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नीतीश के सामने इस्तीफे के सिवाय कोई रास्ता नहीं था

लालू यादव ने भी साफ संकेत दे दिए कि तेजस्वी त्यागपत्र नहीं देंगे।

नीतीश के सामने इस्तीफे के सिवाय कोई रास्ता नहीं था

बिहार में आखिरकार वह नौबत आ ही गई, जिसकी आशंका व्यक्त की जा रही थी। नीतीश कुमार और लालू यादव के रास्ते अलग हो गए। नीतीश पिछले बीस-पच्चीस दिन से इसकी बाट जोह रहे थे कि उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव अपने ऊपर लगे गंभीर आरोपों के बाद नैतिकता के उच्च मानदंडों के आलोक में पद से इस्तीफा दे देंगे, परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया।

उनके पिता लालू यादव ने भी साफ संकेत दे दिए कि तेजस्वी त्यागपत्र नहीं देंगे। ऐसे में नीतीश के सामने दो ही रास्ते बचते थे। तेजस्वी को बर्खास्त करें या खुद मुख्यमंत्री का पद त्याग दें। जिस तरह की राजनीति नीतीश करते आए हैं, उसमें दूसरा रास्ता अपनाने की उम्मीद ज्यादा थी। उन्होंने यही रास्ता अख्तियार किया। जब देखा कि जनता और मीडिया के तीखे होते सवालों का सामना नहीं कर पाएंगे, तब उन्होंने राज्यपाल को इस्तीफा सौंप दिया।

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व्यवस्था होने तक पद पर बने रहने का राज्यपाल का अनुरोध महज औपचारिकता है, परन्तु नीतीश के इस फैसले के साथ ही बीस महीने पुराना नीतीश-लालू-कांग्रेस के महागठबंधन का भी अंत हो गया। सवाल है कि यह नौबत आखिर क्यों आई? क्या सुलह का कोई रास्ता बचा था या नहीं। सर्वविदित है कि लालू यादव के दोनों पुत्रों, बेटी मीसा, दामाद शैलेष और पत्नी राबड़ी देवी पर अकूत बेनामी संपत्ति बनाने के गंभीर आरोप लगे हैं।

उनके खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय, आयकर विभाग और सीबीआई की जांच चल रही है। कई दौर की पूछताछ के बाद भी ये लोग यह बताने में विफल रहे हैं कि आखिर इतनी संपत्ति उनके पास आई कहां से है? दिल्ली में कई फार्म हाउस, पटना में सात सौ करोड़ रुपये की लागत से निर्माणाधीन आलीशान मॉल और कई शहरों व जिलों में सैंकड़ों फ्लैट और कृषि भूमि उन दिनों की देन बताए जा रहे हैं, जब लालू यादव डा. मनमोहन सिंह की सरकार में रेलमंत्री थे।

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यानी जिस तरह के लाखों करोड़ के घोटालों में तत्कालीन दूरसंचार मंत्री राजा, सुरेश कलमाड़ी और कोयला खदानों से जुड़े माफियाओं के जरिए कराए जा रहे थे, उसी समय लालू यादव रेलवे के होटलों को लीज पर देने और दूसरे कामों के एवज में बेनामी संपत्ति बनाने में लगे हुए थे। वो सारी कड़ियां धीरे-धीरे जुड़ रही हैं और इस जांच की आंच में लालू यादव भी देर-सवेर झुलसेंगे, यह तय है।

वो बच नहीं सकते। उन्होंने अपना जीवन ही बर्बाद नहीं किया है, पूरे परिवार को घोटालों का हिस्सा बनाकर उनकी जिंदगी भी नर्क करने का रास्ता प्रशस्त कर दिया है। ऊपर से यह हेकड़ी कि बेटा आरोप लगने के बाद भी पद से इस्तीफा नहीं देगा। नीतीश ने एकाधिक बार उनसे कहा भी कि भ्रष्टाचार के आरोपों पर वह बिहार की जनता को सफाई दें परन्तु ऐसा करने के बजाय वह जिद पर अड़े रहे।

नीतीश के लिए संकेत साफ था कि नैतिकता के आधार पर वो त्यागपत्र नहीं देंगे। ऐसे में मुख्यमंत्री के सामने खुद इस्तीफा देने के सिवाय कोई रास्ता बचा नहीं था क्योंकि लालू की राजद के बल पर ही वह मुख्यमंत्री बने थे। सवाल है कि अब आगे क्या होगा। लालू और कांग्रेस मिलकर चाहें भी तो बिहार में सरकार नहीं बना सकते हैं। तो क्या नीतीश फिर भाजपा से हाथ मिलाएंगे और राजग में लौटेंगे? इस संभावना से खुद नीतीश कुमार ने इंकार नहीं किया है।

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बिहार के विकास के नाम पर वह भाजपा के नेतृत्व वाले राजग में लौट सकते हैं। यह भी संभव है कि भाजपा बाहर से उन्हें समर्थन दे। उनकी सरकार में शामिल नहीं हो। क्या होगा, यह आने वाले दिन तय कर देंगे लेकिन नीतीश के फैसले ने लालू के परिवार और उनके राजनीति के तौर तरीकों को कटघरे में जरूर खड़ा कर दिया है।

एक बड़ा सवाल फिर से यह खड़ा हुआ है कि देश में साफ सुथरी और भ्रष्टाचारमुक्त राजनीति की संस्कृति आगे बढ़ेगी या लालू यादव के तौर तरीकों वाली राजनीति का बोलबाला रहेगा। फिलहाल तो लालू का परिवार ही संकट में नजर आ रहा है।

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