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चिंतन: आतंकवाद के खात्मे को वैश्विक पहल करे यूएन

भारत करीब 40 साल से आतंकवाद का दंश झेल रहा है।

चिंतन: आतंकवाद के खात्मे को वैश्विक पहल करे यूएन
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बेल्जियम की धरती से वैश्विक आतंकवाद से निपटने में 'संयुक्त राष्ट्र' के नाकाम रहने की बड़ी बात कह कर इस ग्लोबल समस्या के प्रति पूरी दुनिया का ध्यान एक बार फिर आकृष्ट किया है। बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स में पीएम मोदी संबोधित तो भारतीय समुदाय को कर रहे थे, लेकिन मार्मिक संवाद संयुक्त राष्ट्र (यूएन) और विश्व से कर रहे थे।

आतंकवाद को लेकर 9/11 हमले से पहले तक यूरोपीय-अमेरिकी देशों का जो रवैया रहा है, वह छिपा नहीं है। ये सभी आतंकवाद को क्षेत्रीय समस्या मानते रहे हैं। यूएन के लिए तो जैसे आतंकवाद वैश्विक मुद्दा ही नहीं रहा। उल्टे पश्चिमी मुल्कों से नीति के तौर पर एशिया में आतंकवाद को खाद-पानी मिलता रहा। लेकिन 24 अक्टूबर 1945 में स्थापना से लेकर अब तक यूएन ने एक ग्लोबल संस्था के तौर पर आतंकवाद से निपटने के लिए कभी सक्रिय नहीं दिखा।

प्रधानमंत्री ने ठीक ही कहा कि संयुक्त राष्ट्र के पास 'युद्ध व संघर्ष'से निपटने का हर साधन और प्रक्रिया है, लेकिन यह दुर्भाग्य ही है कि यूएन अभी तक आतंकवाद की परिभाषा भी तय नहीं कर सका। यूएन न तो परिभाषा जानता है और न ही उसे यह मालूम है कि इससे कैसे निपटना है। इस मामले में यूएन अपना कर्तव्य नहीं निभा पाया है। जबकि भारत करीब 40 साल से आतंकवाद का दंश झेल रहा है, पूरी दुनिया से कहता रहा है कि आतंकवाद एक ग्लोबल चुनौती है, इससे मिलकर ही निपटा जा सकता है, लेकिन भारत की बात पर तब तक दुनिया का ध्यान नहीं गया, जब तक अमेरिका में 9/11 नहीं हुआ। और अब यूरोप लगातार आतंकवाद के खतरे का सामना कर रहा है, ब्रिटेन, फ्रांस के बाद अभी हाल में बेल्जियम आतंकी धमाके से दहला है।

पिछले कुछ वर्षों में 90 देशों को आतंकी हमलों का सामना करना पड़ा है और इसमें सैकड़ों लोग मारे गए हैं। अब आतंकवाद ग्लोबल चुनौती बन गया है। यह सच है कि एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था के तौर पर यूएन के पास जितने अधिकार हैं और जितनी क्षमताएं हैं, उस अनुरूप में उसने आतंकवाद के खिलाफ कुछ खास नहीं किया। इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि यूएन पर हमेशा अमेरिका, ब्रिटेन व फ्रांस का दबदबा रहा, दूसरी तरफ चीन व रूस के पास वीटो अधिकार होने के बावजूद दोनों देश कभी आतंकवाद के खिलाफ मुखर नहीं हुए, इसके चलते पश्चिम लॉबी यूएन की नीतियों पर हावी रही।

लेकिन बड़ी बात यह है कि संयुक्त राष्ट्र एक ग्लोबल संस्था है और वह दुनिया के लगभग सभी देशों का प्रतिनिधित्व करती है, ऐसे में उसका दायित्व है कि वह किसी भी अंतर्राष्ट्रीय समस्या के हल में अहम भूमिका निभाए। अगर वह ऐसा नहीं करती है, तो निश्चित ही एक ताकत के तौर पर अपनी प्रासंगिकता खो देगी। विश्व परमाणु सम्मेलन का भी एजेंडा परमाणु आतंकवाद से निपटने की रणनीति पर चर्चा है। ऐसे में उम्मीद है यूएन प्रधानमंत्री की बात पर गौर करेगा और वह आतंकवाद के खात्मे के लिए पूरी दुनिया को एकजुट करने में भी व मजबूत संगठन के रूप में भी वैश्विक पहल करेगा।

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