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आलोक जोशी का लेख : संतुलन का तरीका खोजना होगा

सरकार ने ट्विटर को या दूसरे प्लेटफॉर्म्स को जो नोटिस या चेतावनी दी है उसमें यही लिखा है कि आईटी एक्ट की धारा सत्तावन के तहत उन्हें जो संरक्षण मिला हुआ है वो हटा लिया जाएगा। यह संरक्षण क्या है? वो यह है कि सोशल मीडिया पर लगी किसी पोस्ट के लिए इन प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ मुकदमे चलाने या इनके अधिकारियों को गिरफ्तार करने या उन्हें सजा देने जैसी कार्रवाई नहीं हो सकती हैं, क्योंकि यह तो केवल संदेशवाहक हैं। लेकिन बुनियादी सवाल यही है कि अभिव्यक्ति का अधिकार भी बचा रहे और अभिव्यक्ति के नाम पर मनमानी भी न होने लगे यह संतुलन बनाने का क्या तरीका निकाला जा सकता है।

आलोक जोशी का लेख : संतुलन का तरीका खोजना होगा
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आलोक जोशी

आलोक जोशी

देश टीकों के लिए तरस रहा है और भाजपा ब्लू टिक के लिए' कांग्रेस पार्टी ने मौका पाते ही बीजेपी पर यह फब्ती कस दी। मज़े की बात यह है कि यह कहने के लिए भी उसने वही ट्विटर चुना जिसके चक्कर में बवाल चल रहा है। ताज़ा बवाल तो यह है कि पहले उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू, फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत के ट्विटर हैंडल से ब्लू टिक गायब हो गए और फिर लोगों ने लिस्ट निकालकर बताना शुरू किया कि भारत में कितने बड़े-बड़े लोगों के ट्विटर हैंडल से ब्लू टिक यानी वेरिफाइड का निशान गायब हो गया है। ज्यादातर सरकार समर्थक थे या संघ के पदाधिकारी।

हालांकि उप राष्ट्रपति के पर्सनल हैंडल और मोहन भागवत के ब्लू टिक वापस भी आ गए हैं, लेकिन फिर भी यह विवाद जारी है कि आखिर ट्विटर ने ऐसी हिमाकत की कैसे। ट्विटर की तरफ से और उसके पैरोकारों की तरफ से तर्क दिया गया है कि वेरिफिकेशन के हिसाब-किताब की ही जांच चल रही है और जिन हैंडलों के ब्लू टिक हटे हैं उन पर लंबे समय से कोई ट्वीट या कोई और हरकत ही नहीं हुई थी, इसलिए इन्हें निष्िक्रय मानकर वेरिफाइड या अनुमोदित श्रेणी से बाहर कर दिया गया, लेकिन बात इतने पर खत्म न होनी थी न हुई। लेकिन उस पर आने से पहले समझना ज़रूरी है कि आखिर ट्विटर और सरकार के बीच चल क्या रहा है। शनिवार को सरकार की तरफ से ट्विटर को खत भेजकर 'एक आखिरी नोटिस' दिया गया है। नोटिस में कहा गया है कि आईटी एक्ट के हिसाब से नोडल अधिकारी की नियुक्ति समेत जो भी ज़रूरी कदम उठाए जाने हैं वो ज़रूरतें तत्काल पूरे किए जाएं। ऐसा न होने पर ट्विटर को आईटी एक्ट और दूसरे दंड विधानों के तहत परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए।

बात सिर्फ ट्विटर की नहीं है। आईटी एक्ट या सूचना तकनीक अधिनियम के तहत सरकार ने गूगल, फेसबुक, ट्विटर और डिजिटल मीडिया पर सक्रिय तमाम व्यक्तियों और संगठनों के लिए कुछ नए नियम कायदों का पालन ज़रूरी कर दिया है। आरोप है कि यह मुख्य रूप से डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया पर सरकार की आलोचना करने वालों की जुबान बंद करने की कोशिश है। यह आरोप बेबुनियाद नहीं है। यह साबित करने का काम सरकार के मंत्री, अफसर और सत्तासीन पार्टी के नेता, प्रवक्ता वगैरह खुद ही करते रहते हैं। कुछ समय पहले जब सुदर्शन टीवी के एक भड़काऊ कार्यक्रम के मामले में अदालत ने केंद्र सरकार से टीवी मीडिया के बारे में सवाल पूछा तो जवाब में सूचना प्रसारण मंत्रालय ने कहा कि टीवी मीडिया से कहीं ज्यादा ज़रूरी तो डिजिटल मीडिया पर नियंत्रण या रेगुलेशन करना है। चुनावों के दौरान फेसबुक का इस्तेमाल जिस तरह से सत्तारूढ़ दल के एजेंडा को बढ़ाने और विपक्ष या विरोध की आवाजों को दबाने के लिए हुआ उस पर काफी कुछ कहा और लिखा जा चुका है।

