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स्वामीनाथन आयोग : हालात से कैसे लड़े किसान, आंकड़े कर देंगे हैरान

सरकार ने यह निर्णय ऐसे समय लिया है जबकि कृषि उपजों के दाम गिरने से किसान परेशान हैं। धान के समर्थन मूल्य को लें तो इसे वर्ष 2019-20 के लिए 3.7 प्रतिशत बढ़ाकर 1,815 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया है।

Crores of crores damaged due to hail, now insurance company refuses to give claims to farmers
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किसान (फाइल फोटो)

केंद्र सरकार ने धान समेत 14 खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी कर किसानों को बड़ी राहत दी है। लेकिन बढ़ोतरी स्वामीनाथन आयोग के अनुकूल नहीं है। फिर भी मूल्य बढ़ोतरी की इस घोषणा को फौरी राहत के तौर पर देखा जाना चाहिए। सरकार ने यह निर्णय ऐसे समय लिया है जबकि कृषि उपजों के दाम गिरने से किसान परेशान हैं। धान के समर्थन मूल्य को लें तो इसे वर्ष 2019-20 के लिए 3.7 प्रतिशत बढ़ाकर 1,815 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया है। कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने बताया कि धान के एमएसपी में 65 रुपये प्रति क्विंटल, ज्वार में 120 तथा रागी में 253 रुपये की गयी है।

इसी तरह तुअर, मूंग और उड़द दालों के एमएसपी भी क्रमश: 215 रुपये, 75 और 100 रुपये बढ़ाए गए हैं। मूंगफली में 200 रुपये क्विंटल तथा सोयाबीन में 311 रुपये की बढ़ोतरी की गई है। मध्यम कपास का 105 रुपये तथा लंबे कपास का एमएसपी 100 रुपये क्विंटल बढ़ाया गया है। बेशक, केंद्र सरकार के इस फैसले से करोड़ों किसानों की आर्थिक स्थिति बेहतर होगी। फिर भी सरकार ने स्वामीनाथन समिति की सिफारिशों के मुताबिक फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं बढ़ाया है।

न्यूनतम समर्थन मूल्य वह कीमत है जो केंद्र किसानों को उनकी उपज का भुगतान करने की गारंटी देता है। किन्तु वास्तविकता, व्यवस्था, व्यवहार के रूप में बहुत कम किसानों को लाभ मिल सकेगा। क्योंकि, कोई और नहीं, स्वयं कृषि मंत्रालय की रिपोर्ट कह रही है कि आधे से ज्यादा किसान तो समर्थन मूल्य के बारे में जानते तक नहीं हैं! प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी संकल्प लिया है कि 2022 तक किसानों की आय दोगुना की जाए।

इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सरकार कृषि और गैर-कृषि क्षेत्रों के विकास के लिए नए प्रयास कर रही है। पिछले कई सालों से खेती करने की लागत जिस तेजी से बढ़ती जा रही है। उस अनुपात में फसलों के दाम बहुत कम बढ़े हैं। इससे किसान बीच में पिस जाता है और देश की जनता को सस्ते में खाना उपलब्ध कराने की सारी जिम्मेदारी किसान के कंधों पर डाल दी जाती है। इसका परिणाम हम सब किसान पर कभी न ख़त्म होने वाले कर्ज के रूप में देखते हैं।

ऐसे में सबसे अहम सवाल यह है कि क्या न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोत्तरी ही किसानों की समस्या के हर मर्ज का इलाज हैं। बेचारे किसान को फसल मूल्य के रूप में अपनी वास्तविक लागत का आधा या चौथाई भी वसूल नहीं हो पाता। किसान को कौड़ी के भाव अपने उत्पाद फेंकने पड़ जाते हैं। लेकिन इसका ये मतलब कतई नहीं कि उपभोक्ता को ये उत्पाद सस्ते में मिल जाते हैं।

असल में किसान के खेत से लेकर आपकी प्लेट में आने तक की प्रक्रिया में फसल उत्पाद बिचौलियों के हाथो में से होकर आती है। बिचौलिए का काम ही होता है किसान से सस्ते दाम में खरीदकर महंगे में बेचना। इस पूरी प्रक्रिया में किसान व उपभोक्ता दोनों ठगे से रह जाते हैं। किसी फसल उत्पाद के लिए उपभोक्ता जो मूल्य देता है, उसका बहुत ही कम हिस्सा किसान को मिल पाता है। ऐसे में सरकार केवल न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्दि करके किसानों को खुशहाल नहीं बना सकती है।

वर्तमान में स्थिति यह है कि किसानों को समर्थन मूल्य से भाव भी मिल जाए तब भी किसान निहाल हो जाएंगे। वर्तमान में कृषि उत्पादन करने वाले 95 प्रतिशत किसानों को समर्थन भाव ही नहीं मिल रहे हैं। गेहूं, चावल को छोड़कर चना, तुअर, मूंग, उड़द, मसूर, प्याज, आलू, टमाटर लागत से भी कम भाव में बिक रहे हैं। अथवा आलू एवं टमाटर को फैंकने की स्थिति प्रति वर्ष बनती है।

वहीं दूसरी सच्चाई यह भी है कि देश के 17 राज्यों के किसानों की सालाना आय बीस हज़ार रुपये हैं। जरा सोचिए। हमारा किसान इतने कम पैसे में कैसे जीता होगा। अब अगर प्रधानमंत्री अपने वादे में सफल रहे तो साल 2022 में यही दुगनी होकर 3332 रुपये हो जाएगी। देश का किसान जिन हालातों से गुजर रहा है वह किसी से छिपा नहीं है। सबको अन्न देने वाला भूखा मर रहा है।

आजादी के बाद सारी विकास की योजनाएं शहरों को केंद्र में रखकर की गईं और किसान तथा कृषि प्रधान देश का नारा संसद तक सीमित रहा। कृषि अर्थव्यवस्था तो बाजार और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पास चली गई है। देखते-देखते सारे किसान अपनी भूमि पर गुलाम हो गए। अगर 132 करोड़ जनता को अन्न चाहिए तो अन्नदाता को गांव में रोकना होगा, उसे बेहतर जीने का अवसर देना होगा, जैसा दुनिया के विकसित राष्ट्र अपने किसानों को देते हैं।

असल में पहली हरित क्रांति और मौजूदा संकट के बीच कुछ समानता है। खाद्यान्न संकट ने भारत की पहली हरित क्रांति को जन्म दिया था। कुछ इसी तरह के संकट ने एक बार फिर सरकार को कृषि के बारे में सोचने को मजबूर कर दिया है। इतना तो स्पष्ट है कि खेती का कुल क्षेत्रफल सिमटा है और किसानों की संख्या तेजी से कम हो रही है। हम लोग हमेशा से यही कहते-सुनते आ रहे हैं, भारत एक कृषि प्रधान देश है, किसान भारत की जान हैं, शान हैं, किसान हमारा अन्नदाता है और ना जाने कितनी तरह की बातें करते हैं और सुनते हैं। फिर भी आज इस देश में जो स्थिति किसानों की है वह किसी से छुपी नहीं है।

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