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सुशील राजेश का लेख: विकास दर का गलत अनुमान

अं तरराष्ट्रीय आर्थिक एजेंसी मूडीज का आकलन है कि वित्त वर्ष 2020-21 के दौरान भारत की आर्थिक विकास दर शून्य होगी। कुछ हद तक यही इस समय का यथार्थ है, क्योंकि लगभग पूरा देश लाॅकडाउन के कारण बंद रहा है और औद्योगिक उत्पादन पर भी असर पड़ा है। लेकिन उद्योगों का एक वर्ग सक्रिय भी रहा है और जीडीपी में उनकी हिस्सेदारी भी महत्वपूर्ण है। बहरहाल इसी दौरान संयुक्त राष्ट्र ने भविष्यवाणी की है कि कोरोना वायरस के कारण वैश्विक भुखमरी के हालात बनेंगे और करीब 3 करोड़ लोग भूख से मारे जा सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष का आकलन है कि कोरोना के कारण ही दुनिया के ज्यादातर देशों में महामंदी पैदा होगी। ब्रिटेन जैसे देश को 300 सालों में सबसे बुरा दौर देखना पड़ सकता है। जिन देशों के पास विपुल धन की पुरानी जमा-पूंजी है, वे अपना अस्तित्व बचाए रख सकते हैं। शेष औसत देशों को मुश्किल होगी, लिहाजा आईएमएफ उस दौर के लिए विशेष कोष बनाने पर विचार कर रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन वैश्विक महामारी के फलितार्थ को लगातार गिनाता रहा है। इस तरह तीन वैश्विक महासंकटों की संभावनाओं के बीच भारत की विकास दर का आकलन भी सामने आया है। गौरतलब यह है कि किसी अन्य अंतरराष्ट्रीय आर्थिक एजेंसी का ऐसा आकलन और विश्लेषण अभी तक सार्वजनिक नहीं हुआ है। मात्र एक एजेंसी का आकलन अर्द्धसत्य भी हो सकता है। बेशक लाॅकडाउन से उद्योग जगत्ा और आर्थिक गतिविधियां अवरुद्ध हुई हैं, उत्पादन के साथ-साथ रोज़गार पर भी ढक्कन लगे हैं। सड़कों पर पैदल चलते मजदूरों की तस्वीर ही संपूर्ण नहीं है, बल्कि एकांगी है। यह बिहार और उप्र के कामगारों का पुराना मनोविज्ञान भी रहा है कि घर, गांव लौटना है। फिर भी भारत के बारे में मोटा आकलन बताया जा रहा है कि अभी तक के लाॅकडाउन में 15-20 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है। हमारे देश का जीडीपी करीब 215 लाख करोड़ रुपये का है और विदेशी निवेश अलग है। भारत करीब तीन ट्रिलियन डाॅलर की अर्थव्यवस्था है, जो कमोबेश 50 दिन के लाॅकडाउन में ही ढह नहीं सकती। सिर्फ लाॅकडाउन के दौर के आधार पर ही विकास दर का आकलन नहीं किया जा सकता। इस बार गेहूं, चावल, दलहन की बंपर फसलें हुई हैं। कमोबेश भारत भूख से नहीं मर सकता और न ही कभी ऐसे हालात बने। हालांकि खाद्यान्न संकट के दौर जरूर आए हैं। लाॅकडाउन के दौरान ही दवा उद्योग पहले से ज्यादा व्यस्त रहा है और उत्पादन जारी रहा है। टाटा, रिलायंस, मारुति, महिन्द्रा, वेदांता से लेकर भेल, गेल, सेल आदि सार्वजनिक कंपनियां काम करती रही हैं। बेशक आॅटो के स्थान पर पीपीई किट्स, वेंटिलेटर, मास्क आदि बनाए जा रहे हैं। इस श्रेणी में डीआरडीओ भी शामिल है। सूक्ष्म, लघु, मध्यम उद्यमों पर संकटकाल है, लेकिन उनका पटाक्षेप नहीं हुआ है। भारत सरकार शीघ्र ही उनके लिए पैकेज की घोषणा कर सकती है। इसके अलावा, हमारा आईटी क्षेत्र कार्यरत रहा है। घर से कार्य करने की नई संस्कृति परिभाषित हुई है, जिसे सरकार भविष्य के लिए लागू कर सकती है। निर्माण क्षेत्र में सड़कें गांव और राजमार्ग के स्तर पर बन रही हैं और संबद्ध मंत्रालय ने 15 लाख करोड़ रुपये का बजट भी तय किया है। कोयला, सीमेंट, इस्पात, ऊर्जा सरीखे कोर सेक्टर में भी उत्पादन सक्रिय रहा है। बेशक मात्रा और क्षमता कम हो सकती है। देश में खनन कार्य भी जारी हैं, लाखों ईंट-भट्ठे भी काम कर रहे हैं। जाहिर है कि इन कार्यों में लाखों मजदूर भी लगे होंगे। सरकार मनरेगा के तहत करोड़ों रुपये के काम उपलब्ध करवा रही है। इसके अलावा विमान, रेल, मेट्रो और बसों पर रोक लगने से अर्थव्यवस्था पर बहुत प्रभाव पड़ा है। देश में 1500-1600 शाॅपिंग माॅल्स पर तालाबंदी है। उनके कारण बैंकों पर 50-60 करोड़ रुपये के एनपीए का बोझ पड़ सकता है और करीब 1.25 करोड़ लोगों की नौकरियों पर संकट आ सकता है। माॅल्स के साथ ही सिनेमा, होटल, रेस्तरां, पब, क्लब, फिल्म निर्माण आदि क्षेत्रों को शर्तों के साथ खोल दिया जाता है तो अर्थव्यवस्था तुरंत करवट ले सकती है। अधिकतर राज्यों ने शराब की बिक्री शुरू कर दी है। इसकी कमाई ही 2.5 लाख करोड़ रुपये सालाना होगी। देश में उत्पादन, निर्माण और अन्य गतिविधियों से राजस्व पैदा होगा, जो जीडीपी का आकार तय करेगा। लिहाजा बिल्कुल शून्य विकास दर किन आधारों पर हो सकती है। माना जा सकता है कि दर 1.5 या 2 फीसदी हो सकती है। उसके बाद लाॅकडाउन समापन होने पर आर्थिक गतिविधियां पुरानी शक्ल में आ सकती हैं अथवा उनसे भी बड़ी हो सकती हैं।

