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फांसी की सजा समाप्त करने पर फिर हो बहस

पूरी दुनिया में पिछले कुछ सालों से यह बहस तेज हुई है कि फांसी की सजा बंद कर दी जानी चाहिए।

फांसी की सजा समाप्त करने पर फिर हो बहस
तेहरान में एक मां ने अपने बेटे के हत्यारे को सार्वजनिक तौर पर दी जा रही फांसी की सजा को अंतिम क्षणों में रुकवा दिया। जिसने चाकू से गोदकर उसके बेटे की हत्या कर दी थी, उस अपराधी को सिर्फ एक चांटा लगाकर संवेदनशील मां ने जीवन दान दे दिया। शरिया प्रतिशोध कानून में प्रावधान है कि आंख के बदले आंख, हत्या के बदले आरोपी तो सरेआम फांसी। हां, यह प्रावधान भी है कि पीड़ित के परिजन चाहें तो आरोपी को माफ भी कर सकते हैं।
आमतौर पर ऐसा होता नहीं है। खासकर किसी ऐसी मां से यह अपेक्षा नहीं की जाती, जिसके जवान बेटे की हत्या कर दी गई हो। इस लिहाज से तेहरान में जो कुछ हुआ, यह अभूतपूर्व घटना है। ऐसा क्यों हुआ, इसकी पड़ताल करना जरूरी है। खबरें आ रही हैं कि जिस दिन हत्याभियुक्त को सार्वजनिक रूप से फांसी दी जानी थी, उससे तीन दिन पहले पीड़ित मां को स्वप्न में उसका बेटा दिखाई दिया, जिसने कहा कि वह जहां है, खुश है। उसने मौत का बदला नहीं लेने की बात कही। अभियुक्त पहले ही यह बात कह चुका था कि उसने जानबूझकर वह अपराध नहीं किया था। गलती से यह अपराध हो गया था। और उसकी मां ने वही किया, जो उसके बेटे ने स्वप्न में कहा था। शोधार्थियों का कहना है कि आदमी को स्वप्न में वैसी ही बातें और घटनाएं दिखाई और सुनाई देती हैं, जैसी उसके मन मस्तिष्क में उन दिनों चलती रहती हैं।
पक्के तौर पर ऐसा दावा तो नहीं किया जा सकता परन्तु जरूर पीड़ित महिला के दिमाग में कुछ दिन से इस तरह ख्याल आ जा रहे होंगे कि क्यों न बेटे के हत्यारे को वह माफ कर दे। ऐसे समय, जबकि बात-बात में लोग उग्र हो जाते हैं। बदले की भावना से ग्रस्त होकर बड़ी से बड़ी वारदातों को अंजाम दे बैठते हैं। यदि इस्लामिक दुनिया से संबंध रखने वाली कोई मां माफी देने का फैसला लेती है और किसी दूसरी मां की कोख को उजड़ने से बचा लेती है तो इस भावना की जितनी प्रशंसा की जाए, वह कम होगी। वैसे तो पूरी दुनिया में ही सहिष्णुता की भावना कम होती जा रही है परंतु पिछले डेढ़-दो दशक की घटनाओं से एक धारणा बनी है कि खासकर इस्लामिक दुनिया में कट्टरता ने तेजी से पांव फैलाए हैं। ऐसी अवधारणा के दौर में यदि कोई मां इस तरह की दरियादिली का र्शेष्ठ उदाहरण पेश करती है तो निश्चित ही इसके सुखद संदेश पूरी मानवता के लिए जाते हैं।
पूरी दुनिया में पिछले कुछ सालों से यह बहस तेज हुई है कि फांसी की सजा बंद कर दी जानी चाहिए। ऐसी मांग करने वालों का तर्क है कि आप किसी को जीवन नहीं दे सकते तो किसी की जान लेने का हक भी नहीं दिया जा सकता। ऐसे भी कई मामले सामने आए हैं कि किसी को फांसी दे दी गई और उसके कुछ अरसा बाद पता चला कि जिसे सजा दी गई, वह तो बेकसूर था। ऐसे हालात में क्या किसी को वापस लाया जा सकता है? क्या फांसी पर लटकाए व्यक्ति के परिवार की क्षतिपूर्ति संभव है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, संयुक्त राष्ट्र महासंघ और दूसरे संगठन इसकी पैरवी करते रहे हैं कि जिन देशों में अब भी फांसी दी जाती है, वह इस क्रूर सजा का प्रावधान खत्म करें। ऐसे देशों के अपने तर्क हैं। बहरहाल, तेहरान की इस घटना ने संपूर्ण मानव जाति को क्षमा कर देने की अवधारणा पर सोचने के लिए विवश तो कर दिया है।
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