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जी-20 शिखर सम्मेलन 2022 / भारत और चीन के संबंध पर दुनिया की रहेगी नजर

जी-20 दुनिया के सकल वैश्विक उत्पाद जीडब्ल्यूपी का 85 फीसदी, विश्व व्यापार का 80 फीसदी और विश्व जनसंख्या का 75 फीसदी हिस्सा रखने वाला संगठन है।

जी-20 शिखर सम्मेलन 2022 / भारत और चीन के संबंध पर दुनिया की रहेगी नजर

यक़ीनन 30 नवंबर एवं एक दिसम्बर को अर्जेंटिना की राजधानी ब्यूनस आयर्स में आयोजित जी-20 शिखर सम्मेलन की ओर पूरी दुनिया की निगाहें लगी हुई थी। इस सम्मेलन में बढ़ते संरक्षणवाद से बचने, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, वित्त को सरल करने, आर्थिक अपराधों की रोकथाम तथा उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों की चिंताओं को कम करने के मद्देनजर एकमत से ऐतिहासिक सकारात्मक निर्णय लिए गए।

सम्मेलन का सबसे चमकीला पक्ष यह रहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प सहित जी-20 के सभी राष्ट्र प्रमुख विश्व व्यापार संगठन में सुधार के लिए सहमत हो गए। इसी के साथ अब अमेरिका और चीन के बीच चल रहे ट्रेड वॉर के रुकने की उम्मीद बढ़ गई है। अमेरिका और चीन ने एक जनवरी के बाद नए शुल्क नहीं लगाने पर सहमति जताई है।

गौरतलब है कि जी-20 का गठन वर्ष 1999 में हुआ था। जी-20 में अमेरिका, कनाड़ा, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, इटली, जर्मनी, अर्जेन्टीना, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, भारत, इंडोनेशिया, मैक्सिको, रूस, चीन, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण कोरिया, टर्की और यूरोपीय संघ शामिल हैं। इस संगठन का लक्ष्य दुनिया के विकसित और विकासशील देशों को एक मंच पर लाना और आर्थिक मुद्दों पर एक राय बनाने की कोशिश करना है।

जी-20 दुनिया के सकल वैश्विक उत्पाद जीडब्ल्यूपी का 85 फीसदी, विश्व व्यापार का 80 फीसदी और विश्व जनसंख्या का 75 फीसदी हिस्सा रखने वाला संगठन है। इस सगंठन के बनने के कई वर्षों तक आमतौर पर जी। 20 को प्रभावशाली देशों के निष्क्रिय संगठन के रूप में ही जाना जाता रहा है। लेकिन वर्ष 2008 में वैश्विक अर्थव्यवस्था के भारी मंदी के संकट में फंस जाने के बाद जी-20 एकाएक उठ खड़ा हुआ।

दुनिया को वैश्विक मंदी से बाहर निकालने में जी-20 ने अहम भूमिका निभाई। निश्चित रूप से आर्थिक रूप से कठिन वैश्विक परिस्थिति में जी-20 का यह सम्मेलन भारत के लिए लाभप्रद रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सम्मेलन से इतर जी-20 सदस्य देशों के साथ भारत के आर्थिक व सामरिक संबंधों को और मजबूत करने की डगर पर आगे बढ़े।

सम्मेलन शुरू होने से पहले मोदी ने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंतोनियो गुतारेस से मुलाकात की। मोदी और मोहम्मद बिन सलमान के बीच मुलाकात के दौरान सऊदी अरब का भारत में ऊर्जा, आधारभूत संरचना और रक्षा क्षेत्रों में निवेश बढ़ाने के लिए नेतृत्व के स्तर पर एक प्रणाली स्थापित किए जाने का फैसला लिया गया।

दोनों नेताओं ने आर्थिक, सांस्कृतिक और ऊर्जा संबंधों को आगे बढ़ाने पर भी चर्चा की। भारत को बुनियादी ढांचे में एक हजार अरब रुपये के नए निवेश की जरूरत है और सऊदी अरब भारत में इन्फ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में ही निवेश का इच्छुक है। भारत अपनी जरूरत का 19 प्रतिशत कच्चा तेल सऊदी अरब से खरीदता है।

भारत चाहता है कि ओपेक का सदस्य होने के नाते सऊदी अरब कच्चे तेल के दाम को स्थिर रखने के लिए मैकेनिज्म बनाने में मदद करे। सऊदी अरब ने भारत को भरोसा दिया है कि कच्चे तेल की किल्लत नहीं होने दी जाएगी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे के साथ नरेंद्र मोदी ने अपनी पहली त्रिपक्षीय बैठक की।