सुशील राजेश का लेख: विकास दर का गलत अनुमान

अं तरराष्ट्रीय आर्थिक एजेंसी मूडीज का आकलन है कि वित्त वर्ष 2020-21 के दौरान भारत की आर्थिक विकास दर शून्य होगी। कुछ हद तक यही इस समय का यथार्थ है, क्योंकि लगभग पूरा देश लाॅकडाउन के कारण बंद रहा है और औद्योगिक उत्पादन पर भी असर पड़ा है। लेकिन उद्योगों का एक वर्ग सक्रिय भी रहा है और जीडीपी में उनकी हिस्सेदारी भी महत्वपूर्ण है। बहरहाल इसी दौरान संयुक्त राष्ट्र ने भविष्यवाणी की है कि कोरोना वायरस के कारण वैश्विक भुखमरी के हालात बनेंगे और करीब 3 करोड़ लोग भूख से मारे जा सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष का आकलन है कि कोरोना के कारण ही दुनिया के ज्यादातर देशों में महामंदी पैदा होगी। ब्रिटेन जैसे देश को 300 सालों में सबसे बुरा दौर देखना पड़ सकता है। जिन देशों के पास विपुल धन की पुरानी जमा-पूंजी है, वे अपना अस्तित्व बचाए रख सकते हैं। शेष औसत देशों को मुश्किल होगी, लिहाजा आईएमएफ उस दौर के लिए विशेष कोष बनाने पर विचार कर रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन वैश्विक महामारी के फलितार्थ को लगातार गिनाता रहा है। इस तरह तीन वैश्विक महासंकटों की संभावनाओं के बीच भारत की विकास दर का आकलन भी सामने आया है।

