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देश निर्माण में शिक्षक का योगदान सबसे ज्यादा

शिक्षक दिवस की पूर्व संध्या पर देश के दो सर्वोच्च संवैधानिक पदों पर बैठे शख्सियतों द्वारा बड़ा संदेश देने की कोशिश की गई।

देश निर्माण में शिक्षक का योगदान सबसे ज्यादा

शिक्षक दिवस की पूर्व संध्या पर देश के दो सर्वोच्च संवैधानिक पदों पर बैठे शख्सियतों द्वारा बड़ा संदेश देने की कोशिश की गई। इससे पहले शिक्षकों को सम्मानित करने और देश निर्माण में उनके योगदान को याद करने के लिए निश्चित कार्यक्रम होते रहे हैं, लेकिन उनको याद करने का ऐसा अनुभव देश को पहली बार हो रहा है। यदि आज सरकार में बैठे लोगों को देश में शिक्षा, शिक्षकों की स्थिति और शिक्षक-छात्र संबंधों पर विचार करने की जरूरत महसूस हो रही है, तो इसे अच्छा संकेत माना जाना चाहिए। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने मुखर्जी सर के रूप में राजधानी दिल्ली के एक स्कूल में बच्चों को भारत के राजनीतिक इतिहास का पाठ पढ़ाया। उन्होंने छात्रों को संविधान और लोकतंत्र की खूबियों के बारे में बताया। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश भर के अलग-अलग स्कूलों के बच्चों से रू-ब-रू हुए। एक व्यक्ति के जीवन में एक शिक्षक की क्या अहमियत होती है इसको रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि मां एक बच्चे को जन्म देती है, लेकिन एक शिक्षक उसे जीवन देता, जीवन जीने का उद्देश्य देता है।

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इसी से पता चलता है कि समाज का भविष्य संवारने में एक शिक्षक का सबसे ज्यादा योगदान होता है। हर छात्र के जीवन में एक ऐसा दौर आता है जब वह सबसे ज्यादा समय अपने शिक्षक के साथ बीताता है। ऐसे में यदि समाज के पास बेहतर शिक्षक हैं तो उसके युवा सर्वगुण संपन्न हो जाएंगे जो अपने अच्छे कर्मों से देश का भाग्य बदल देंगे। हालांकि भारत जैसे देश में पर्याप्त शिक्षकों की कमी है और जो हैं उनमें भी कई ऐसे हैं जो जरूरी योग्यता नहीं रखते हैं। ऐसे में प्रतिभावान शिक्षकों की संख्या बढ़ाने पर जोर दिया जाना चाहिए। हालांकि प्रधानमंत्री का विद्वान लोगों जैसे डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस और आईपीएस आदि को साल में कुछ घंटे अपने पास के स्कूलों में गुजारने का सुझाव इस समस्या को कुछ हद तक दूर कर सकता है। इससे शिक्षकों की कमी तो दूर होगी ही, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा भी मिल सकती है।

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देश में शिक्षक-छात्र संबंधों का क्षरण एक बड़ी समस्या बनती जा रही है। जिस तरह शिक्षा का व्यवसायीकरण किया जाने लगा है, उसने इसे और नुकसान पहुंचाया है। हम भूल जाते हैं कि यह सिर्फ पेशा नहीं है, बल्कि धर्म है जिसके जरिए पीढ़ियों को सुधारने का काम किया जाता है। ऐसे में शिक्षकों का भी दायित्व हैकि वे छात्रों से भावनात्मक रूप से जुड़ें। शिक्षकों के प्रति छात्रों और छात्रों के प्रति शिक्षकों के दुर्व्यवहार की खबरें आती रहती हैं, यह किसी भी समाज के लिए ठीक नहीं है। वहीं किसी भी देश में शिक्षकों के मान सम्मान का स्तर गिरना सभ्य समाज के निर्माण में बाधक है। जिस शिक्षक ने हमारी बुनियाद रखी है उसे हम क्यों भूल जाते हैं। क्या इसी वजह से लोग टीचर बनना नहीं चाह रहे हैं, जबकि अच्छे शिक्षकों की मांग पूरी दुनिया में है। इसी तरह मां-बाप अपनी रुचियों को बच्चों पर थोपते हैं, वह भी उचित नहीं है। इससे बच्चों में नैसर्गिक प्रतिभा का विकास रुक जाता है। बेहतर हैकि मां-बाप उन्हें जानें, समझें और वे जो बनना चाहते हैं उसमें उन्हें आगे बढ़ने में मदद करें। इसी तरह विफलताओं से घबराने वालों के लिए उनका यह मंत्र काफी कारगर हो सकता हैकि बिना असफलता के सफलता नहीं मिलती है, बशर्ते हम उससे सीखें। गत वर्ष भी प्रधानमंत्री ने बच्चों से बातें की थी। इस प्रकार वे शिक्षक दिवस पर गुरु-शिष्य को जोड़ने वाली डोर को मजबूती देना का प्रयास कर रहे हैं।

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