दूसरे प्लेटफॉर्मों पर भी यही माहौल बनाने की कोशिश नहीं हुई होगी यह मानना मुश्किल है। जो ट्विटर आज सरकार के सामने खड़ा नज़र आ रहा है, वही ट्विटर है जिस पर अपने फॉलोअर्स या अनुयायियों की गिनती दिखाकर सभी पार्टियों के लोग झंडे गाड़ा करते थे, लेकिन समस्या इस बात से पैदा हो गई है कि ट्विटर, फेसबुक और यूट्यूब जैसे करीब सभी प्लेटफॉर्म्स पर जहां एक समय संघ और भाजपा के समर्थकों का दबदबा था अब वहां इनकी पकड़ काफी कमजोर पड़ती दिख रही है। देर से ही सही, दूसरी पार्टियों ने भी समझ लिया है कि इस आभासी दुनिया की लड़ाई अगर ज़मीन की लड़ाई से कम ज़रूरी भी नहीं है। और ऐसे लोग तो हैं ही जो किसी पार्टी के समर्थक या विरोधी नहीं हैं। वक्त के साथ तमाम मुद्दों पर यह दिख चुका है कि सरकारी पार्टी अगर कोई प्रचार करने निकलती है तो विरोधी मुकाबले में उससे तगड़े साबित हो जाते हैं। प्रधानमंत्री के वीडियो पर ही लाइक से ज्यादा डिसलाइक मिलने लगे तब यह समस्या गहराती हुई दिखी। फिर तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया से जिन लोगों को अनेक कारणों से अलग होना पड़ा, उनमें ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्होंने अभिव्यक्ति के लिए अपनी वेबसाइट बना लीं, अपना यू ट्यूब चैनल चलाने लगे जहां उन्हें खुलकर बोलने का मौका मिल जाता है। ऐसा भी नहीं है कि बीजेपी या हिंदुत्व की विचारधारा के लोग यह नहीं कर रहे हैं। दोनों ही तरह की विचारधाराओं की भरमार है। ऐसे में निष्पक्ष लोग खुद को कुछ ठगा हुआ ज़रूर पाते हैं, लेकिन इस चक्कर में अभिव्यक्ति पर लगाम कसने की मांग तो नहीं की जा सकती। इसी वजह से तमाम पत्रकार और पत्रकार संगठन कानून में बदलाव का पुरजोर विरोध कर रहे हैं। शिकायत यह है कि अभिव्यक्ति के काम में लगे लोगों के रास्ते में इतनी बड़ी रुकावटें खड़ी करने से पहले सरकार ने इस विषय पर विचार-विमर्श का काम भी ठीक से नहीं किया। अगर सरकार को लगता है कि मीडिया के इस स्वरूप में गंभीर समस्याएं हैं तो उसे सबसे पहले तो यह सवाल इस मीडिया के सामने ही रखकर जवाब मांगना चाहिए था। चर्चा के बाद शायद कोई बेहतर स्वरूप तय होता। अखबारों के लिए प्रेस काउंसिल और टीवी के लिए एनबीएसए जैसी संस्थाएं हैं तो वैसा ही कुछ डिजिटल मीडिया के लिए क्यों नहीं हो सकता, लेकिन यह हुआ नहीं। शायद सरकार ऐसा करना नहीं चाहती थी। घटनाक्रम तो यही दिखाता है कि सरकार, बल्कि सरकारें, अपने विरोध में आने वाली आवाजों को दबाने का तरीका तलाश रही हैं। कार्टूनिस्ट मंजुल के मामले में सरकार की तरफ से ट्विटर को भेजे गए संदेश का स्पष्ट अर्थ यही है कि ऐसा कुछ भी सरकार देखना नहीं चाहती है जो किसी भी तरह से उसकी आलोचना करता दिखाई दे और इसका अर्थ यह भी है कि सरकार को यह बात भी समझ में आ रही है कि देश भर में फैले हज़ारों लाखों लोगों को अलग अलग पकड़कर उनकी जुबान काबू में करने से ज्यादा आसान है कि उन प्लेटफॉर्म्स की ही लगाम कस दी जाए जिनके जरिए इतने सारे लोग अचानक अपना अपना मीडिया चलाने लगे हैं।

सरकार ने ट्विटर को या दूसरे प्लेटफॉर्म्स को जो नोटिस या चेतावनी दी है उसमें यही लिखा है कि आईटी एक्ट की धारा सत्तावन के तहत उन्हें जो संरक्षण मिला हुआ है वो हटा लिया जाएगा। यह संरक्षण क्या है? वो यह है कि सोशल मीडिया पर लगी किसी पोस्ट के लिए इन प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ मुकदमे चलाने या इनके अधिकारियों को गिरफ्तार करने या उन्हें सजा देने जैसी कार्रवाई नहीं हो सकती हैं, क्योंकि यह तो केवल संदेशवाहक हैं। संरक्षण खत्म होना उनके लिए बहुत सी मुसीबत खड़ी कर सकता है, इसीलिए यह प्लेटफॉर्म भी इसे बचाए रखने के लिए अपील करने से लेकर अदालत का दरवाज़ा खटखटाने जैसी कार्रवाई तक कर रहे हैं, लेकिन बुनियादी सवाल यही है कि अभिव्यक्ति का अधिकार भी बचा रहे और अभिव्यक्ति के नाम पर मनमानी भी न होने लगे यह संतुलन बनाने का क्या तरीका निकाला जा सकता है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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