गौरतलब यह है कि किसी अन्य अंतरराष्ट्रीय आर्थिक एजेंसी का ऐसा आकलन और विश्लेषण अभी तक सार्वजनिक नहीं हुआ है। मात्र एक एजेंसी का आकलन अर्द्धसत्य भी हो सकता है। बेशक लाॅकडाउन से उद्योग जगत्ा और आर्थिक गतिविधियां अवरुद्ध हुई हैं, उत्पादन के साथ-साथ रोज़गार पर भी ढक्कन लगे हैं। सड़कों पर पैदल चलते मजदूरों की तस्वीर ही संपूर्ण नहीं है, बल्कि एकांगी है। यह बिहार और उप्र के कामगारों का पुराना मनोविज्ञान भी रहा है कि घर, गांव लौटना है। फिर भी भारत के बारे में मोटा आकलन बताया जा रहा है कि अभी तक के लाॅकडाउन में 15-20 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है। हमारे देश का जीडीपी करीब 215 लाख करोड़ रुपये का है और विदेशी निवेश अलग है। भारत करीब तीन ट्रिलियन डाॅलर की अर्थव्यवस्था है, जो कमोबेश 50 दिन के लाॅकडाउन में ही ढह नहीं सकती। सिर्फ लाॅकडाउन के दौर के आधार पर ही विकास दर का आकलन नहीं किया जा सकता। इस बार गेहूं, चावल, दलहन की बंपर फसलें हुई हैं। कमोबेश भारत भूख से नहीं मर सकता और न ही कभी ऐसे हालात बने। हालांकि खाद्यान्न संकट के दौर जरूर आए हैं। लाॅकडाउन के दौरान ही दवा उद्योग पहले से ज्यादा व्यस्त रहा है और उत्पादन जारी रहा है। टाटा, रिलायंस, मारुति, महिन्द्रा, वेदांता से लेकर भेल, गेल, सेल आदि सार्वजनिक कंपनियां काम करती रही हैं। बेशक आॅटो के स्थान पर पीपीई किट्स, वेंटिलेटर, मास्क आदि बनाए जा रहे हैं। इस श्रेणी में डीआरडीओ भी शामिल है।

सूक्ष्म, लघु, मध्यम उद्यमों पर संकटकाल है, लेकिन उनका पटाक्षेप नहीं हुआ है। भारत सरकार शीघ्र ही उनके लिए पैकेज की घोषणा कर सकती है। इसके अलावा, हमारा आईटी क्षेत्र कार्यरत रहा है। घर से कार्य करने की नई संस्कृति परिभाषित हुई है, जिसे सरकार भविष्य के लिए लागू कर सकती है। निर्माण क्षेत्र में सड़कें गांव और राजमार्ग के स्तर पर बन रही हैं और संबद्ध मंत्रालय ने 15 लाख करोड़ रुपये का बजट भी तय किया है। कोयला, सीमेंट, इस्पात, ऊर्जा सरीखे कोर सेक्टर में भी उत्पादन सक्रिय रहा है। बेशक मात्रा और क्षमता कम हो सकती है। देश में खनन कार्य भी जारी हैं, लाखों ईंट-भट्ठे भी काम कर रहे हैं।

जाहिर है कि इन कार्यों में लाखों मजदूर भी लगे होंगे। सरकार मनरेगा के तहत करोड़ों रुपये के काम उपलब्ध करवा रही है। इसके अलावा विमान, रेल, मेट्रो और बसों पर रोक लगने से अर्थव्यवस्था पर बहुत प्रभाव पड़ा है। देश में 1500-1600 शाॅपिंग माॅल्स पर तालाबंदी है। उनके कारण बैंकों पर 50-60 करोड़ रुपये के एनपीए का बोझ पड़ सकता है और करीब 1.25 करोड़ लोगों की नौकरियों पर संकट आ सकता है। माॅल्स के साथ ही सिनेमा, होटल, रेस्तरां, पब, क्लब, फिल्म निर्माण आदि क्षेत्रों को शर्तों के साथ खोल दिया जाता है तो अर्थव्यवस्था तुरंत करवट ले सकती है। अधिकतर राज्यों ने शराब की बिक्री शुरू कर दी है। इसकी कमाई ही 2.5 लाख करोड़ रुपये सालाना होगी। देश में उत्पादन, निर्माण और अन्य गतिविधियों से राजस्व पैदा होगा, जो जीडीपी का आकार तय करेगा। लिहाजा बिल्कुल शून्य विकास दर किन आधारों पर हो सकती है। माना जा सकता है कि दर 1.5 या 2 फीसदी हो सकती है। उसके बाद लाॅकडाउन समापन होने पर आर्थिक गतिविधियां पुरानी शक्ल में आ सकती हैं अथवा उनसे भी बड़ी हो सकती हैं।

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