रणनीतिक महत्व के हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के अपनी शक्ति प्रदर्शित करने के मद्देनजर यह बैठक काफी मायने रखती है। यह महत्वपूर्ण है कि मोदी ने शिखर सम्मेलन में विजय माल्या और नीरव मोदी जैसे भगोड़े आर्थिक अपराधियों से निपटने के लिए जी-20 के सदस्य देशों के बीच मजबूत एवं सक्रिय सहयोग के आह्वान के साथ इस उद्देश्य से एक नौ सूत्रीय एजेंडा पेश किया।

भारत ने सुझाव दिया है कि बहुपक्षीय वित्तीय कार्रवाई कार्य बल से कहा जाए कि वह प्राथमिकता से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तालमेल की ऐसी व्यवस्था बनाए जिसके तहत संबंधित देशों के समक्ष विभागों के बीच सूचनाओं का विस्तृत आदान-प्रदान समय से हो सके। भारत ने कहा कि एफएटीएफ को भगोड़े आर्थिक अपराधियों की मानक परिभाषा तय करने का काम दिया जाना चाहिए।

भारत ने कहा कि जी-20 को भगोड़े आर्थिक अपराधियों की संपत्तियों की पहचान की दिशा में कार्य शुरू करने पर भी विचार करना चाहिए ताकि उनके ऊपर उस देश में बकाया की वसूली की जा सके, जिसके वे निवासी हों। हालांकि जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान सभी सदस्य देशों द्वारा यह कहा गया कि वे संरक्षणवाद की नीतियों को नहीं अपनाएंगे तथा वैश्विक आर्थिक एकीकरण के लिए आगे बढ़ेंगे,

लेकिन इसका क्रियान्वयन सरल दिखाई नहीं दे रहा है। जी-20 के कई सदस्य देश आपसी कारोबार के लिए बाधाओं की ऊंची दीवारें खड़ी करने में लगे हुए हैं। चीन और अमेरिका के बीच ट्रेड वॉर फिलहाल जोरों पर है। जर्मनी और यूरोपियन यूनियन से अमेरिका के तनावपूर्ण रिश्तों की कडवाहट स्पष्ट दिखाई दे रही है। ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध लागू हैं।

अमेरिका व रूस के बीच तनातनी बनी हुई है। इसमें कोई दोमत नहीं है कि जी-20 के तहत विकसित देशों की तुलना में उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों का काफी कुछ दांव पर लगा हुआ है। निश्चित रूप से अब उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों के पास एक अवसर है कि वे अपनी प्राथमिकताओं पर ध्यान केंद्रित करें और उन्हें लेकर अधिक आक्रामक अंदाज में काम करें।

जी-20 को संतुलित वैश्विक वृद्धि के लक्ष्य को भी ध्यान में रखकर काम करना होगा। इसके लिए तमाम अन्य चीजों के साथ चीन और भारत के बीच बढ़े हुए सहयोग और संवाद की आवश्यकता होगी ताकि इन दोनों देशों की आर्थिक शक्ति से वैश्विक चुनौतियों से निपटा जा सके। जी-20 देशों के तहत प्रक्रिया में भी सुधार की आवश्यकता है ताकि संसाधनों की खपत और आर्थिक प्रभाव के बीच बेहतर तालमेल कायम किया जा सके।

निश्चित रूप से अर्जेंटीना में आयोजित जी-20 शिखर सम्मेलन में वैश्विक व्यापार में वृद्धि, डब्ल्यूटीओ में सुधार, अंतरराष्ट्रीय वित्त में सरलता और वैश्विक आर्थिक अपराधों पर नियंत्रण हेतु जो अहम सहमतियां बनी हैं उनसे दुनिया जवाबदेह वैश्वीकरण की डगर पर आगे बढ़ेगी।

लेकिन जी-20 के ऊंचे और महत्वाकांक्षी निर्णयों के बाद विकास एवं वैश्विक व्यापार की डगर पर आगे बढ़ने के लिए जी-20 देशों को एकजुट और दृढ़ संकल्पित होकर दुनिया को विभाजित कर रही आर्थिक रेखाओं को मिटाकर खुली वैश्विक अर्थव्यवस्था की राह पर आगे बढ़ना होगा।

आशा करें कि जब 2022 में हमारी स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर जी-20 का शिखर सम्मेलन भारत में होगा तो यह हमारे लिए वैश्विक अहमियत बढ़ाने का एक बड़ा अवसर होगा। हम आशा करें कि हमारे प्रयासों से जी-20 संगठन अधिक वैश्विक आर्थिक आशाओं वाले जवाबदेह संगठन के रूप में दिखाई देगा।

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