Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh
Breaking

चिंतन: यूएस, रूस के बाद स्पेस में अब भारत बड़ी ताकत

खास बात यह है कि 20 में से 17 विदेशी उपग्रह हैं।

चिंतन: यूएस, रूस के बाद स्पेस में अब भारत बड़ी ताकत
नई दिल्ली. एक समय था जब अमेरिका भारत को स्पेस, मिसाइल समेत किसी भी प्रकार की एडवांस तकनीक नहीं देता था और दूसरे देशों को भी नहीं देने देता था। रूस जब भारत को क्रायोजेनिक ईंधन तकनीक देना चाहता था, तो यूएस ने नहीं देने दिया। आगे चलकर भारत ने अपने दम पर स्पेस, मिसाइल क्षेत्र में कामयाबी के झंडे गाड़े और खुद क्रायोजेनिक ईंधन तकनीक भी विकसित की। आज देखा जाए तो कठोर अमेरिकी रुख ने भारत को लाभ ही पहुंचाया। हम स्पेस, मिसाइल साइंस समेत विज्ञान व तकनीक क्षेत्र में आत्मनिर्भर होते जा रहे हैं। आज भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने सिंगल मिशन में एक साथ 20 सेटेलाइट लांच कर स्पेस साइंस में नासा की बदशाहत को लगभग समाप्त कर दिया है। यूएस, रूस के बाद अब भारत स्पेस में तीसरी बड़ी ताकत बन गया है। खास बात यह है कि 20 में से 17 विदेशी सेटेलाइट हैं, 13 अमेरिका के और चार कनाडा, र्जमनी, इंडोनेशिया के हैं। हैं।
तीन भारत के हैं। इस लांच का सबसे प्रमुख उपग्रह 727 किलोग्राम वजन का पृथ्वी की निगरानी करने वाला भारतीय काटरेसेट है, जो सब-मीटर रिसॉल्यूशन में तस्वीरें खींच सकता है। अमेरिकी उपग्रहों में गूगल के मालिकाना हक वाली कंपनी टेरा बेला द्वारा बनाया गया पृथ्वी की तस्वीरें खींचने वाला उपग्रह भी शामिल है। इसरो की कामयाबी केवल तकनीक की ही नहीं है, बल्कि लागत में भी है। दुनिया की सेटेलाइट लॉन्चिंग एजेंसियों के मुकाबले इसरो की लॉन्चिंग 10 गुना सस्ती है। वैसे तो दुनिया की सबसे कम लागत वाले भारत के मंगल मिशन '˜मंगलयान' ने ही सभी विकसित देशों के स्पेस मिशन के सामने उदाहरण पेश कर दिया था। इस बार पोलर सेटेलाइट लॉन्च व्हीकल (पीएसएलवी) ने 20 सेटेलाइट को अंतरिक्ष में भेजने के साथ 28 अप्रैल 2008 के अपने ही उस रिकॉर्ड को तोड़ दिया है जब उसने एक साथ 10 उपग्रहों को कक्षाओं में स्थापित किया था।
पीएसएलवी का यह लगातार पैंतीसवां सफल मिशन है। हालांकि, सिंगल मिशन में अमेरिका ने 2013 में 29 और रूस ने 2014 में एक साथ 33 सेटेलाइट स्पेस में भेजे थे। इसरो अब तक लगभग 20 अलग-अलग देशों के 57 उपग्रहों को लांच कर चुका है। इस लांचिंग के साथ ही ग्लोबल सेटेलाइट मार्केट में भारत की हिस्सेदारी बढ़ रही है। अभी यह इंडस्ट्री 13 लाख करोड़ रुपये की है। इसमें अमेरिका की हिस्सेदारी 41 फीसदी की है, जबकि अभी भारत की हिस्सेदारी 4 फीसदी से भी कम है। अब यह हिस्सेदारी तेजी से बढ़ेगी। इसरो सेटेलाइट लॉन्चिंग से अब तक 660 करोड़ रुपये की कमाई कर चुका है। इसरो की यह कामयाबी एक दिन की नहीं है। इस संस्थान ने 1969 में स्थापना से अब तक कई उतार-चढ़ाव को देखे हैं।
1972 में अंतरिक्ष आयोग और अंतरिक्ष विभाग के गठन से अंतरिक्ष शोध गतिविधियों में गति आई। इसरो को अंतरिक्ष विभाग के नियंत्रण में रखा गया। भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के इतिहास में 70 का दशक प्रयोगात्मक युग था, जिस दौरान आर्यभट्ट, भास्कर, रोहिणी तथा एप्पल जैसे प्रयोगात्मक उपग्रह कार्यक्रम चलाए गए। उस समय कई बार इसरो ने असफलता भी देखी, तब काफी आलोचना होती थी। इन कार्यक्रमों की सफलता के बाद 80 का दशक संचालनात्मक युग बना, उस समय इन्सेट तथा आईआरएस जैसे उपग्रह कार्यक्रम शुरू हुए। आज इन्सेट तथा आईआरएस इसरो के प्रमुख कार्यक्रम हैं। इसरो को इस बुलंदियों तक पहुंचाने में पहले अध्यक्ष डा. विक्रम साराभाई, डा. सतीश धवन, प्रो. यू आर राव, डा. के कस्तूरीरंगन और वर्तमान अध्यक्ष डा. जी माधवन नायर जैसे सर्मपित वैज्ञानिकों का अहम योगदान है। 1993 के बाद से इसरो का मिशन कभी विफल नहीं हुआ है। उम्मीद है इसरो आने वाले वक्त में स्पेस लांचिंग में विश्व का सबसे पसंदीदा संस्थान बन कर उभरेगा।
खबरों की अपडेट पाने के लिए लाइक करें हमारे इस फेसबुक पेज को फेसबुक हरिभूमि, हमें फॉलोकरें ट्विटर और पिंटरेस्‍ट पर-
Next Story
Top