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जल-विवाद खत्म करने के लिए उठाने होंगे ये कदम

देश में 24 नदी बेसिन हैं, जिनका 99 प्रतिशत इलाका अंतराज्यिय है। इसलिए राज्यों के बीच में नदियों के जल बंटवारे को लेकर विवाद होते हैं। वर्ष 1956 में इसे लेकर सबसे पहला कानून बनाया गया था।

जल-विवाद खत्म करने के लिए उठाने होंगे ये कदम
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लोकसभा में बुधवार को अंतरराज्यिक नदी जल विवाद (संशोधन) विधेयक 2019 पास हो गया है। सदन में इस पर हुई चर्चा का जवाब देते हुए केंद्रीय जलशक्ति मंत्रालय के मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि मौजूदा दौर में देश के सामने खड़े हो रहे जल संकट के संकेतों को देखते हुए इसका बेहतर प्रबंधन किए जाने की आवश्यकता है। जिसमें वर्तमान और भविष्य दोनों की चिंता के साथ सम्रगता, प्रतिबद्धता और अनिवार्यता के साथ विचार किया जाना चाहिए। इन बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए ही कानून में मौजूदा संशोधन किया गया है, जिससे लंबित विवादों का समयबद्ध और पारदर्शी ढंग से समाधान हो सकेगा।

लेकिन इसमें राज्यों और उनके राजनीतिक नेतृत्व को भी साथ आना पड़ेगा। पुराने कानून में संशोधन लाने की शुरुआत 2013 में केंद्र ने राज्यों के साथ व्यापक चर्चा करके की थी। फिर केंद्र ने 2016 में इसे नीति आयोग के पास भेजा, 2017 में बिल को संसद में पेश कर स्थायी समिति को भेजा गया। उसके तमाम सुझावों को इसमें शामिल करने के बाद अब इसे पुन: संसद की मंजूरी के लिए लाया गया है। संविधान के अनुच्छेद 262 (1) के तहत संसद को किसी भी विषय पर कानून बनाने का अधिकार प्रदान किया गया है। अधिकरण (ट्रिब्यूनल) द्वारा पारित किए गए अवार्ड को बिना प्रकाशित हुए सुप्रीट कोर्ट के निर्णय के बराबर माना जाएगा।

एक स्थायी अधिकरण होगा

उन्होंने यह भी कहा कि इस बिल के जरिए सरकार ने यह व्यवस्था की है कि अब देश में राज्यों के बीच होने वाले नदी-जल विवादों का निपटारा एक स्थायी अधिकरण के माध्यम से होगा। ऐसे में पुराने गठित किए गए सभी अधिकरणों का इसमें स्वत: समावेश हो जाएगा और उनमें चल रहे मामलों को हल करने के लिए इसी के तहत बहुपक्षीय बेंचों को गठित करने का प्रावधान किया गया है। साथ ही नए विवादों के लिए नई विवाद निवारण कमेटी का गठन किया जाएगा।

लेकिन इसमें खास बात यह होगी कि तमाम विवादों में पांच साल के अंदर अधिकरण को रिपोर्ट देना अनिवार्य होगा। यह स्थायी अधिकरण 8 सदस्यीय होगा। इसमें एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष और 3 सदस्य न्यायपालिका से और 3 विषय विशेषज्ञ होंगे। बेंच 4 सदस्यीय होगी। इस व्यवस्था के बाद पूर्व में गठित जल प्रबंधन प्राधिकरणों के स्वरूप में कोई बदलाव नहीं होगा। वह यथावत बने रहेंगे। बेंच का मुख्यालय दिल्ली में होने की अनिवार्यता नहीं होगी। बेंच का अध्यक्ष स्वेच्छा से किसी भी शहर में मामले की सुनवाई करेगा।

इसलिए पड़ी जरुरत

देश में 24 नदी बेसिन हैं, जिनका 99 प्रतिशत इलाका अंतराज्यिय है। इसलिए राज्यों के बीच में नदियों के जल बंटवारे को लेकर विवाद होते हैं। वर्ष 1956 में इसे लेकर सबसे पहला कानून बनाया गया था। इसके बाद से लेकर अब तक कुल 9 अधिकरण गठित किए गए हैं। लेकिन इसमें सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि इनमें से मात्र चार ने (गोदावरी, कृष्णा, नर्मदा, कावेरी) ही अब तक अपनी रिपोर्ट दी है। जबकि पांच का काम आज भी जारी है। इसमें सबसे पुराना मामला पंजाब, हरियाणा के नदी जल विवाद को लेकर गठित किए गए रावी-व्यास अधिकरण का है जो वर्ष 1986 में अपने गठन के करीब 33 वर्षों बाद भी रिपोर्ट पेश नहीं कर सका है। विवादों को हल करने के लिए पानी के संबंध में प्रयोग किया जाने वाला डेटा केंद्रीय जल आयोग, आईएमडी का ही होगा।

विपक्ष का तर्क

विपक्ष की ओर से राज्यों से विचार किए बिना केंद्र द्वारा संसद के माध्यम से कानून बनाए जाने पर आपत्ति जाहिर की गई। कांग्रेस के मनीष तिवारी ने कहा कि केंद्र संविधान द्वारा प्रदत अधिकारों का गलत इस्तेमाल कर रहा है। उन्होंने अधिकरण द्वारा निर्णय दिए जाने के बाद उसके भविष्य पर भी सवाल उठाया। डीएमके के दयानिधि मारन, बीजेडी के बी़ माहताब की ओर से भी मूलरुप से इसी विषय पर ही जोर दिया गया। इसके अलावा ज्यादातर सदस्यों ने बिल का समर्थन किया।

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