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कला निरंतर कुछ नया रचने की उत्साह भरी जुम्बिश है

एक सवाल बार- बार सामने आकर खड़ा होता है वह यह कि कलाकार होने के असल मायने क्या हैं।

कला निरंतर कुछ नया रचने की उत्साह भरी जुम्बिश है

अमित कल्ला

एक सवाल बार- बार सामने आकर खड़ा होता है वह यह कि कलाकार होने के असल मायने क्या हैं, बुनियादी तौर पर दुनिया में उसका होना क्या और क्यों हैं । उदाहरण के लिए चित्रकला के सन्दर्भ में अगर हम बात करें तो किसी स्तर पर कोई भी कह सकता है की वह चित्रकार है और पेंटिंग करना उसका काम है, उसके बनाये गए चित्र के द्वारा बड़ी आसानी से उसकी प्रासंगिकता को रेखांकित किया जा सकता है, क्या इन्ही तमाम बातों में एक कलाकार का होना छिपा है या फिर कुछ अन्य सतहें भी है जिन्हें जाँचना परखना बेहद आवश्यक है ।

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मुझे लगता है कि कलाकार होना अपने आपमें बड़ी जिम्मेदारी भरा सबब है, स्वयं एक कलाकार के लिए भी जिसे अपने होने को आधा-अधूरा जानना एक ग़फ़लत है, इस क्रम में प्रसिद्ध जर्मन मनोविज्ञानी गेस्टॉल्ट और उनके बताये प्रत्यक्षीकरण का सूत्र याद आता हैं जहाँ वे "form अथवा personality as whole" का ब्यौरा देते हैं।
सही अर्थों में एक सच्चे कलाकार का समूचा जीवन ही कलामय होता है जहाँ कला में जीवन या फिर जीवन में कला इस जुमले में फर्क कर पाना बहुत मुश्किलों भरा सबब है ।
निश्चित तौर पर किसी भी साधारण इंसान का कला को चुनना ही अपने आप में असाधारण-सा कृत्य है, चाहे उसका ताल्लुख किसी भी विधा अथवा फॉर्म से हो, यह चुनाव ही दर-असल अपने आपमें बड़ी चुनौती है, एक देखी अनदेखी तीखी तड़प को अपने साथ सींचती हुयी चुनौती जहाँ प्रतिपल कुछ नया सृजन करने की आकांशा है, स्थापित लकीरों को मिटाने की चाहत के साथ अंतर्मन की उथलपुथल, जिसकी समाज में स्थापित मूल्यों से टकराहट है, निरंतर कुछ नया रचने की उत्साह भरी जुम्बिश, जिसमे रचना प्रक्रिया के माध्यम से देश और काल सरीखे पैमानों के पार जाने की ताकत है।
अमित कल्ला की फेसबुक वॉल से साभार

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