध में आनकर खड़ा हो गया था।
जाने-जाने कैसी बातें कही-उड़ाई जा रही थीं तुम्हारे बारे में। तुम्हें खाने से लीवर को खतरा हो सकता है, भाई लोगों ने यह तलक कह डाला था। दुकानों और घरों से तुम्हें ऐसे गायब कर दिया गया था, जैसे गधे के सिर पर से सींग। तुम्हें बनाने में जो टू मिनट्स का क्रेज रहता था, किचन से वो भी गायब हो गया था। बच्चे अलग हंगामा काटे रहते थे, तुम्हें खाने का। उन्हें भी जाने कित्ता समझाया कि अभी मैगी पर बैन है, न बाजार में मिलेगी, न घर में बनेगी पर बच्चे कहां मानने-समझने वाले। उन्होंने तो जैसे जिद्द ही पकड़ ली थी कि मैगी चाहिए ही चाहिए।
फिलहाल, थोड़े दिन तो घर में रखी मैगी से ही काम चलाया मगर जब खत्म हुई तो किचन को सूना कर गई। मगर अब तुम्हारी घर वापसी की खबर से काफी राहत मिली है। महसूस हो रहा है, जैसे किचन की जान और शान पुन: लौट आई हो। हालांकि तुम्हारे अभी बाजार में आने पर कुछ (नियम-शर्तें वाले) पेच बाकी हैं पर यह तसल्ली क्या कम है कि तुम वापस आ रही हो। अक्सर इंतजार का फल मीठा ही होता है।
देखो मैगी, मेरा तो शुरू से सर्मथन तुम्हारे पक्ष में ही रहा है। बताइए, इत्ती पॉपुलर चीज में भी खोट हो सकती है। विश्वास ही नहीं हो पाता था। दुनिया में ऐसी सैकड़ों खाने-पीने की चीजें हैं, जो हमारे शरीर को नुकासन पहुंचा रही हैं मगर उनकी तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता। उन कथित खराब चीजों के खिलाफ कुछ दिन सरकारी अभियान चलता है फिर टांय-टांय फिस्स। दरअसल, हम नकली-मिलावटी चीजें खा-खाकर उनके इत्ता आदी हो चुके हैं कि अब आसानी से कोई खराब चीज हमें नुकसान नहीं पहुंचाती।
एक बार को शुद्ध चीज जरूर नुकसान पहुंचा देगी किंतु नकली या मिलावटी नहीं क्योंकि हमारा शरीर-टेस्ट-पेट उनके मुताबिक ढल चुका है न। यह तो चलो तुम्हारी बात रही। इंसान खुद भीतर से इत्ता कड़वा-जहरीला-मिलावटी हो चुका है कि हर दम किसी न किसी के खिलाफ कुछ न कुछ जहर उगलता ही रहता है। लुत्फ देखो, न किसी सरकार न कोर्ट ने न इंसान पर बैन लगाया न ही उसकी जुबान पर।
मगर तुम पर बैन लगा दिया क्योंकि तुम अपने पक्ष-विपक्ष में कुछ बोल नहीं सकती थीं। तुम गूंगी थीं न। गूंगे पर बैन लगाना इंसानी फितरत है। यह तो पता ही होगा तुम्हें। तुम पर लगे बैन को लेकर राजनीतिक दलों के बीच जो जमकर राजनीति हुई, उसके बारे में क्या बतलाऊं। ऐसा लग रहा था कि हमाम में केवल वे ही इज्जतदार लोग हैं और तुम नंगी। फेसबुक-ट्विटर पर भी तुम्हारे बारे में जाने क्या-क्या और कैसा-कैसा कहा-लिखा गया, तुम्हें क्या मालूम होगा।
चलो। खैर। जाने दो। वक्त-वक्त की बात है। कभी पहाड़ तो कभी ऊंट- दोनों में से कोई भी- एक-दूसरे के नीचे आ ही जाते हैं। फिलहाल तो यह समय खुशियां मनाने का है, तुम्हारी (मैगी) घर वापसी पर। बहुत दिन हुए तुम्हें न खाए हुए, अब खूब छक कर खाऊंगा। और पड़ोसियों को भी खिलाऊंगा। तुम्हारा स्वागत है पियारी मैगी।
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